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  • Oct 1 2018 1:13PM

खुद सफाई करने में शर्माइए मत

खुद सफाई करने में शर्माइए मत

अनुज कुमार सिन्हा

गांधी ने कहा था-सामूहिक स्वच्छता तभी सुनिश्चित की जा सकती है, जब सामूहिक विवेक हो आैर सार्वजनिक स्थानाें काे स्वच्छ रखने के प्रति सामूहिक आग्रह हाे. हमारी सड़काें आैर निजी तथा सार्वजनिक शाैचालयाें की गंदगी के लिए बहुत हद तक हमारी छुआछूत जिम्मेदार है. आज जब पूरे देश में चार साल से स्वच्छता पर गंभीर प्रयास हाे रहे हैं, गांधी के ये विचार सामयिक हैं. चिंता की बात यह है कि लगभग 80-90 साल पहले व्यक्त किये गये गांधी के इन विचाराें काे अभी भी लाेग आंशिक ताैर पर ही समझ पा रहे हैं आैर इसके लिए अभियान चलाना पड़ रहा है.

चार साल पहले प्रधानमंत्री ने सत्ता संभालते ही स्वच्छ भारत का नारा दिया आैर इसके लिए गंभीर प्रयास हुए. आज उन्हीं प्रयासाें का परिणाम दिख रहा है. इसके बावजूद अभी इस विषय में बहुत कुछ किया जाना बाकी है. ऐसी बात नहीं है कि लाेग स्वच्छता के अर्थ काे नहीं समझते हैं, उसके फायदा-नुकसान काे नहीं जानते हैं, लेकिन जब इसे लागू करने का वक्त आता है, सकुचा जाते हैं या लापरवाही बरतते हैं. सारा मामला विवेक का है. लाठी के बल पर स्वच्छता लागू कराना अंतिम विकल्प है. सारी चीजें सरकार के भराेसे नहीं छाेड़ी जानी चाहिए. अगर सार्वजनिक स्थलाें पर डस्टबीन रखा हाे, गंदगी काे उसमें न फेंक अगर काेई जहां-तहां फेंकता है, ताे इसे उसका अविवेक ही माना जायेगा.

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यही हाे भी रहा है. अपना घर साफ रहे आैर अपने घर का कचरा सड़क पर फेंकना या पड़ाेसी के घर के सामने डालने की परंपरा-सी बन गयी है. इसी मानसिकता काे बदलने की जरूरत है. बस स्टैंड हाे, पार्क हाे, मंदिर हाे, हर जगह कूड़ा फेंकने का स्थान बना है. थाेड़ी-सी मेहनत हालात काे बदल सकती है. सवाल सिर्फ कूड़ा का नहीं है, सवाल सफाई का है, स्वच्छता का है. घराें में शाैचालयाें काे खुद साफ करने में नयी पीढ़ी हिचकती है, दूर भागती है, इसे छाेटा काम समझती है. गांधी ने इसी हिचक काे ताेड़ने का प्रयास किया था.

आज प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री या बड़े-बड़े स्टार झाड़ू लगा कर यही ताे संदेश दे रहे हैं कि काेई काम छाेटा नहीं हाेता. साफ-सफाई हर किसी की जिम्मेवारी है. आज अगर अाप काेई गंदगी फैला रहे हैं, ताे इसकी कीमत कभी न कभी आपकाे भी चुकानी पड़ेगी. इसे समझना हाेगा. खुशी की बात यह है कि अब बड़ा वर्ग इस बात काे समझने लगा है. थाेड़ा आैर प्रयास करने की जरूरत है. कुछ काम स्वत: हाेगा आैर कुछ डर से. अगर काेई गैर-जिम्मेवार नागरिक बार-बार मना करने पर भी नहीं मान रहा है, कूड़ा सड़काें पर फेंक रहा है, गंदगी फैला रहा है, ताे ऐसे लाेगाेें पर जुर्माना लगना ही चाहिए.

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जब पैसा भरना हाेगा, तब पता चलेगा. कुछ लाेग अपने शहर में नियमाें काे नहीं मानते, लेकिन जब यही लाेग विदेश जाते हैं, ताे डर से सारे नियम मानते हैं. टॉफी खाने के बाद उसका रैपर पॉकेट में रख लेते हैं. बाहर की बात छाेड़ दीजिए. आर्मी एरिया में जब बाहर के लाेग जाते हैं, ताे किसकी हिम्मत कि जहां-तहां पॉलिथीन फेंक दें, रैपर फेंक दे. उन्हें पता हाेता है कि यहां गंदगी फैलाये ताे खैर नहीं. अब वक्त आ गया है जब बगैर किसी दबाव के अंदर से परिवर्तन हाे आैर स्वच्छ भारत बनाने में आप लग जायें.