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  • Jul 18 2018 10:33AM

पंचायतनामा का एक अहम पड़ाव

पंचायतनामा का एक अहम पड़ाव

 आशुतोष चतुर्वेदी

प्रधान संपादक, प्रभात खबर 

हमें आपसे यह समाचार साझा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि पंचायतनामा ने अपने प्रकाशन के दो वर्ष पूरे कर लिए हैं. इन दो वर्षों में पंचायतनामा ने अपनी एक विशिष्ठ पहचान बनायी है. ग्रामीण पत्रकारिता के इस अभिनव प्रयोग की न सिर्फ राज्य बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना हुई है. हालांकि किसी भी प्रकाशन के सफर में दो वर्ष का समय बहुत कम होता है, लेकिन इतने कम समय में ही पंचायतनामा ने समाचार पत्रों की दुनिया में एक खास जगह बना ली है. प्रभात खबर समूह का सूत्र वाक्य है ‘अखबार नहीं आंदोलन’ और यह यूं ही नहीं है. इसका एक पूरा इतिहास है. गांधीजी, जिसे समाज का अंतिम आदमी कहते थे, उस अंतिम आदमी के लिए यह अखबार हमेशा से मजबूती से खड़ा रहा है. सामाजिक सरोकारों के प्रति इसी प्रतिबद्धता के मद्देनजर पंचायतनामा के प्रकाशन की शुरुआत की गयी.

दरअसल, बाजार के दबाव में मौजूदा अखबार शहर केंद्रित हो गये हैं. अखबार उनलोगों की अक्सर अनदेखी कर देते हैं, जिन्हें उसकी सबसे अधिक जरूरत होती है. लेकिन प्रभात खबर ने हमेशा स्थानीय और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को स्वर देने का काम किया है. झारखंड में दलित हो अथवा आदिवासी, सभी की आकांक्षाओं को प्रभात खबर ने ही आवाज दी है. इसी मुहिम के तहत झारखंड के ग्रामीणजनों को स्वर देने का बीड़ा पंचायतनामा के माध्यम से उठाया है. इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता कि विकास की दौड़ में हमारे गांव लगातार पिछड़ते जा रहे हैं. बिजली-पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों में केंद्रित होकर रह गयीं हैं. आजादी के 70 साल हो गये, लेकिन गांवों में बुनियादी सुविधाओं का नितांत अभाव है, जबकि यह उनका बुनियादी हक है. हम इस बात को शिद्दत से महसूस करते हैं कि गांवों का जीवनस्तर सुधरना चाहिए. विकास की प्राथमिकता के केंद्र में गांव होने चाहिए, उन तक भी विकास की किरण पहुंचनी चाहिए. बुनियादी सुविधाएं उनका हक है. ऐसे परिदृश्य में प्रभात खबर गांवों पर केंद्रित अखबार पंचायतनामा निकाला. साथ ही ग्रामीण, खासकर महिलाओं को हमने गांव में बदलाव की खबरें देने के लिए प्रशिक्षित किया. ये महिलाएं पंचायतनामा की रिपोर्टर हैं. वे अपने गांवों से खबरें भेजती हैं, साथ ही वे ग्रामीणों को उनके अधिकारों और सरकारी योजनाओं की जानकारी देती हैं.

कुछ समय पूर्व एक और प्रयोग के रूप में प्रभात खबर के आठ संस्करणों ने आठ गांवों को गोद लिया है. वैसे तो यह सरकारों की जिम्मेदारी है, लेकिन हमारा मानना है कि एक चेतन समाज और अखबार का भी दायित्व बनता है कि वह भी ऐसे कामों में हाथ बंटाये. हम जनप्रतिनिधियों और सरकारी योजनाओं के माध्यम से इन गांवों तक विकास योजनाओं को पहुंचाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. यह मार्ग कठिन है, लेकिन हमें अपने पाठकों का नैतिक समर्थन हर बार मिला है. हम जानते हैं कि एक अखबार के लिए पाठकों का प्रेम ही उसकी बड़ी पूंजी होती है. निष्पक्ष खबरों के साथ ही आधुनिकतम जानकारियों से अपने पाठकों को अवगत कराने का हमारा प्रयास रहा है. मेरा मानना है कि अखबार किसी मालिक या संपादक का नहीं होता है, उसका मालिक तो अखबार का पाठक होता है. पाठक की कसौटी पर ही अखबार की असली परीक्षा होती है. मुझे उम्मीद है कि पंचायतनामा को हमारे जागरूक पाठकों का निरंतर सहयोग मिलता रहेगा.