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  • Jul 16 2018 1:10PM

दाे साल का सफर

दाे साल का सफर

अनुज कुमार सिन्हा 

पंचायतनामा ने झारखंड में दाे साल का सफर पूरा कर लिया है. दाे साल बहुत ज्यादा नहीं हाेता. खास कर किसी ग्रामीण अखबार-पत्रिका के लिए. लेकिन, इस अखबार ने दाे साल में ही अपनी पहचान बना ली है. यह संभव इसलिए हाे पाया है, क्याेंकि ग्रामीण इलाकाें के पाठकाें ने इसे अपनाया. इसमें काेई दाे राय नहीं कि अभी भी जहां-जहां से आैर जितनी मांग पंचायतनामा की हाे रही है, हम हर जगह उसे नहीं पहुंचा पा रहे हैं. पूरे मामले काे गंभीरता से समझना हाेगा. पंचायतनामा क्याें निकाला जाता है? किसके लिए निकाला जाता है? झारखंड में दैनिक अखबाराें की कमी नहीं है. अखबाराें का बड़ा हिस्सा घटनात्मक खबराें से भरा हाेता है.

ग्रामीण इलाकाें में जानेवाले अखबाराें में भी यही हाेता है. शहराें में ताे हाेता ही है. पंचायत, खेती-बारी, पंचायताें के असली मुद्दे, किसानाें की खबराें, ग्रामीण अर्थव्यवस्था या गांवाें में हाे रहे बदलाव की खबराें के लिए दैनिक अखबाराें में जगह मिल नहीं पाती. शहर के अखबाराें में ताे गांव गायब ही रहते हैं. ऐसी स्थिति में पंचायतनामा का प्रकाशन आरंभ किया गया. मकसद था कि ग्रामीण जीवन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पंचायती राज व्यवस्था, गांवाें आैर वहां रहनेवाले लाेगाें के मुद्दाें पर चर्चा हाे. एक गांव में हाे रहे बदलाव काे दूसरे गांव या शहर के लाेग भी जान सके. उसे अपना सके. ग्रामीण आैर किसानाें की समस्या काे सरकार जान सके आैर सरकार की याेजनाआें काे ग्रामीण जान सकें.

सरकार हर साल सैंकड़ाें-कराेड़ों ग्रामीण क्षेत्राें के लिए, प्रशिक्षण, राेजगार के अवसर आदि पर खर्च करती है. लेकिन याेजनाआें के अभाव में उसका लाभ लाेग ले नहीं पाते. पंचायतनामा के माध्यम से इन याेजनाआें की जानकारी दी जाती है.

जज्बा हाे, ताे बदल जायेगी गांवाें की तसवीर

अगर एक साल की बात करें, ताे पंचायतनामा ने एक-एक विषय पर संग्रहणीय अंक निकाला. चाहे वह बदलती पंचायत पर का अंक हाे या धान की खेती, फूल की खेती, लाह की खेती, शुद्ध पानी, पानी बचाआे, मानव तस्करी, दूध क्रांति का अंक, हर अंक में गहरी जानकारी दी गयी. इतना ही नहीं, फॉल आैर प्राकृतिक साैंदर्यता काे भी पंचायतनामा ने ग्रामीण पर्यटन के नाम पर लाेगाें तक पहुंचाया. ये सारे विषय ग्रामीण क्षेत्राें के साथ-साथ शहरी क्षेत्र के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

खास कर प्रतियाेगी परीक्षाआें की तैयारी कर रहे छात्राें के लिए. नाम भले ही पंचायतनामा हाे, लेकिन शहराें में भी इसका खास महत्व है. आपकाे जानना हाेगा कि आपके आसपास के ग्रामीण इलाकाें में क्या हाे रहा है, क्या बदलाव हाे रहा है. ग्रामीण क्षेत्राें में घट रही घटनाआें से शहर अछूता नहीं रह सकता, राज्य अछूता नहीं रह सकता. गांवाें में धान की खेती न हाे, सब्जी का उत्पादन नहीं हाे, ताे क्या शहराें पर इसका असर नहीं पड़ेगा? गांव अगर खुशहाल हाेंगे, ताे राज्य खुशहाल हाेगा. देश-राज्य आगे बढ़ेगा.

पंचायतनामा ने अपने अंकाें के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि कैसे गांव के लाेगाें की आमदनी बढ़े. कैसे उनका उत्पादन बढ़े. किन बीजाें का वे उपयाेग करें, कैसे खेती करें, ताकि अधिक से अधिक लाभ उन्हें हाे सके. अगर सब्जी की खेती करते हैं, ताे कैसे उपज का उचित मूल्य किसानाें काे मिले. पंचायतनामा के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र की महिलाआें काे पत्रकारिता का प्रशिक्षण भी दिया गया, ताकि रूरल रिपाेर्टर बन सके, मुखर हाे सके आैर अपनी बात काे देश-दुनिया के सामने ला सके. पंचायतनामा के माध्यम से उन दीदियाें का मनाेबल बढ़ाया गया, जिन्हाेंने बेहतर काम किया है. महिलाआेें के सशक्तीकरण आैर प्रशिक्षण की जानकारी देने में भी पंचायतनामा की बड़ी भूमिका रही है. इसकी प्रशंसा राष्ट्रीय स्तर पर की गयी. गांवाें की अर्थव्यवस्था, पंचायताें काे सशक्त करने आैर किसान-महिलाआें के जीवन काे बेहतर करने में पंचायतनामा आगे भी अपनी भूमिका अदा करते रहेगा.