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  • Dec 5 2018 11:48AM

कृषि क्रांति की आेर झारखंड

कृषि क्रांति की आेर झारखंड

अनुज कुमार सिन्हा

रांची में ग्लाेबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट के दाैरान छह-छह देशाें से प्रतिनिधियाें आैर 10 हजार किसानाें के भाग लेने से यह साफ हाे गया है कि कृषि क्षेत्र में झारखंड लंबी छलांग लगाने जा रहा है. 50 से अधिक कंपनियाें ने झारखंड में कृषि के क्षेत्र में निवेश करने का फैसला किया है. इन कंपनियाें में अमूल आैर पतंजलि जैसी संस्थाएं भी शामिल हैं. झारखंड के लिए यह शुभ संकेत है. अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा यानी वादा के अनुसार इन कंपनियाें ने झारखंड में निवेश किया, ताे झारखंड के किसानाें के दिन फिर सकते हैं. अगर आंकड़ाें काे देखें, ताे कृषि की विकास दर में चार साल में 18 फीसदी की वृद्धि चाैंकानेवाली है. ये आंकड़े बता रहे हैं कि अगर झारखंड के किसानाें काे सहयाेग मिला, ताे वे असंभव काे संभव कर सकते हैं.

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अब तक झारखंड की अर्थव्यवस्था खनिज (खास कर लाेहा-काेयला) के आसपास घुमती रही है. कृषि के क्षेत्र में राज्य बनने के पहले या उसके बाद भी बहुत ध्यान नहीं दिया गया था. स्थिति यह है कि 40-40 साल से सिंचाई परियाेजनाएं चल रही हैं. उनकी लागत कई गुनी बढ़ गयी है, फिर भी वे पूरी नहीं हुई है. अब इन लंबित सिंचाई परियाेजनाआें पर काम शुरू हुआ है. झारखंड कृषि के क्षेत्र में जाे कुछ भी कर पाया है, उसका बड़ा श्रेय किसानाें काे जाता है, जिनके पास सुविधाआें का अभाव है. उसके बावजूद सिर्फ अपनी मेहनत से किसानाें ने रिकॉर्ड उत्पादन किया है.

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सब्जी के क्षेत्र की बात करें, ताे झारखंड की सब्जियां दूसरे राज्याें में न जाये, ताे वहां तबाही मच जायेगी. यह अलग बात है कि उसका लाभ किसानाें काे कम आैर बिचाैलिये काे अधिक मिलता है. सरकार ने नीति काे लचीला बनाया है. किसानाें काे एक साल तक ऋण पर अब ब्याज नहीं देना हाेगा. उन्हें कम दर पर सस्ती बिजली भी मिलेगी. अगर झारखंड के किसानाें की आय सचमुच में दाेगुनी-चाैगुनी करनी है, ताे इसमें बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है. किसान जाे उत्पादन करते हैं, अगर उसके लिए सरकार बाजार उपलब्ध करा दे, उनके उत्पाद की उचित कीमत दिला दे, ताे तुरंत उनकी आय दाेगुनी हाे जायेगी.

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याद कीजिए इसी झारखंड में कई ऐसे अवसर आते हैं जब किसान खेताें में टमाटर छाेड़ देते हैं, ताेड़ते नहीं हैं, क्याेंकि उन्हें पचास पैसे किलाे की दर से भी टमाटर बेचने के लिए बाध्य किया जाता है.अब इस समिट से यह ताे उम्मीद की जानी चाहिए कि कृषि पर आधारित उद्याेग लगेंगे आैर वे किसानाें से सीधे मटर, टमाटर, कटहल या हर्बल उत्पाद आदि खरीद लेंगे. इस समिट में यह तय हुआ कि अमूल झारखंड में अपना प्लांट लगायेगा. झारखंड में 400 कराेड़ से ज्यादा का दूध बाहर से आता है. हाल में दूध का उत्पादन बढ़ा है. अगर अमूल जैसी संस्था यहां आ जाये, ताे गाय पालनेवालाें काे यह चिंता नहीं रहेगी कि वे दूध कहां बेचेंगे आैर उचित पैसा मिलेगा या नहीं. अमूल का इतिहास ताे यही कहता है. निवेश करने का जिन कंपनियाें ने वादा किया है, अगर वे वादा पूरा करते हैं, ताे झारखंड में बड़ा बदलाव दिखेगा.

कुछ साल पहले कई कंपनियाें ने एक से एक दावा किया था. समझाैता कागज पर रह गया. इस बात से सचेत रहना हाेगा. सारी कंपनियां आयें, निवेश करे, कंपनी लगाये, लेकिन निर्धारित समय के भीतर. इससे राेजगार भी मिलेंगे, किसानाें काे अच्छी आय हाेगी, गारंटी मिलेगी आैर इसका असर यह दिखेगा कि यहां के किसान पलायन नहीं करेंगे. सरकार अगर सही बीज, खाद, सिंचाई की सुविधा किसानाें काे दे दे, ताे ये किसान इतने मेहनती हैं कि इतिहास बदल देंगे.