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  • Aug 2 2018 11:23AM

रिम्स काे बेहतर बनायें

रिम्स काे बेहतर बनायें

 अनुज कुमार सिन्हा

हजार कमियां हाें, लाख अालाेचना हाे लेकिन सच यही है कि गरीब मरीजाें के लिए रिम्स ही आशा की अंतिम किरण है. हर दिन रिम्स में डेढ़ हजार से ज्यादा मरीज आते हैं आैर इलाज कराते हैं. इनमें बड़ी संख्या में बाहर से लाेग अाते हैं. गांव-देहात से आते हैं. वैसे मरीजाें की संख्या अधिक हाेती है, जिनके पास बड़े अस्पतालाें में इलाज कराने के साधन नहीं हैं, पैसे नहीं हैं. बड़ी उम्मीद लेकर मरीज रिम्स में भर्ती हाेते हैं या इलाज कराते हैं. लेकिन, जब ऐसे गरीब-असहाय मरीजाें के साथ ठगी की जाती है, इलाज और जांच के नाम पर बाहर भेज कर उन्हें बेवकूफ बनाया जाता है, ताे इससे बड़ा पाप आैर कुछ नहीं हाेता. सरकार ने व्यवस्था कि है की रिम्स में या तो मुफ्त या मामूली पैसा लेकर हर प्रकार की जांच हाे, लेकिन हाेता ऐसा नहीं है. अपवाद काे छाेड़ दें, ताे मरीजाें काे कई जांच के लिए बाहर भेजा जाता है. यह कहते हुए कि रिम्स में मशीन खराब है. रिम्स में ऐसी-ऐसी अाधुनिक मशीन हैं (भले ही कुछ काे चलाने वाले विशेषज्ञ नहीं हैं, कुछ मशीनाें काे खराब कर दिया जाता है), जाे झारखंड में कहीं आैर नहीं हैं, लेकिन जब तक इसका उपयाेग नहीं हाे, इसका लाभ गरीब मरीजाें काे नहीं मिले, ऐसी मशीन का काेई मतलब नहीं. हाल में रिम्स में सुधार के लिए कई प्रयास हुए हैं. खुद स्वास्थ्य सचिव निधि खरे कड़ाई से नियमाें काे लागू करने आैर सुविधाआें में बढ़ोतरी करने, सिस्टम को लागू करने में लगी हैं आैर इसका अच्छा परिणाम भी देखने काे मिल रहा है. हां, इसका विराेध भी हाे रहा है. यह सही है कि हर डॉक्टर, हर नर्स या हर कर्मचारी बेईमान, लापरवाह नहीं है. अच्छे लाेग भी हैं, तभी ताे यह संस्थान चल रहा है, लेकिन नियम नहीं मानेंगे, जाे मन करेगा, वह करेंगे, यह कैसे हाे सकता है. डॉक्टर्स कितने भी सीनियर क्याें न हाें, नर्स-कर्मचारी कितने भी पुराने क्याें न हाें, नियम ताे मानना पड़ेगा. उन्हें बायाेमैट्रिक्स सिस्टम से अटेनडेंस बनाना हाेगा. इसमें किसी काे छूट नहीं मिल सकती. सरकार से वेतन लेते हैं, ताे काम करना हाेगा. पूरा देश बदल रहा है. अब वह दिन लद गया, जब सिर्फ रजिस्टर में साइन कर अस्पताल से निकल कर या ताे घर चले जाते या फिर निजी क्लिनिक में पैसा लेकर मरीजाें का इलाज करते. अगर सरकार से एनपीए लेते हैं, ताे अस्पताल में समय ताे देना हाेगा. गरीब मरीज रिम्स इसलिए आते हैं, क्याेंकि मुफ्त में बेहतर से बेहतर डॉक्टर्स से उनका इलाज हाे. कुछ महीने पहले नर्साे ने हड़ताल कर दी आैर कई मरीजाें की जान गयी. ठीक है समस्याएं हैं, मांगें हाेती हैं, लेकिन इसका समाधान हड़ताल नहीं है. सरकार का कुछ नहीं बिगड़ा, बिगड़ा ताे मरीजाें का. गाैर कीजिए डॉक्टर्स की प्रतिष्ठा है, नर्स की प्रतिष्ठा है, इसलिए क्याेंकि मरीजाें काे वे जिंदगी देते हैं, सेवा करते हैं, इलाज करते हैं, भगवान के रूप में सामने हाेते हैं. अगर इलाज नहीं करें, उनकी उपेक्षा करें, तंग करें या मारपीट करें, ताे काैन देगा सम्मान? ताली दाेनाें हाथ से बजती है. अगर चिकित्सक पूरी ईमानदारी आैर मेहनत से इलाज कर रहे हैं, फिर भी मरीज काे लाभ नहीं हुआ, उसकी माैत हाे गयी, ताे डॉक्टर्स की क्या गलती है, जाे उसके साथ मारपीट की जाती है. इन चीजाें काे समझना हाेगा. तभी रिम्स या अन्य संस्थानाें में बदलाव की उम्मीद की जानी चाहिए. मरीज (उनके परिजन भी) आैर डॉक्टर्स (यहां नर्स समेत पूरी टीम की बात हाे रही है) अपनी-अपनी जिम्मेवारी काे समझें, एक दूसरे पर विश्वास करें, ताे काेई दाे राय नहीं कि पूरी व्यवस्था बदल जायेगी.