aapne baat

  • Aug 7 2017 1:10PM

अपनी बात

याद कीजिए, सात साल पहले जब झारखंड में पंचायत चुनाव की डुगडुगी बजी थी, तो कितने प्रकार की आशंकाएं थी. अधिकांश लोगों को लग रहा था कि पंचायती राज व्यवस्था झारखंड में फेल हो जायेगी. भ्रष्टाचार बढ़ जायेगा. पंचायतों में लूट मचेगी. और न जाने क्या-क्या बातें हो रही थी. अब राज्य में पंचायती राज का दूसरा टर्म चल रहा है. मात्र सात सालों में ही पंचायती राज व्यवस्था आकार ले रहा है. तमाम तरह के दुष्प्रचार के बावजूद पंचायती राज व्यवस्था अधिकांश इलाकों में प्रभावी भूमिका में आने लगा है.

आपको अभी हाल का एक वाकया बताता हूं. बोकारो जिला परिषद की सदस्य पुष्पा देवी कस्तूरबा गांधी विद्यालय का निरीक्षण करने पहुंची, तो वहां विद्यालय की वार्डन नहीं थी. थोड़ी देर बाद वार्डन पुलिस दलबल के साथ पहुंच गयी. वार्डन का कहना था कि विद्यालय निरीक्षण के लिए जिला परिषद की सदस्य को जिला शिक्षा विभाग का अनुमति पत्र दिखाना चाहिए. जबकि पंचायती राज व्यवस्था में पंचायत के अंतर्गत आनेवाले तमाम सरकारी शिक्षण संस्थानों के निरीक्षण का अधिकार पंचायती राज प्रतिनिधियों को है. खैर पुष्पा देवी वार्डन के प्रतिरोध के बावजूद स्कूल का निरीक्षण किया. वहां के छात्राओं से बातचीत की और इसकी पूरी सूचना मीडियाकर्मियों को भी उपलब्ध कराया. 

पंचायती राज व्यवस्था में जो ताकत पंचायती राज प्रतिनिधियों को मिली है, उसका उपयोग करके पंचायत में विकास की गंगा न सही, कम से कम जो मूलभूत जरूरतें हैं, उसे जरूर पूरा किया जा सकता है. पंचायतनामा के अंक में हमने झारखंड के ऐसे ही पंचायतों को शामिल किया है. इन पंचायतों में पंचायत प्रतिनिधियों ने कैसे अपनी जो शक्तियां हैं, उसका इस्तेमाल किया. फिर पंचायत में बदलाव के लिए बहुत ही सार्थक प्रयास किया. इसका नतीजा यह रहा है कि पंचायतों में जरूरत के मुताबिक विकास भी हुआ है और लोगों के लिए सहूलियतें भी बढ़ी है. पंचायतों में बदलाव के इन उदाहरणों को आपके सामने रखने का मकसद यह भी है कि अगर आपके पंचायत प्रतिनिधि यह बताते हैं कि उनके हाथ में कुछ भी नहीं है, तो उन्हें बताइए कि उनके हाथों में बहुत कुछ है. अगर वे चाहेंगे, तो पंचायत में बदलाव भी होगा और जो परेशानियां हैं, उसका समाधान भी निकलेगा. 

पंचायतनामा के पास पंचायत प्रतिनिधियों की हमेशा यह शिकायत आती रहती है कि सब कुछ रांची से तय हो जाता है. योजना बनाओ अभियान केवल नाम के लिए गांव में होता है. दरअसल योजनाएं रांची में ही बन जाती है. बाद में केवल दिखाने के लिए पंचायतों में ग्रामसभा करने का ढोंग होता है. ऐसे पंचायत प्रतिनिधियों के लिए भी यह अंक महत्वपूर्ण है. इस अंक में हमने वैसे उदाहरणों को सामने रखा है, जिसमें पंचायतों ने अपनी जरूरतों के अनुसार योजनाओं को ग्रामसभा में रखा. फिर ग्रामसभा के अनुमोदन पर ही विकास के काम हुए. इस अंक में ऐसे कई उदाहरण हैं, जो पंचायती राज को लेकर काफी उम्मीद जगाते हैं. झारखंड के कई पंचायतों में कैसे विकास का काम हो रहा है. उसका अनुकरण करके भी बहुत सारे पंचायतों में विकास आसानी से हो सकता है.  आपको यह अंक कैसा लगा, हमें जरूर बताइएगा. आप हमें टेलीफोन, मोबाइल, ई-मेल और व्हाट्सएप पर संपर्क कर सकते हैं.

नमस्कार,

संजय मिश्र

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