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  • Apr 21 2017 12:56PM

आखिरकार बदलाव इस रास्ते ही आयेगा समाज, गांव, राज्य, देश और पत्रकारिता में भी...

आखिरकार बदलाव इस रास्ते ही आयेगा  समाज, गांव, राज्य, देश और पत्रकारिता में भी...

निराला बिदेसिया

छह दिनों तक यानि 24 से 29 मार्च तक प्रभात खबर परिसर में एक खास आयोजन चला. झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) और ग्रामीण अखबार पंचायतनामा की ओर से पत्रकारिता प्रशिक्षण का कार्यक्रम था. सामान्य प्रशिक्षण नहीं था, सामान्य आयोजन नहीं था यह. खास था. बहुत ही खास. सात जिले की 30 महिलाएं और लड़कियां प्रशिक्षु के तौर पर पहुंची थी. सुदूर गांव से लेकर कस्बे तक की महिलाएं. अधिकांश वैसी, जो पहली दफा रांची आयी थी. ये महिलाएं और लड़कियां आजीविका मिशन से जुड़कर अपने-अपने इलाके में बदलाव की नयी इबारतें रच रही हैं. हर प्रतिभागी की खुद की कहानी पत्रकारिता के लिए एक कहानी थी. ऐसी कहानी, जिस पर मुख्यधारा की पत्रकारिता ने ध्यान देना छोड़ दिया है. एक प्रशिक्षु प्रतिभागी ऐसी कि नौवीं क्लास में पढ़ते हुए शादी हुई, वह दो बच्चे की मां बनी, फिर से पढ़ना शुरू की, अब पीजी में पढ़ाई कर रही हैं. पीएचडी करने का इरादा है.

एक प्रतिभागी ऐसी, जो खुद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कनेक्ट कर रही थी. वह पांकुड़ से आयी थी. पांकुड़ के एक गांव से. मुस्लिम लड़की. वह चाहती है कि एक बार पीएम से मिले, पूछे कि आप चाय बेचते थे और पीएम बन गये, तो वह भी बीड़ी बेचते-बेचते नरेंद्र मोदी बनना चाहती है. पीएम बने, न बने, मोदी बनना चाहती है, जिनकी वह दिवानी है. कई ऐसी कहानियां. लातेहार के बरवाडीह की दो प्रतिभागियां आयी थी. आसपास के गांव की. एक मुस्लिम लड़की बोली कि उसके समुदाय ने मस्जिद में बैठकी कर यह तय कर लिया है कि जो दहेज लेगा या देगा,उसका बहिष्कार होगा, जुर्माना लगेगा और इसका गहरा असर हुआ है. उसके साथ जो हिंदू लड़की आयी थी वह छह दिनों के प्रशिक्षण में रोजाना यही पूछती रही कि हम अपने समुदाय के लोगों को कैसे प्रेरित करें सर, पत्रकारिता का कैसे उपयोग करें कि हमारे समुदाय में भी यह काम हो जाये. सबसे पहले यही काम करना है पत्रकारिता से. 

सिमडेगा जिले के कोलेबिरा से आयी एक महिला छह दिनों में सब कुछ सीखने के बीच इस एक सवाल के साथ खड़ी रहीं कि उन्हें अपने गांव, जवार, इलाके में शराबबंदी के लिए प्रेरित करना है, क्या उपाय लगे. पत्रकारिता अखबारों, टीवी, रेडियो या सोशल मीडिया से इतर कैसे हो सकती है और उसका असर कैसे हो सकता है. इससे इतर इसलिए, क्योंकि उनके गांव में न अखबार जाता है, न टीवी है, न स्मार्टफोन, लेकिन वह पत्रकारिता करना चाहती हैं, पत्रकारिता के जरिये अपने गांव-जवार को बदलना चाहती हैं. हर किसी के पास एक कहानी थी. जितनी बड़ी कहानी, उससे बड़ी उनका जिद, उनका जुनून. अपने इलाके के खूबसूरत पक्ष को उभारने की ललक. अपने नायकों के नायकत्व को उभारने की लालसा. टीवी की दुनिया में कौन नायक बना है. कौन-कौन से नये शब्द गढ़े जा रहे हैं. कौन नये नायक उभरे हैं. सोशल मीडिया की दुनिया में क्या चल रहा है. ये वह नहीं जानती. जो जानती हैं, उनकी उसमें रूचि नहीं. वे इनोसेंट हैं इसलिए वे सहजता से कहती सर, एक लाइन की तो बात है. पहले हम बदलेंगे, फिर अपने परिवार को बदलेंगे, समाज को बदलेंगे, गांव को बदलेंगे, जवार को बदलेंगे, तो क्या देश नहीं बदलेगा? ऐसे कई सवाल छह दिन में आये. बेसवाल कर देनेवाले सवालों का पुलिंदा था उनके पास. पहले दिन सीख गयी कि पत्रकार को न्यायमूर्ति नहीं बनना है. जज नहीं बनना है. उसका काम सूचना लेना-देना, शिक्षित करना, जागरूक करना है. इतना ही बताया गया और इसे ही गांठ की तरह बांधकर सवाल पूछने लगी कि फिर अखबारों में जो छपता है, टीवी में जो आता है उसमें पत्रकार जज जैसे क्यों होते हैं? वे जागरूक करने की बजाय दूसरा काम क्यों करते हैं. इन सवालों का जवाब नहीं था. 

30 प्रशिक्षु महिला पत्रकार ऐसे सवालों के साथ लौटी हैं. सूचनाओं को खबर में बदलने की टैक्टिस के साथ. उसका प्रैक्टिस कर लेने के बाद. इन छह दिनों में तरह-तरह के अधिकारियों से मिलकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा है. बिरसा मुंडा की समाधि स्थल से उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग करने की शुरुआत की. 29 की शाम जब वे लौट रही थी, तो उनकी आंखों में एक चमक थी. इन छह दिनों में हमने भी बहुत कुछ सीखा. पत्रकारिता कहां से कहां पहुंच गयी है और कैसे जनता से कट गयी है या जनता उससे कटती  जा रही है, यह देखने-समझने को करीब से मिला. 

काली सड़क के नीचे पत्रकारिता पहुंच नहीं रही और काली सड़क के नीचे वाले भी अब अपनी पत्रकारिता चाहते हैं. काली सड़क से नीचेवाली आबादी का पत्रकारिता से भरोसा नहीं उठा है. पत्रकारिता अब भी उन्हें बदलाव का एक सशक्त हथियार लगता है. पत्रकारिता में असीम संभावनाएं नजर आती हैं. पत्रकारिता के जरिये वे बदलाव चाहती हैं, लेकिन अपनी बातों के साथ. 

(इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के वरिष्ठ प्रशिक्षक व 

वरिष्ठ पत्रकार).