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  • Mar 4 2019 12:13PM

महिलाआें काे टिकट दें

महिलाआें काे टिकट दें

अनुज कुमार सिन्हा

आठ मार्च यानी महिला दिवस. हर साल की तरह इस बार भी महिलाआें काे अधिकार देने की बात हाेगी. लेकिन राजनीतिक दल सावधान. इस बार का आठ मार्च थाेड़ा अलग है. इसलिए क्याेंकि उसी आठ मार्च के आसपास लाेकसभा चुनाव की घाेषणा हाे सकती है. फिर वही सवाल उठेगा कि संसद में महिला आरक्षण का क्या हुआ? सभी जानते हैं कि अपवाद काे छाेड़ दें, ताे राजनीतिक दल नहीं चाहते हैं कि संसद में महिलाआें की आवाज गूंजे. यह आराेप अगर लग रहा है, ताे उसके कारण हैं. 2014 के लाेकसभा चुनाव में 668 महिला प्रत्याशी मैदान में थी आैर इनमें से सिर्फ 62 ही चुनाव जीत पायी. यानी संसद में लगभग 12 फीसदी महिला सांसद हैं. आबादी लगभग 50 फीसदी आैर सांसद 12 प्रतिशत.

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यही बताता है कि महिलाआें काे संसद में भेजने के लिए कैसे काेताही बरती जा रही है. दलाें में यह हिम्मत नहीं है कि वे अधिक से अधिक महिलाआें काे टिकट दें. 50 फीसदी की बात ताे दूर है, अभी 33 प्रतिशत का ही मामला लटक हुआ है. कुछ दल तो अड़े हुए हैं कि किसी भी हाल में महिलाआें काे 33 फीसदी आरक्षण लेने नहीं देंगे. अगर पिछले चुनाव की बात करें, ताे सबसे ज्यादा महिला सांसद भारतीय जनता पार्टी की हैं. सबसे ज्यादा महिलाआें काे टिकट भी भाजपा ने ही दिया था. 38 काे टिकट दिया आैर 31 जीत गयी. लेकिन फिर वही सवाल, सिर्फ 38 महिलाआें काे ही टिकट क्याें? कांग्रेस ने 60 महिलाआें काे टिकट दिया, लेकिन जीत सकी सिर्फ चार. जिन दलाें की प्रमुख महिला हैं, वहां टिकट देने में महिलाआें की स्थिति बेहतर है. इसमें मायावती की पार्टी बसपा अच्छी स्थिति में है. बसपा ने 27, टीएमसी (इसकी प्रमुख ममता बनर्जी हैं) ने 13 महिलाआें काे मैदान में उतारा. ऐसे दलाें की तारीफ करनी चाहिए कि उन्हाेंने महिलाआे काे टिकट ताे दिया. राजद इस मामले में कंजूसी बरतता रहा है. सिर्फ पांच महिलाआें काे टिकट दिया. समाजवादी पार्टी ने 11 काे उतारा. दाेष सिर्फ राजनीतिक दलाें का नहीं हैं. जनता भी महिला प्रत्याशी के साथ ईमानदारी नहीं बरतती है.

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हिम्मत करके अगर राजनीतिक दलाें (निर्दलीय भी) ने 668 महिलाआें काे उतारा भी, ताे इसमें से जनता ने सिर्फ 62 काे ही चुना. इससे भी दुखद बात यह है कि 668 में से 525 महिला प्रत्याशियाें काे लाेगाें ने जमानत बचाने भर भी वाेट नहीं दिया. ऐसे में महिला प्रत्याशियाें का मनाेबल कैसे बढ़ेगा? इतिहास गवाह है कि जब भी महिलाआें के हाथ में अधिकार आया है, गड़बड़ी हाेने की आशंका कम रही है. उन्हाेंने पुरुषाें की तुलना में बेहतर काम किया है. इसलिए अब समय आ गया है जब अधिक से अधिक महिलाआें काे दल टिकट दें. यह काम कठिन लगता है. संताेष की बात यह है कि कुछ दलाें ने राज्याें में पंचायत चुनाव में महिलाआें काे 50 फीसदी आरक्षण दिया है. इसे आैर आगे बढ़ाने की जरूरत है. जब तक संसद में महिलाआें की संख्या नहीं बढ़ेगी, महिलाआें काे मसलाें काे वह जगह नहीं मिल पायेगी. अब राजनीतिक दलाें पर निर्भर करता है कि वह अधिक से अधिक महिलाआें काे मैदान में उतारती है या सिर्फ नारे में ही इसे रखती है.