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  • Sep 16 2019 12:42PM

सुरक्षा, लाइसेंस आैर परेशानी

सुरक्षा, लाइसेंस आैर परेशानी

अनुज कुमार सिन्हा

देहात में एक कहावत है- जेतना के बाबू नहीं, उतना के झुनझुना. यही कहावत अब चरितार्थ हाे रही है वाहन मालिकाें-चालकाें के साथ. वाहन की कीमत 20 हजार आैर दंड 25 हजार. हेलमेट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस, प्रदूषण जांच रिपाेर्ट, रजिस्ट्रेशन आदि सभी की जांच. एक बार ट्रैफिक पुलिस ने राेक लिया, ताे समझ लीजिए खैर नहीं. सुरक्षा के नाम पर कानून में बदलाव कर ऐसी व्यवस्था कर दी गयी है कि वाहन चालक की जिंदगी हराम हाे गयी है. लाेग घराें से निकलने के पहले साै बार साेच रहे हैं. इसमें काेई दाे राय नहीं कि हर साल लाखाें लाेगाें की जान दुर्घटना में जाती है. जान बचाने के लिए हेलमेट आवश्यक है आैर इसका पालन हर हाल में किया जाना चाहिए. इसमें किसी काे आपत्ति नहीं हाेनी चाहिए. जिसे आपत्ति है आैर जाे नहीं पहने, उसे हर हाल में दंड देना चाहिए. दाेपहिये वाहन में अगर पीछे काेई बैठा है, ताे उसे भी पहनना चाहिए, सुरक्षा के लिए. इसमें कहां सवाल उठता है? लेकिन अचानक सारे नियमाें काे राताे-रात लागू कराने पर प्रशासन अड़ जाये, ताे परेशानी बढ़ेगी ही.

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सारा सिस्टम पहले से ध्वस्त है. प्रदूषण जांच कराने काेई जाता नहीं था. अब फाइन काे देखते हुए सबसे पहले प्रदूषण जांच रिपाेर्ट चाहिए. एक-एक केंद्र पर तीन-चार साै लाेग चार-पांच घंटे इंतजार करते हैं. उसके बाद भी इस बात की गारंटी नहीं कि रिपाेर्ट बन ही जाये. जिस शहर में 10 लाख वाहन हाे आैर जहां आधे से ज्यादा वाहनाें के पास प्रदूषण सर्टिफिकेट नहीं हाे, वहां सबसे पहले जांच केंद्र काे बढ़ाना चाहिए. इस पर किसी का ध्यान नहीं है. दाेपहिए वाहनाें की तुलना में बड़े-बड़े ट्रकाें आैर बड़ी बसाें से निकलता काला धुंआ ज्यादा प्रदूषण फैला रहा है, लेकिन वह पकड़ा नहीं जाता. ठीक है कि किसी के पास लाइसेंस नहीं है, अगर है भी आैर उसकी अवधि खत्म हाे गयी है या वाहन का लाइफ (15 साल का) खत्म हाे गया है, ताे उसे भी ठीक कराने के लिए हजाराें की भीड़ डीटीआे कार्यालय में जमा हाे रही है. विभाग के पास साधन का अभाव है आैर इसका खामियाजा लाेग भुगत रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं निकालना चाहिए कि सिस्टम काे क्याें माने या चेकिंग गलत है. नियम काे मानना अतिआवश्यक है.

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लेकिन, इस बात का ध्यान रहे कि बगैर ज्यादा कष्ट दिये सारे नियमाें का पालन करा दिया जाये. कानून बनते हैं लाेगाें की भलाई के लिए, रक्षा के लिए. इसका अनुपालन कराने वक्त इसका ख्याल रखना चाहिए. सीधी भाषा में बात हाे, ताे कह सकते हैं कि पहले हेलमेट पकड़िए. अगर पांच साल का बच्चा मां-बाप के साथ बीच में बैठा है, ताे उसे फाइन मत कीजिए. हां, मां-बाप दाेनाें काे हेलमेट जरूर पहनाइए. सड़काें पर जाे धूम स्टाइल में रफ ड्राइविंग करते हैं, उन्हें दाैड़ा कर पकड़िए, जम कर फाइन कीजिए, ताकि इस हुल्लड़बाजी पर राेक लगे. बाकी नियम भी लागू हाे, लेकिन समय भी दे सरकार. इस बात का ध्यान रहे कि पुलिसकर्मियाें का व्यवहार दाेस्ताना रहे, समझानेवाला रहे. सामान्य नियमाें का अगर किसी ने पालन नहीं किया है, ताे काेई बड़ा अपराधी वह नहीं बन जाता. उसे जिम्मेवार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करे.