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  • Sep 4 2018 1:14PM

किसी के माेहताज नहीं हैं दिव्यांग

किसी के माेहताज नहीं हैं दिव्यांग

अनुज कुमार सिन्हा

एक खबर आयी थी कि दिव्यांग निराश हैं आैर उन्हें अपने अधिकार पाने के लिए परेशानियाें का सामना करना पड़ रहा है. उन्हें सरकारी याेजनाआें का लाभ पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. मामला सिर्फ झारखंड का नहीं है. वास्तव में दिव्यागाें काे इस समाज में परेशानियाें का सामना करना पड़ता है आैर अपनी इच्छाशक्ति, परिश्रम आैर संघर्षक्षमता के बल पर यही दिव्यांग आगे बढ़ रहे हैं. ये दिव्यांग ऐसी-ऐसी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं, जाे शारीरिक ताैर पर साै फीसदी ठीक रहनेवाले नहीं कर पाते.

देश में दिव्यांगाें की आबादी लगभग 2.68 कराेड़ है, इसमें झारखंड के लगभग साढ़े सात लाख दिव्यांग भी शामिल हैं. चिंता की बात यह है कि यह संख्या हर जनगणना में तेजी से बढ़ती जा रही है. 2001 से 2011 के बीच यह वृद्धि 22.4 फीसदी रही. यह बड़ी संख्या है इसलिए समाज आैर सरकार दाेनाें की जिम्मेवारी बनती है कि दिव्यागाें काे आगे बढ़ाने में वे सहयाेग करें. उन्हें उनका हक दें. यहां एक बात स्पष्ट हाेनी चाहिए कि दिव्यांग किसी के माेहताज नहीं हैं. जहां सरकारी सहायता मिलती है, वहां ठीक है लेकिन जहां नहीं मिलती, वहां भी दिव्यांग अपने बल पर इतिहास रच रहे हैं. किसी से पीछे नहीं हैं.

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ठीक है ईश्वर ने उनके साथ अन्याय किया. किसी के देखने की, किसी के सुनने की या किसी के चलने आदि क्षमता में कमी ला दी. इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वे कुछ नहीं कर सकते या किसी काम के नहीं हैं. हां, उन्हें थाेड़ा सहयाेग चाहिए. बाकी काम करने में वे सक्षम हैं. सरकार ने अनेक याेजनाएं बनायी हैं, नाैकरियाें में आरक्षण की व्यवस्था की है. वे सब उन्हें मिले आैर समय पर मिले, यही वे चाहते भी हैं. इतिहास गवाह है कि इन्हीं दिव्यागाें ने बड़े-बड़े काम किये हैं. भरे पड़े हैं उदाहरण. चाहे मामला हाे विज्ञान के क्षेत्र के स्टीफन हॉकिंस, अलबर्ट आइंस्टीन (जाे तीन साल तक बाेल नहीं सके थे), खेल (पटाैदी, भागवत चंद्रशेखर, शेखर नायक, अरूणिमा सिन्हा) या नृत्य-संगीत (सुधाचंद्रण, रवींद्र जैन) का हाे, हर क्षेत्र में इन दिव्यांगाें ने झंडा बुलंद किया है.

सुधा चंद्रण का एक पैर बचपन में ही काटना पड़ा था आैर वह देश-दुनिया में कत्थक में नाम कमाया. रवींद्र जैन की आंख की राेशनी समाप्त हाे गयी थी, लेकिन म्यूजिक डॉयरेक्टर बन कर उन्हाेंने प्रसिद्धि पायी. गिरीश शर्मा ने एक पैर रहते बैडमिंटन काेर्ट में कमाल दिखाया. टी-20 ब्लाइंड क्रिकेट में शेखर नायक चैंपियन बने. अरूणिमा सिन्हा का एक पैर ट्रेन दुर्घटना में काटना पड़ा आैर दाे साल के अंदर उन्हाेंने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ कर इतिहास रचा. भागवत चंद्रशेखर का एक हाथ पाेलियाेग्रस्त था, लेकिन लेग स्पिन आैर गुगली में उनका काेई जवाब नहीं था.

 

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टाइगर पटाैदी की एक आंख कार दुर्घटना में चली गयी थी, लेकिन एक आंख की राेशनी से उन्हाेंने टेस्ट में दाेहरा शतक जड़ा, दुनिया के तेज गेंदबाजाें का सामना किया, यह क्या काेई कम बड़ी उपलब्धि है. अगर ये विकलांग मानसिक दाैर पर हार गये हाेते ताे क्या इतिहास रच पाते, काेई इन्हें याद कर पाता. अपनी इच्छाशक्ति आैर संघर्ष क्षमता के बल पर ये आगे बढ़े, न कि किसी की दया पर. यही बात लागू हाेती है देश के अन्य विकलांगाें पर.

वे अपनी क्षमता काे पहचाने. उनमें अपार क्षमता है. इसके बल पर दुनिया का हर काम वे कर सकते हैं. लेकिन, उन्हें अवसर चाहिए आैर यह अवसर उन्हें समाज देगा. सरकार देगी. इन दिव्यागाें काे सम्मान केसाथ जीने का अधिकार है आैर यही उन्हाेंने साबित भी कर दिया है. सरकारी याेजनाआें का लाभ सही व्यक्ति तक समय पर पहुंच जाये. समाज संवेदनशील हाे (बस में आप बैठे हाें आैर काेई विकलांग सीट के अभाव में खड़ा हाे, ताे खुद उसे अपनी सीट दे दीजिए), सरकारी अफसर उनके साथ न्याय करें (बहाली के दाैरान अनावश्यक परेशान न करें), ताे ये विकलांग किसी मामले में पीछे नहीं रहेंगे