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  • Feb 16 2017 8:56AM

डायन-बिसाही : मिशन से ही निकलेगा समाधान

डायन-बिसाही : मिशन से ही निकलेगा समाधान

सामाजिक मनोवैज्ञानिक समस्या

झारखंड में डायन-बिसाही के नाम पर महिलाओं पर अमानवीय प्रताड़ना का सिलसिला आज भी जारी है. राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम, 2001 बना, बावजूद इसके इसकी संख्या में कमी नहीं आ रही है. इस सामाजिक कुरीतियों पर अंकुश लगाने के लिए सामाजिक संगठनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. इस गंभीर समस्या के निराकरण के लिए जमशेदपुर की एक संस्था फ्लैक यानी फ्री लिगल एड कमेटी के प्रेमचंद और उसके सहयोगियों की भूमिका भी अहम रही है. पिछले 40 सालों से डायन-बिसाही रूपी इस सामाजिक कुरीतियों को जड़ से मिटाने के उद्देश्य से अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया.

बिहार और झारखंड में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम को लागू कराने में महती भूमिक निभायी. साल 2009 में स्टार वर्ल्ड और नवंबर 2016 में जर्मनी की एक टीवी चैनल एआरडी ने प्रेमचंद और डायन-बिसाही के खिलाफ चलाये जा रहे आंदोलन पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनायी. प्रेमचंद मानते हैं कि इस गंभीर समस्या को तभी दूर किया जा सकता है, जब सभी की नैतिक व मानवीय जवाबदेही बने. महिलाओं पर होने वाले अत्चायार अपने-आप में अमानवीय है. इसकी समस्या, सहयोग व समाधान के बारे में प्रेमचंद से विस्तार से बातचीत की समीर रंजन ने. पेश है बातचीत का मुख्य अंश. 

सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर शिरकत करने वाले प्रेमचंद राज्य से सामाजिक कुरीतियों को पूर्णत: खत्म करने को कृतसंकल्पित हैं. प्रेमचंद और इनका सामाजिक संगठन फ्लैक यानी फ्री लिगल एड कमेटी के सदस्यों ने सामाजिक कुरीतियों विशेषकर डायन प्रथा के रोकथाम के लिए तत्कालीन बिहार सरकार और फिर झारखंड सरकार को कानून बनाने को बाध्य किया. 

प्रेमचंद और उसके सहयोगियों ने बिहार में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम, 1999 को लागू करने और झारखंड राज्य बनने के बाद इसी अधिनियम को साल 2001 में राज्य में लागू कराने में महती भूमिका निभायी. साल 1976 में अपने सहयोगी फैसल अनुराग के साथ मिलकर ‘क्रांतिनाद’ पत्रिका का प्रकाशन किया. 

 इसी बीच मेरी टेलर का सामाजिक कार्यकर्ता जवाहरलाल शर्मा को एक पत्र मिला, जिसमें भारतीय जेलों में बंद कैदियों और विचाराधीन कैदियों की स्थिति के बारे में जिक्र था. इसी दौरान पता चला कि कई ऐसे भी विचाराधीन कैदी हैं, जिनकी सुनवाई वर्षों-बरस से नहीं हुई. साल 1991 की घटना ने प्रेमचंद और उसके साथियों को अंदर से हिला दिया, जब जमशेदपुर के करनडीह स्थित मनीकुई में डायन के नाम पर एक महिला पर जानलेवा हमला हुआ. बचाव करने पर उक्त महिला के पति और एक बेटे को मार डाला. वैसे तो पांच सदस्यों के साथ मिलकर सामाजिक संगठन फ्लैक का गठन 1977 में ही हो गया था, लेकिन करनडीह की घटना ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और इस दिशा में तेजी से काम करने शुरू कर दिये. 

गांव-गांव में घूमना शुरू किया तो शुरूआती दौर में 10-15 महिलाओं के बारे में जानकारी मिली कि उसे डायन-बिसाही का आरोप लगाकर प्रताड़ित किया जा रहा है. जानकारी मिलते ही संस्था के सदस्य गांवों में जाते और ग्रामीणों को इस अंधिवश्वास के खिलाफ जागरूक करने की कोशिश करते. प्रेमचंद कहते हैं कि इस दौरान कई बार कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ा. लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से साल 1994 में एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘क्या मोहिया की मां डायन है?’ बनाया गया, जो दूरदर्शन पर भी दिखाया गया. 

जन जागरण के लिए बनायी टीम

डायन के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित करने के खिलाफ जन जागरण तेज करने के उद्देश्य से साल 1995 में पोस्टर प्रदर्शनी व नुक्कड़ नाटक के माध्यम से लोगों को जागरूक करने के लिए एक टीम बनायी गयी, जो ग्रामीणों को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे. डायन प्रथा के रोकथाम के लिए साल 1995 में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम का ड्राफ्ट बनाकर बिहार सरकार को भेजा गया. इसी बीच तत्कालीन पश्चिमी सिंहभूम जिले (वर्तमान में सरायकेला-खरसावां जिला) के कुचई क्षेत्र में डायन के नाम पर एक ही परिवार के सात लोगों की हत्या की ह्दयविदारक घटना घटी. इस घटना में एक बच्ची किसी तरह बच गयी, जिसकी अब शादी भी हो गयी है. तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे (वर्तमान में विकास आयुक्त) ने इसे गंभीरता से लेते हुए गांवों में जन-जागरण अभियान चलाने पर जोर दिया. इसी का परिणाम है कि 25-26 मई 1996 को जमशेदपुर में डायन के आरोप से पीड़ित महिलाओं का दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गयी थी. 

प्रेमचंद कहते हैं कि इस तरह का कार्यशाला संभवत: देश का पहला कार्यशाला था, जिसमें पीड़ित महिलाओं से उसकी दास्तां सुनी गयी और इसका समाधान निकालने का प्रयास किया गया. इस कार्यशाला में करीब 24 पीड़ित महिलाओं ने शिरकत की. इस सम्मेलन में तत्कालीन पश्चिम सिंहभूम के उपायुक्त अमित खरे और पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त संजय कुमार (वर्तमान में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव) ने भी शामिल हुए थे. 

ऑपरेशन अंधविश्वास अभियान

प्रेमचंद कहते हैं कि साल 1997 में सरायकेला में ऑपरेशन अंधविश्वास अभियान चलाया गया. इसमें तत्कालीन पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त एसकेजी रहाटे (वर्तमान में गृह सचिव) का अभूतपूर्व योगदान मिला. जिला प्रशासन की ओर से कोलेबिरा में पीड़ित महिलाओं के लिए पुर्नवास सेंटर बनाया गया था, लेकिन कुछ समय बाद विभागीय उदासीनता के कारण इसे बंद कर दिया गया. 

प्रेमचंद कहते हैं कि जब तक सभी में पूर्णरूपेण इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक इस गंभीर समस्या को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता. इस दौरान इसके रोकथाम के लिए कई अधिकारियों से मिले. गांवों में जागरूकता लाने के उद्देश्य से अभियानों को तेज किया, लेकिन नतीजा सकारात्मक नहीं मिला. 

साल 2000 में यूनिसेफ के साथ मिलकर राज्य के चार जिले रांची, पूर्वी सिंहभूम, देवघर व बोकारो में जन-जागरण और सर्वेक्षण का काम किया गया. इन चार जिलों के 26 प्रखंड अंतर्गत 191 पंचायत और 332 गांवों में सघन अभियान चलाया गया. इस अभियान के तहत डायन-बिसाही के नाम पर करीब 176 महिलाओं पर प्रताड़ना का मामला सामने आया. ग्रामीणों को कई तरह से समझाया गया कि डायन-बिसाही सिर्फ अंधविश्वास और मिथ्या पर आधारित है. इसे स्वीकार ना करें, लेकिन समस्या यथावत ही रही. 

प्रभावित राज्य : शुरुआती दौर में देश के नौ राज्य इस समस्या से ग्रसित थे. धीरे-धीरे यह समस्या देश के 15 राज्यों में फैल गयी. इन राज्यों में झारखंड, बिहार, केरल, असम, मेघालय, बंगाल, ओड़िशा, राजस्थान, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र है.

छह राज्यों में बना कानून : झारखंड, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और असम.

अंधविश्वास उन्मूलन मिशन आधारित कार्यक्रम पर जोर

प्रेमचंद कहते हैं कि यह सामान्य समस्या नहीं है, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञानिक समस्या है. इसे सिर्फ अभियान चला कर खत्म नहीं किया जा सकता. इसके लिए मिशन आधारित कार्यक्रम पर जोर देना होगा. इसी को देखते हुए प्रेमचंद ने ‘अंधविश्वास उन्मूलन मिशन’ पर जोर देना शुरू किया. तमाम कारक तत्वों पर ध्यान देते हुए उन्होंने कहा कि ग्रासरूट से लेकर ऊपर के स्तर तक काम करने, इसके रोकथाम के लिए सभी में इच्छा शक्ति का संचार होना, ओझा-गुनी को ग्राम वैद्य की उपाधि देकर उसे इस मिशन से जोड़ना, हर्बल पार्क का स्थापना, पीड़ित महिलाओं व ओझा को अपने-अपने गांवों में इसके रोकथाम के लिए नेतृत्व प्रदान करना, सामाजिक सशक्तिकरण आदि पर जोर देने से इस गंभीर समस्या पर काबू पाया जा सकता है. वर्तमान में इस मिशन में स्काउट व गाइड के अधिकारियों समेत बच्चों का भी सहयोग मिल रहा है, लेकिन जब तक इसकी रोकथाम के लिए हर स्तर पर लोगों की सहभागिता नहीं होगी, तब तक इस पर पूर्णरूपेण अंकुश लग पायेगा, इसमें संदेह ही है. 

इबारत

1976  क्रांतिनाद पत्रिका का प्रकाशन

1977 फ्लैक यानी फ्री लिगल एड कमेटी का गठन

1991 जमशेदपुर के करनडीह स्थित मानीकुई में डायन के आरोप में महिला पर जानलेवा हमला, बीच-बचाव में पति व एक बेटे की मौत

1994 डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘क्या मोहिया की मां डायन है?’ का निर्माण, दूरदर्शन पर प्रसारित

1995 तत्कालीन पश्चिमी सिंहभूम जिले के कुचई (अब सरायकेला-खरसावां) में डायन के आरोप में एक ही परिवार के सात लोगों की नृशंस हत्या, एक बच्ची बची

1996 पीड़ित महिलाओं की कार्यशाला में 28 पीड़ित महिलाओं ने की शिरकत

1997 डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘आखिर कब तक’ दूरदर्शन पर प्रसारित

पटना के एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट में 40 पीड़ित महिलाओं समेत 25 एनजीओ के सदस्यों का दो दिवसीय कार्यक्रम

सरायकेला से ‘ऑपरेशन अंधविश्वास’ की शुरुआत

कोलेबिरा में पुनर्वास सेंटर की स्थापना, बाद में सरकार ने वापस लिया

1999 बिहार विधानसभा में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम पारित, लेकिन राज्यपाल ने मांगा स्पष्टीकरण

20 अक्तूबर को इस अधिनियम पर राज्यपाल ने किये हस्ताक्षर, डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम बना कानून

27-28 नवंबर को पटना में पीड़ित महिलाओं व बुद्धिजीवियों का सम्मेलन दीर्घकालिन समाधान पर चर्चा

2001 तीन जुलाई को झारखंड डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम, 1999 को स्वीकृति, बना कानून

नवंबर माह में राजधानी रांची में सेमिनार आयोजित

2002 दस वर्षीय अंधिवश्विास निरोधक योजना पेश

2005 इस अधिनियम को केंद्रीय कानून का दर्जा देने संबंधी प्रयास