aapne baat

  • Jun 21 2017 12:55PM

विकास को संजोता हिंदी पाक्षिक

मैट्रिक व इंटर के नतीजे आने के बाद से ही कोहराम मचा हुआ है. नेता, अधिकारी, मीडिया से लेकर सभी छाती पीट रहे हैं. खराब रिजल्ट को लेकर रोने-धोने का कार्यक्रम तकरीबन 15 दिन चल चुका है. ताजा घटनाक्रम के मुताबिक, नेतरहाट स्कूल के प्राचार्य को भी रिजल्ट खराब होने पर कारण बताओ नोटिस जारी हो चुका है.

खराब रिजल्टवाले स्कूलों के शिक्षकों का वार्षिक वेतन बढ़ोतरी रोक दिया गया है. इतना कुछ होने के बाद भी कहीं से भी कोई भी अधिकारी, यहां तक की शिक्षा मंत्री भी आश्वस्त नहीं हो पायी हैं कि अगले साल सब कुछ ठीक हो जायेगा. इसका मुख्य कारण है कि समस्या कहां है, सबको पता है, लेकिन समस्या की जड़ का इलाज कोई नहीं करना चाहता है.

देशभर की प्राथमिक शिक्षा पर सालाना जारी होनेवाली प्रथम की रिपोर्ट में यह साफ है कि झारखंड में जो बच्चा पांचवी कक्षा में है, उसे शुद्ध-शुद्ध न तो हिंदी की वर्णमाला आती है और न ही दूसरी कक्षा के गणित के सवाल को हल कर सकता है. झारखंड में प्राथमिक शिक्षा की दुर्गति देखनी हो, तो रांची के ही कुछ इलाकों में चलनेवाले सरकारी स्कूलों में आ जाइए, आपको पता चल जायेगा कि क्या हालत है. गांवों में तो हालात और भी खराब हैं. स्कूल में पढ़ाई को छोड़ कर सब काम चल रहा है. शिक्षक पढ़ाई को छोड़ कर अन्य सभी कामों में व्यस्त हैं. गांव के स्कूलों को देखनेवाला कोई नहीं है. पंचायत स्तर पर ग्राम शिक्षा समितियां गठित हो गयी हैं, लेकिन कागजों पर. पंचायत प्रतिनिधियों को स्कूलों से कोई मतलब नहीं है. अपने ही बच्चों को खाने में क्या मिल रहा है, यह भी देखने की फुर्सत पंचायती राज प्रतिनिधियों को नहीं है. यह है झारखंड में प्राथमिक शिक्षा की जमीनी सच्चाई. 

प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को कैसे पंचायती राज व्यवस्था से बदला जा सकता है. कैसे पढ़ाई का स्तर सुधर सकता है. इसके भी उदाहरण राज्य के कई जिलों में हैं. लेकिन, इन उदाहरणों से सीख लेने को कोई तैयार नहीं है. राज्य सरकार भी प्राथमिक शिक्षा की जिम्मेवारी पूरी तरह से पंचायतों को सौंपने में आनाकानी कर रही है. शिक्षक भी नहीं चाहते हैं कि उन्हें पंचायत को रिपोर्ट करना पड़े. जबकि, यह साफ हो गया है कि प्राथमिक शिक्षा में सुधार का काम पंचायती राज व्यवस्था के तहत ही हो सकता है. पंचायतों ने अगर प्राथमिक स्कूलों में सकारात्मक हस्तक्षेप शुरू कर दिया, तो व्यवस्था बदलने में एक दिन भी नहीं लगेगी. जरा कल्पना कीजिए, मुखिया जी अगर रोज शिक्षकों की हाजिरी चेक करने लगें. शिक्षा समितियां स्कूलों की व्यवस्था देखने लगे, तो क्या शिक्षक फांकी मार सकते हैं. क्या छात्र स्कूल से गायब रह सकते हैं. अगर, अच्छा रिजल्ट चाहिए, तो समाज को, निर्वाचित प्रतिनिधियों को हस्तक्षेप करना ही होगा. 

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नमस्कार,

संजय मिश्र

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