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  • Mar 15 2018 4:13PM

पलायन का दर्द

पलायन का दर्द

 हर दाे-चार दिनाें पर मीडिया में यह खबर आती है कि झारखंड की लड़कियाें काे कभी दिल्ली, कभी पंजाब-हरियाणा से मुक्त करा लिया गया है आैर उन्हें झारखंड लाया जा रहा है. झारखंड की इन आदिवासी-दलित लड़कियाें काे राेजगार आैर अाकर्षक पैसे का लाेभ दिला कर दलाल दिल्ली-हरियाणा या पंजाब ले जाते हैं. वहां जाते ही इनके सपने टूट जाते हैं. घराें में न सिर्फ इनसे काम कराया जाता है, बल्कि कई बार ताे इनका शारीरिक शाेषण किया जाता है. हाल में एक तसवीर बड़ी चर्चित हुई थी. एक महिला डॉक्टर ने झारखंड की एक लड़की काे न सिर्फ पीटा था, बल्कि गरम आयरन से उसके शरीर काे दागा भी था. यह अमानवीय घटना है. ऐसी अनेक घटनाएं सामने आ चुकी हैं. ऐसी घटनाआें की शिकार रांची के अलावा गुमला, सिमडेगा, लाेहरदगा की लड़कियां अधिक हाेती हैं. वहां इन्हें घराें में कैद कर दिया जाता है, जबरन काम कराया जाता है आैर विराेध करने पर मारा-पीटा जाता है. कई स्वयंसेवी संस्थाएं ऐसी घरेलू कामकाज से जुड़ी लड़कियाें के बचाव में लगी हुई हैं, लेकिन जब तक इन समस्याआें की जड़ काे नहीं पकड़ा जायेगा, इसका समाधान नहीं निकलेगा. पहले वास्तविकता काे जाने. झारखंड से पलायन काेई नया नहीं है. जिन क्षेत्राें से बड़ी संख्या में पलायन हाेता है, वहां गरीबी है, राेजगार नहीं है. खेती पर निर्भरता है, लेकिन पानी के अभाव में कई बार खेती नहीं हाे पाती. पेट पालना मुश्किल हाेता है. ऐसे में राेजी-राेटी की तलाश में दूसरे राज्याें में जाना पड़ता है. लाेग जाते हैं. इनमें महिलाआें के साथ-साथ पुरुष भी हाेते हैं. ये मामले अलग हैं. लड़कियाें के मामले अलग हैं. लड़कियाें काे घरेलू काम या किसी जगह राेजगार दिलाने के नाम पर दलाल झारखंड से ले जाते हैं. उन्हें महानगराें के दलालाें के हाथ बेच देते हैं. शारीरिक कष्ट झेल कर भी ये लड़कियां बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाती हैं. उनके साथ दुष्कर्म की घटनाएं भी सामने आती हैं. झारखंड इसलिए नहीं बना था कि यहां की बेटियाें काे मजबूरी में बाहर जाना पड़े आैर वहां उन्हें जिल्लत की जिंदगी जीना पड़े. सच यह है कि काेई भी अपना गांव मजबूरी में ही छाेड़ता है. झारखंड जब राज्य बना, ताे यह उम्मीद बनी कि यहां के लाेगाें काे (खास कर आदिवासियाें काे) राेजी-राेटी के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा. यहां की बेटियाें काे अब दिल्ली-पंजाब में दूसरे के घराें में काम नहीं करना पड़ेगा. उन्हें अपने राज्य में राेजगार मिलेगा, ताकि वे सम्मान पूर्वक जी सकें, रह सकें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह ठीक है कि कई क्षेत्राें में यहां लड़कियाें के लिए प्रशिक्षण का काम चलता है, ताकि उन्हें राेजगार मिल सके. लेकिन ऐसे प्रशिक्षण भी पलायन राेकने में असफल रहे. ले जानेवाले भी काेई बाहर के नहीं हाेते. अपने ही गांवाें में दलालाें की भरमार है. इन्हें भारी कमीशन मिलता है. ये दलाल गांवाें में भाेली-भाली लड़कियाें आैर उनके माता-पिता काे समझा-बुझा कर इन्हें बाहर ले जाते हैं. ऐसे दलालाें काे लाेग जानते हैं, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हाेती. खबर मिलने पर लड़कियाें काे बचा कर झारखंड लाया जाता है, लेकिन उनका भविष्य बन नहीं पाता. यहां उन्हें फिर राेजगार नहीं मिलता आैर मजबूरन फिर से वे लाैट जाती हैं. अब समय आ गया है इस पर काेई ठाेस निर्णय करने का. सारा मामला राेजगार से जुड़ा हुआ है. कम पढ़ी-लिखी लड़कियाें के लिए भी याेजनाएं बने. उन्हें भी प्रशिक्षण देकर सीधे राेजगार से जाेड़ा जाये. सिर्फ प्रशिक्षण लेने से कुछ नहीं हाेगा, जब तक उसे राेजगार नहीं मिलता. सरकार अधिक से अधिक राेजगार उपलब्ध कराने में सक्षम रहती है, गांवाें में फैले दलालाें के जाल काे ताेड़ने में सफल रहती है, तभी यहां की बेटियाें का अपने ही राज्य में बेहतर भविष्य हाे सकता है.