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  • Aug 2 2018 2:50PM

महिलाओं की इच्छाशक्ति ने दिलायी अलग पहचान : बनलोटवा बना नशामुक्त गांव

महिलाओं की इच्छाशक्ति ने दिलायी अलग पहचान : बनलोटवा बना नशामुक्त गांव

पंचायतनामा डेस्क 

पंचायत : चारू
प्रखंड : ओरमांझी
जिला : रांची

रांची जिला अंतर्गत ओरमांझी प्रखंड मुख्यालय सेलगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर खूबसूरत वादियों में बसा है एक गांव बनलोटवा. गांव के आप-पास घने जंगल और पहाड़ हैं. जंगलों में बंदर, मोर और हिरण खुले घूमते आपको दिख जायेंगे. इस गांव की महिलाओं की इच्छाशक्ति ने इसे एक और पहचान दिला दी. अब गांव पूरी तरह नशामुक्त हो गया है. गांव के हर घर की दीवारें गांव के नशामुक्त होने की गवाही देती हैं. सभी घरों की दीवारों पर शराब के खिलाफ जागरूकता संबंधित स्लोगन लिखे गये हैं. गांव को नशामुक्त करने में महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा. गांव को नशामुक्त बनाने के लिए ग्रामीणों को काफी संघर्ष भी करना पड़ा. पहले शराब के कारण गांव को बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा था. पर, अब यह गांव पूरी तरह नशामुक्त हो गया है. गांव में धीरे-धीरे खुशहाली वापस लौट रही है. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी बनलोटवा गांव को नशामुक्त होने पर ग्रामीणों को बधाई दी है. नशामुक्त होने पर गांव को एक लाख रुपये की सम्मान राशि दी गयी. साथ ही गांव में बेहतर काम करनेवाले ग्रामीणों को पुरस्कृत भी किया गया.

नशामुक्त गांव बनाने में उठानी पड़ी काफी परेशानी
बनलोटवा गांव में ग्रामीण महिलाओं का स्वयं सहायता समूह पिछले 20-22 सालों से चल रहा है. इसी बहाने गांव की महिलाएं हर बुधवार एक जगह एकजुट होती थीं और खुद व गांव के विकास पर चर्चा करती थीं. इस दौरान गांव में शराब का सेवन चरम पर था. शराब के नशे में मारपीट करना गांव में आम बात थी. इससे कई महिलाएं भी प्रताड़ित होती थीं. पर्व-त्योहार में तो स्थिति और भी बदतर हो जाती थी, क्योंकि पर्व-त्योहार के बहाने ग्रामीण कई दिनों तक शराब के नशे में रहते थे. नशे में रहने के कारण काम पर भी नहीं जा पाते थे. ऐसे हालात में गांव में शराब बंद करना काफी मुश्किल काम था, लेकिन फरवरी 2017 में गांव की महिलाओं ने बैठक में शराब बंद करने का फैसला लिया. शुरुआती समय में महिलाओं को इसका विरोध भी झेलना पड़ा, लेकिन ग्रामीण महिलाओं की जिद के आगे पुरुषों की नहीं चली और अंतत: उन्हें शराबबंदी में महिलाओं का साथ देना पड़ा. महिलाएं घर-घर जाकर लोगों को शराब से होनेवाले नुकसान के बारे में बतानी लगीं. धीरे-धीरे प्रयास सफल हुआ और आज गांव पूरी तरह से नशामुक्त हो गया है.

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लाख रुपये की शराब पी जाते थे ग्रामीण
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घरों वाले बनलोटवा गांव के अधिकतर घरों में शराब बनती थी. ग्रामीणों के मुताबिक, सालभर में लगभग 20 लाख रुपये की शराब ग्रामीण पी जाते थे. इससे खुद का विकास भी रुक गया था. गांवों का विकास भी नहीं के बराबर था. महिलाओं की टोली ने इस गंभीर समस्या को जाना और गांव को शराबमुक्त कराने में अहम भूमिका निभायी.

आर्थिक व शारीरिक दंड का है प्रावधान
ग्रामीण महिलाएं कहती हैं कि काफी संघर्ष के बाद गांव के कुछ परिवार तो मान गये, लेकिन कुछ परिवार चोरी-छिपे शराब का सेवन कर रहे थे. इन परिवारों को कई बार समझाया गया, लेकिन कोई लाभ नहीं मिला. गांव को नशामुक्त करने की मुहिम कहीं धीमी न पड़ जाये, इसके मद्देनजर ग्रामीण महिलाओं ने बैठक कर शराब पीने और बेचने, दोनों के खिलाफ दंड का प्रावधान किया. गांव में शराब बनाते या बेचते पकड़े जाने पर 5551 रुपये का आर्थिक दंड लिया जाने लगा. गांव की एक महिला से यह दंड भी लिया गया. इसके अलावा गांव में जो लोग नशे में पकड़े गये, उनसे 1051 रुपये का आर्थिक दंड लिया गया. इसके अलावा गांव की महिलाओं ने एक और रास्ता अपनाया. गांव में अगर कोई पुरुष पीकर आता, तो उस घर की महिलाएं एवं अन्य महिलाएं उस पुरुष को गांव के चौक पर खूंटे से बांध कर पिटाई करती थीं. इससे गांव के पुरुषों में डर पैदा हो गया और वे धीरे-धीरे शराब छोड़ने लगे. आर्थिक दंड के तौर पर मिली राशि गांव की वन रक्षा समिति को जमा कर दी जाती थी.

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वन रक्षा समिति ने जगायी एकता की भावना
बनलोटवा के ग्रामीण एकजुट रहते थे. वर्ष 1984 में वन रक्षा समिति का गठन होने के बाद गांव में हर गुरुवार को बैठक होती थी. बैठक में वनों को बचाने का संकल्प लिया जाता था. इसका असर भी दिखा और गांव में पेड़ों की कटाई पूरी तरह प्रतिबंधित हो गयी. यहां तक कि जंगली पशु-पक्षियों का शिकार भी गांव में वर्जित हो गया. लोगों को जागरूक करने और इस अभियान से दूसरे गांव के लोगों को जोड़ने के लिए वर्ष 2007 में 100 किलोमीटर की पदयात्रा भी निकाली गयी थी, जो बीस दिनों तक चल कर बुढ़मू प्रखंड पहुंची थी. पेड़ के प्रति प्यार और लोगों में जागरूकता लाने के लिए प्रतिवर्ष 17 जनवरी को जंगल के पेड़ों में रक्षा सूत्र बांधा जाता है और पेड़ की रक्षा का संकल्प लिया जाता है.

अब लोग बीमार कम पड़ते हैं : मिनी देवी
मिनी देवी बताती हैं कि शराब से उनके घर में काफी नुकसान हो रहा था. उनकी सास बहुत शराब पीती थी और महीने में 15 दिन बीमार रहती थी, लेकिन जब से गांव में शराबबंदी हुई है, उनकी हालत में काफी सुधार हुआ है और अब उनकी सास स्वस्थ जिंदगी जी रही हैं. इतना ही नहीं, उनके सेहत में भी काफी सुधार हुआ है.

शराबबंदी से पहले थी परेशानी, अब मिली राहत : लीला देवी
ग्रामीण लीला देवी बताती हैं कि वो पहले शराब पीती और शराब बनाती थीं. शराब से ही उनके घर की रोजी-रोटी चलती थी. पति भी शराब पीते थे, जिसके कारण वो ठीक से काम भी नहीं कर पाते थे. इसलिए जब गांव में शराबबंदी हुई, तो उन्हें पहले काफी परेशानी हुई, लेकिन अब सब कुछ ठीक है. वह रोजगार के दूसरे विकल्प की तलाश कर रही हैं.

रहन-सहन में आ रहा है बदलाव : सुनील कुमार महतो
गांव में शराबबंदी होने के बाद अब लोगों के रहन-सहन में बदलाव आ रहा है. पहले लोग शराब के नशे में घर में आकर तोड़-फोड़ करते थे. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में भी ज्यादा ध्यान नहीं देते थे, लेकिन अब लोग अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में ध्यान दे रहे हैं. खेती-बारी भी ठीक से कर रहे हैं. गांव के युवक भी हमेशा शराब के नशे में डूबे रहते थे, पर अब बदलाव दिख रहा है.

ग्रामीणों में आपसी प्रेमभाव बढ़ा : अरविंद महतो
वार्ड सदस्य अरविंद महतो कहते हैं कि अब गांव में लोग शराब पीकर मारपीट नहीं करते हैं और एकजुट रहते हैं. समाजसेवी अन्ना हजारे के गांव रालेगन सिद्धि गये और वहां का बदलाव देख उनकी सोच भी बदली. गांव वापस आने पर शराबबंदी में जुट गये. पहले वह शराब पीते थे, लेकिन अब उन्होंने इससे तौबा कर लिया है. गांव में वन रक्षा समिति भी बेहतर कार्य कर रही है. वनों की रक्षा को लेकर ग्रामीण काफी जागरूक हैं. वनों की रक्षा के लिए वन विभाग की ओर से 12 लाख रुपये वन रक्षा समिति को दिया गया है.

बधाई के पात्र हैं बनलोटवा के ग्रामीण : मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि जनसहयोग के बिना बदलाव या विकास नहीं हो सकता है. ग्रामीणों की इच्छाशक्ति से ही गांव नशामुक्त हुआ है. इसके लिए बनलोटवा गांव के ग्रामीण बधाई के पात्र हैं. अदिवासी बहुल गांवों में आदिवासी विकास समिति और मिश्रित आबादीवाले गांवों में ग्राम विकास समिति का गठन किया जा रहा है. गांव की छोटी-छोटी योजनाएं इन्हीं के माध्यम से धरातल पर उतारी जायेंगी.