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  • Nov 8 2019 12:37PM

चुनाव का वक्त

चुनाव का वक्त

अनुज कुमार सिन्हा 

पूरा झारखंड अब चुनाव के मूड में दिखने लगा है. लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल सक्रिय हाे गये हैं. यात्राएं निकल रही हैं, रैलियां हाे रही हैं. आराेप-प्रत्याराेप का दाैर भी शुरू हाे चुका है. आगे भी तब तक चलता रहेगा, जब तक चुनाव नहीं हाे जाता. यह काेई नयी बात नहीं है. अब ताे राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हाे गया है. काेई दल इससे बचा नहीं है. इसी माहाैल में मतदाताआें काे अपना काम करना हाेगा, यानी मतदान करना हाेगा, बेहतर प्रत्याशी का चयन करना हाेगा. दरअसल झारखंड बनने के बाद जितनी भी सरकार बनी, किसी ने भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया था.

यह पहला माैका है जब किसी सरकार (यहां रघुवर दास की सरकार) ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है. ऐसा इसलिए हुआ, क्याेंकि पहली बार किसी सरकार काे पूर्ण बहुमत मिला था. देखते-देखते पांच साल का कार्यकाल पूरा हाेने काे है. सरकार अपना दावा करेगी कि उसने पांच साल में क्या-क्या किया है. कैसे गरीबाें के लिए याेजनाएं चलायी गयी, कैसे लाखाें परिवाराें काे गैस कनेक्शन दिये गये, आवास दिये गये, शाैचालय बनाये गये, कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ, बालिकाआें के लिए याेजनाएं चलायी गयीं, विधानसभा आैर हाइकाेर्ट की भव्य इमारतें बनायी गयीं आदि. इसके विपरीत विपक्ष इस सरकार की कमियाें काे गिनायेगा. यह बतायेगा कि सरकार का दावा गलता है आैर जमीन पर दिखायी नहीं देता. ऐसे दावे-प्रतिदावे हाेते रहेंगे.

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जनता काे पता है कि क्या हुआ है आैर क्या नहीं हुआ है. इसी आधार पर जनता मतदान भी करती है आैर काम नहीं करनेवाले अपने जन प्रतिनिधियाें काे, चाहे वे सत्ता के हाें या विपक्ष के, सबक भी सिखाती है. मतदाताआें काे संविधान ने मत देने का अधिकार दिया है आैर उसे इसका भरपूर उपयाेग करना चाहिए. एक समय था जब मुश्किल से पचास प्रतिशत तक मतदान हाेता था. अब समय बदल गया है. चुनाव आयाेग से लेकर मीडिया आैर अन्य संगठन भी मतदाता जागरूकता अभियान चलाता है. झारखंड में एक चुनाव काे छाेड़ दें, ताे लगातार मताें का प्रतिशत बढ़ता रहा है.

इस बार भी जनता काे भारी मतदान के लिए निकलना हाेगा. यह उनकी जिम्मेवारी है. एक बड़ा वर्ग है, जाे सिर्फ हालात काे काेसने में लगा रहता है, आलाेचना में लगा रहता है, लेकिन जब वाेट की बारी आती है, ताे घराें से निकलने के बजाय वाेट के दिन आराम फरमाते हैं. इसके विपरीत गरीब तबका चाहे कड़ाके की धूप हाे या ठंड, मतदान करने का प्रयास करता है. सूचना के इस दाैर में मतदाताआें के पास पूरी सूचना हाेती है. उसे पता है कि काैन प्रत्याशी बेहतर है आैर काैन नहीं. किसने काम किया है, किसने नहीं. उसी आधार पर वे मतदान करते हैं.

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दाेनाें के लिए अवसर आया है. प्रत्याशियाेें के लिए कड़ी परीक्षा का वक्त है, जबकि मतदाताआें के लिए बेहतर चयन का वक्त. इसलिए इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए. जनता साेचे, समझें आैर मतदान करे. हर हाल में मतदान करे. जिसे वे बेहतर समझे, उसे वाेट दे, लेकिन वाेट देने जरूर जाये. घर में बैठे रहे आैर बहाना बनाते रहे, काेसते रहे ताे काेई लाभ नहीं हाेनेवाला. प्रत्याशी-दल भी चुनाव में मर्यादा की सीमा काे न लांघे, ताे चुनाव का आनंद दाेगुना हाे जायेगा.