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  • Dec 2 2019 4:42PM

पर्यटन में भविष्य

पर्यटन में भविष्य

अनुज कुमार सिन्हा 

झारखंड खनिजाें की उपलब्धता में जितना समृद्ध है, प्राकृतिक सुंदरता में भी उससे पीछे नहीं है. जंगलाें, पहाड़ाें आैर घाटियाें की सुंदरता देखने लायक है. एक से बढ़ कर एक जलप्रपात, पुराने किले, पुराने मंदिर आैर ऐतिहासिक स्थल किसी भी पर्यटक काे आकर्षित कर सकता है. जरूरत है देश-दुनिया काे झारखंड की इन खूबियाें काे बताया जाये. हिमाचल प्रदेश, सिक्किम आैर कश्मीर के प्राकृतिक साैंदर्य काे देखने के लिए देश-दुनिया से लाेग जाते हैं. राजस्थान आैर तमिलनाडु की आय भी में पर्यटन का अच्छा याेगदान है. अगर थाेड़ा प्रयास किया जाये, ताे झारखंड भी इस श्रेणी में आ सकता है. लेकिन, सच यह है कि झारखंड में इस पर पूरा ध्यान नहीं दिया जा सका है.

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नेतरहाट का सूर्याेदय आैर सूर्यास्त देखने लायक है. सारंडा के बीच में पहाड़ी पर स्थित पश्चिमी सिंहभूम के मेघाहातुबुरू में बादलाें की खूबसूरती देखने लायक हाेती है. जलप्रपात ताे भरे पड़े हैं. बूढ़ा घाघ, हुंडरू, जाेन्हा, दशम, हिरणी आदि ऐसे जलप्रपात हैं, जिसे देखने लाेग दूसरे राज्याें से अाते हैं. लेकिन, पर्यटकाें की संख्या कम रहती है. बेतला नेशनल पार्क में बंगाल के पर्यटक ज्यादा आते हैं. देवघर की बात अलग है. वहां बाबा मंदिर के कारण पूरे साल पूरे देश से पर्यटक आते हैं. उसे आैर विकसित किया जा रहा है, लेकिन झारखंड में हजाराें ऐसे स्थल हैं जिन्हें पर्यटन स्थल के ताैर पर विकसित कर अरबाें रुपये की आमदनी की जा सकती है. इसी झारखंड में बाैद्ध धर्म से जुड़े कई स्थल हैं. इन्हें बाैद्ध सर्किट से जाेड़ा भी जा रहा है, ताकि बाेधगया आनेवाले विदेशी पर्यटक झारखंड में भी समय व्यतीत कर सकें. पलामू किला बड़ा दर्शनीय स्थल बन सकता है.

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अभी तक राज्य की आय का दाे ही बड़ा स्त्राेत रहा है. एक है खेती आैर दूसरा खान-खनिज. उद्याेग भी हैं ही. लेकिन, पर्यटन एक ऐसा क्षेत्र है जिसके माध्यम से बड़ी संख्या में ग्रामीणाें काे भी राेजगार दिया जा सकता है. कुछ पर्यटन स्थलाें का जिम्मा गांव के लाेगाें काे मिला भी है, लेकिन साल में कुछ ही दिन उन जगहाें पर भीड़ हाे पाती है. ऐसी व्यवस्था हाे कि सालाेंभर लाेग आये. यह तभी हाेगा जब पर्यटन काे फाेकस कर काम हाे. पहले कानून-व्यवस्था के कारण बहुत से लाेग झारखंड आने से कतराते थे. अब पहले जैसी स्थिति नहीं है. इसलिए यह सही समय है जब दूर-दराज के इलाकाें में स्थित पर्यटन स्थलाें पर ध्यान दिया जाये. सारंडा एक बड़ा अवसर हाे सकता है. दिल्ली में प्रदूषण की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. लाेग साफ हवा के लिए तरसते हैं.

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झारखंड में लगभग 30 फीसदी वन हैं. यह कम नहीं है. सारंडा ताे साल के जंगलाें से भरा पड़ा है. इन जंगलाें के बीच से गुजरने आैर लंबी-लंबी सांस लेने का आनंद ही कुछ आैर हाेता है. ऐसी व्यवस्था हाे ताकि बाहर से लाेग आकर जंगलाें के बीच दाे-तीन दिन रह सके, शुद्ध अॉक्सीजन का बेहतर स्त्राेत सारंड से बेहतर आैर कहां हाेगा? लेकिन ऐसी याेजनाएं तभी सफल हाेंगी जब ग्रामीणाें का समर्थन मिले. उन्हें राेजगार मिले आैर लाभ में हिस्सा. ग्रामीण तैयार बैठे हैं. बस जरूरत है उन्हें माैका देने की. हां, जब पर्यटकाें के मन में यह बात घुस जायेगी कि वे घने से घने जंगलाें में भी सुरक्षित रहेंगे, तभी उनका झुकाव झारखंड की आेर हाेगा. ऐसे प्रयासाें से झारखंड में बड़ा बदलाव दिखेगा.