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  • Apr 16 2019 2:28PM

चाैकस रहें मतदाता

चाैकस रहें मतदाता

अनुज कुमार सिन्हा

आमताैर पर पांच साल में एक दिन ताे मतदाता का ही हाेता है. वह दिन हाेता है मतदान का. हालांकि, लगभग एक माह तक राजनीतिज्ञ (चुनाव में खड़ा हाेनेवाले नेता आदि) 120 डिग्री तक झुक कर मतदाताआें काे प्रणाम करते हैं, एक से एक वादा करते हैं, रिश्ता-नाता बताते हैं. इधर चुनाव खत्म, उधर ये सब बंद. हां, कुछ नेता अपवाद हाेते हैं जाे सालाें भर मतदाताआें के संपर्क में रहते हैं, उनके सुख-दुख में शामिल हाेते हैं. ऐसे नेताआें काे चुनाव के वक्त बहुत चिंता नहीं हाेती. लाेकसभा चुनाव सामने है. मतदाताआें के द्वार पर प्रत्याशियाें का आना-जाना शुरू हाे गया है. कुछ नये चेहरे हैं, कुछ पुराने चेहरे. कुछ चेहरे ऐसे भी हाेंगे जाे पांच साल बाद दिखेंगे.

पांच साल में ऐसे नेताआें के दर्शन हाे रहे हाेंगे. यही वह वक्त है जब जनता (मतदाता) सवाल करे. हुजूर, आपने क्या किया क्षेत्र के लिए (जाे पुराने हैं उनसे), जाे नये प्रत्याशी हैं, वे अपने साथ वादाें का पिटारा लेकर जायेंगे, हम ये करेंगे, हम वे करेंगे. मतदाताआें काे ऐसे वक्त पर चाैकस रहने की जरूरत है. हर मतदाता जानता है कि किसने काम किया है, किसने नहीं. काैन सा प्रत्याशी कैसा है? संचार क्रांति के इस युग में काेई चीज किसी से छुपी नहीं है. मतदाता धैर्य से रहें आैर एक-एक कर अपने नेताआें काे पहचाने. मतदाता भी बेचारे क्या करें. आज काेई इस दल में है, टिकट कटा ताे दूसरे दल से चुनाव मैदान में हैं. यह लाेकतंत्र है.

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हर किसी काे चुनाव लड़ने का संवैधानिक अधिकार है आैर इसलिए काेई किसी काे चुनाव लड़ने से राेक नहीं सकता. लेकिन इस बात काे भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर यह लाेकतंत्र है ताे इसी लाेकतंत्र में जबरदस्त राजनीति भी हाेती है. किसी काे पैसा देकर खड़ा कराना आैर पैसा दे कर चुनाव में खड़ा हाेने से राेकना, दाेनाें चुनाव में चलता है. यह काेई नयी बात नहीं है. हर चुनाव में, लगभग हर दल इस हथकंडा काे अपनाते हैं, अपनी रणनीति बनाते हैं. अब जनता काे तय करना है कि ऐसे लाेगाें के साथ रहे या विराेध करे (मत से). अच्छा प्रत्याशी चुनेंगे, संसद अच्छी बनेगी, देश अच्छा बनेगा, खराब चुनेंगे ताे पांच साल पछतायेंगे. संभव हाे आप इन राजनीतिज्ञाें से बहुत ही नाराज हाें आैर वाेट नहीं देने के लिए साेच रहे हाें. वाेट नहीं देना हल नहीं है.

अपने अधिकार का प्रयाेग करें, वाेट देने जायें. हां, जिससे आप सहमत नहीं हैं, उसे सबक सिखायें. आपके पास वाेट का मजबूत हथियार है. उसका प्रयाेग अवश्य करें. लाेभ में न पड़ें. जाति-समुदाय के नारे भी लगेेंगे. इससे बाहर निकलना हाेगा, चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडा अपना जायेगा. इसे आपकाे पहचानना हाेगा. इसलिए अाप मतदाताआें काे वाेट देने के लिए हर हाल में जाना हाेगा, बेहतर प्रत्याशी काे चुनना हाेगा. राजनीतिक दल भी मतदाताआें की कमजाेरी काे जानते हैं. इसके लिए चुनाव के कई महीने पहले से याेजना बनती है.

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इसका सबसे पहला फार्मूला यह हाेता है कि किसे टिकट दिया जाये कि वह साै फीसदी जीत सके. इसलिए कई बार याेग्य-ईमानदार प्रत्याशी सारे गुण हाेने के बावजूद पीछे छूट जाते हैं. कभी मैदान में फिल्म अभिनेता उतर जाता है ताे कभी खिलाड़ी (हालांकि संविधान सभी काे चुनाव लड़ने का अधिकार देता है). देखना यह चाहिए कि काैन क्षेत्र का, आपकी भलाई कर सकता है, काैन काम सकता है या किसने काम किया है. इसलिए किसी के कहने पर नहीं, अपने विवेक का इस्तेमाल कीजिए, अपने काे इस्तेमाल मत हाेने दीजिए.