aapne baat

  • Feb 18 2019 12:18PM

जीवन जीने की कला

जीवन जीने की कला

 

अनुज कुमार सिन्हा

काैन नहीं चाहता कि वह स्वस्थ रहे, बीमारी उससे दूर रहे, लेकिन हर किसी का वह सपना पूरा नहीं

हाेता. चाराे आेर एक बार नजर डालिए. सब कुछ साफ-साफ दिखेगा. एक आेर 80-90 साल का स्वस्थ

बुजुर्ग व्यक्ति तेज गति से चलता मिलेगा, आंखाें पर चश्मा नहीं, न डायबिटीज की बीमारी, न ब्लडप्रेशर.

दूसरी आेर 15-20 साल का छात्र, आंखाें पर माेटा चश्मा, साथ में डायबिटीज आैर ब्लडप्रेशर भी.

माेटापा अलग. चलने में असुविधा. सवाल यह हाेता है कि ऐसा क्याें? पहले ऐसी बात नहीं थी. अब

दिखती है. इसकी जड़ में है लाइफ स्टाइल. गांवाें में यह बीमारी कम लगी है, लेकिन शहर का बड़ा तबका

इसकी चपेट में आ चुका है. हालांकि, ग्रामीण इलाकाें में भी यह बीमारी तेजी से फैल रही है. स्वस्थ

रहना या नहीं रहना इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप रहते कैसे हैं? खाते क्या हैं? आपकी दिनचर्या

क्या है? प्रकृति के आप कितने करीब हैं? माेबाइल-इंटरनेट पर आप कितना घंटा माथा खपाते हैं? आप

कितना शारीरिक श्रम करते हैं? आप खेलते-टहलते हैं या नहीं? आदि. ग्रामीण इलाकाें में आप पायेंगे

कि वहां लाेग शहराें की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ है. खासताैर पर पुरानी पीढ़ी, जाे आज भी रात में आठ बजे

साे जाती है आैर सवेरे चार बजे उठ कर अपना कुछ काम कर खेताें में काम करने के लिए निकल पड़ती

है. जंगलाें आैर पेड़ाें के बीच रहने का लाभ उन्हें मिलता है. ताजी हवा का आनंद वे लेते हैं. कठिन श्रम

करते हैं

. पैदल या साइकिल से बच्चे स्कूल जाते हैं. माेबाइल आैर इंटरनेट का बहुत नशा उन्हें नहीं लगा

है. खाना में चावल-दाल आैर हरी सब्जी, साग ही लेते हैं. यही कारण है कि वे अपेक्षाकृत स्वस्थ रहते हैं

, दिखते हैं. ठीक इसके उलट. शहरी इलाकाें में देखिए. देर रात तक टेलीविजन देखना, इंटरनेट पर

रहना या पार्टी में रहना आम है. बच्चाें काे हरी सब्जी गले से नहीं उतरती. उन्हें ताे फास्ट फूड चाहिए

. मैदान में खेलना है नहीं. मैदान भी ताे नहीं है. वीडियाे गेम खेलना है या नेट पर समय व्यतीत करना है

. शारीरिक श्रम की बात ताे छाेड़ ही दीजिए. इसी का नतीजा है बीमारी उन्हें तेजी से घेर रही है. जाे

बीमारियां पहले 40-45 साल में हाेती थी, अब वह बीमारी 18-20 साल के युवक काे हाे रही है. शहराें में

शुद्ध हवा कहां मिलेगी. पेड़ ताे काट दिये गये. सुबह टहलने निकलिये ताे बगल से काली धुआं छाेड़ती

इतनी गाड़ियां निकलेंगी कि सांस लेना मुश्किल हाे जायेगा. लेना का देना पड़ रहा है यानी टहलने से

जितना फायदा हाेता है, उससे ज्यादा नुकसान का डर हाेता है. अब चेतने का वक्त है. खासताैर पर

माता-पिता के लिए. वे देखें कि कैसे वे बच्चाें के जिद काे पूरा कर उनकी जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं.

बच्चाें काे भी समझना हाेगा कि जिंदगी उनकी अपनी है. अब उन्हें तय करना है कि वे कैसा जीवन जीना

चाहते हैं. अगर लंबी जिंदगी चाहिए, स्वस्थ आैर बेहतर जीवन चाहिए, ताे थाेड़ी कुर्बानी देनी हाेगी. जीभ

पर काबू पाना हाेगा. शरीर से काम लेना हाेगा. पुरानी पद्धति की आेर जाना ही हाेगा. चकाचाैंध की जिंदगी

से जाे बाहर निकलकर असलियत काे समझेगा, वह ही इस स्वस्थ रह पायेगा. हर किसी काे जीवन जीने

की कला सीखनी हाेगी.