aapne baat

  • Jul 18 2018 11:23AM

पंचायतनामा : ग्रामीण क्षेत्राें की आवाज

पंचायतनामा : ग्रामीण क्षेत्राें की आवाज

 केके गाेयनका

प्रबंध निदेशक, प्रभात खबर

पंचायतनामा ने दाे साल का सफर तय कर लिया है. आसान नहीं था यह सफर. तमाम चुनाैतियाें का सामना करते हुए यह पाक्षिक अखबार आगे बढ़ा है. एक दशक के दाैरान पत्रकारिता खास ताैर पर हिंदी पत्रकारिता में काफी बदलाव हुए हैं. अखबाराें की संख्या बढ़ी है लेकिन अधिकांश अखबार शहर में रहनेवाले पाठकाें काे आधार मान कर निकाले जाते हैं. गांव उपेक्षित ही रहते हैं. जिस देश-राज्य की 75 से 80 फीसदी आबादी गांव-पंचायताें में रहती हाे, वहां ग्रामीण क्षेत्राें का अपना अखबार हाेना चाहिए. शहर आैर गांव में रहनेवाले लाेगाें की चुनाैतियां आैर आवश्यकताएं अलग-अलग हाेती हैं. इसलिए पंचायनतामा जैसे अखबार का प्रकाशन आरंभ किया गया. चाहे राज्य सरकार हाे या केंद्र सरकार, उसके बजट का बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाकाें के विकास पर खर्च हाेता है. भारत की अर्थ व्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्राें का अच्छा-खासा याेगदान रहा है. भविष्य का बाजार भी गांव-पंचायत ही है. ऐसा इसलिए क्याेंकि धीरे-धीरे गांव विकसित हाे रहे हैं, वहां की सुविधाएं बढ़ रही हैं, वहां रहनेवाले लाेगाें की आमदनी बढ़ रही हैं, उनका जीवनस्तर बेहतर हाे रहा है, ग्रामीण क्षेत्राें में आधारभूत संरचनाएं बेहतर हाे रही हैं, बिजली, माेबाइल आैर इंटरनेट सेवा सुधर रही है. ऐसे में गांवाें में बदलाव दिख रहे हैं. पंचायतनामा इन्हीं बदलाव में बड़ी भूमिका अदा कर रहा है. सुदूर इलाकाें में जाे कुछ भी बेहतर हाे रहा है, उसे सामने लाने का प्रयास कर रहा है. यह सही है कि पंचायती राज व्यवस्था काे मजबूत करने से ही सही मायने में विकास हाेगा. पंचायतनाम के माध्यम से प्रतिनिधियाें आैर जनता काे यही सब बताने का प्रयास किया जा रहा है. सरकार ने पंचायताें काे कई अधिकार दिये हैं, ग्रामीण क्षेत्राें के लिए कई याेजनाआें काे लागू किया है, स्वयंसेवी सहायता समूह के माध्यम से विकास के काम हाे रहे हैं, पंचायतनामा ने इसे गांव-गांव तक पहुंचाने का काम किया है. यह काम आसान नहीं है, क्याेंकि अभी भी झारखंड में कई ऐसे इलाके हैं, गांव हैं जहां आने-जाने के लिए सुविधाएं नहीं हैं, गांव कटे हुए हैं, बरसात में टापू बन जाते हैं, वैसे इलाकाें में भी पंचायतनामा काे भेजने का प्रयास किया जा रहा है ताकि वहां के लाेग आवश्यक सूचना से वंचित न रहे. पंचायतनामा का प्रकाशन आरंभ करने के वक्त इस बात का ख्याल रखा गया कि इसकी कीमत कम से कम ताे हाे, ताकि गांव के गरीब से गरीब लाेग भी इसे खरीद सकें. पंचायतनामा अपने दायित्व का निर्वहन करता रहा है आैर भविष्य में भी ऐसी सामग्री प्रकाशित करता रहेगा, जिससे गांव-पंचायत की अर्थव्यवस्था काे मजबूत करने में मदद मिल सके. आम आदमी की समस्या की जानकारी उचित फाेरम तक पहुंच सके, ताकि उनका निदान हाे सके. किसानाें काे वह जानकारी मिल सके, जिससे उन्हें उपज बढ़ाने में मदद मिल सके.