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  • Apr 2 2018 6:42PM

जीवन में खुशियां लाता डेयरी उद्याेग

जीवन में खुशियां लाता डेयरी उद्याेग

अनुज कुमार सिन्हा

जब झारखंड के विकास की बात आती है, ताे कृषि के साथ-साथ खनन आैर उद्याेग काे बढ़ावा देने पर जाेर दिया जाता है. ऐसा इसलिए क्याेंकि झारखंड की धरती के नीचे अपार खनिज संपदा है. इसका उपयाेग कर लाखाें लाेगाें काे राेजगार दिया जा सकता है. लेकिन एक बड़ा क्षेत्र है, जहां से झारखंड का आम आदमी अच्छा-खासा कमा सकता है. वह है डेयरी का क्षेत्र. झारखंड में इस उद्याेग के अागे बढ़ने की अच्छी संभावना है. इसकी शुरुआत भी हाे चुकी है. इसके पीछे का अंकगणित काफी मजबूत है. झारखंड में दूध की जितनी मांग है, उससे काफी कम यहां उत्पादन हाेता है. बाहर से दूध मंगाना पड़ता है. एक अांकड़ा के अनुसार, झारखंड में लगभग चार साै कराेड़ रुपये का दूध बाहर यानी पड़ाेसी राज्याें से आता है. यह काेई छाेटी राशि नहीं है. कम से कम आैर चार साै कराेड़ रुपये का दूध झारखंड में ही खप जायेगा. यह पैसा झारखंड में, झारखंड के लाेगाें के बीच ही रहेगा. झारखंड के लाेग इस बात काे जानते हैं. यही कारण है कि दूर-दराज के इलाकाें में भी लाेग गाय-भैंस के पालन में लग गये हैं. सरकार भी हर बीपीएल परिवार काे 90 फीसदी सब्सिडी पर दाे-दाे गाय दे रही है. इसका असर दिख रहा है आैर डेयरी उद्याेग को बढ़ावा मिला है. अच्छी नाैकरी छाेड़ कर भी युवा इस धंधे में आये हैं आैर दूध से अच्छी कमाई कर रहे हैं. झारखंड में कई बड़ी डेयरी हैं जिन्हें दूध चाहिए. अब गांवाें के लाेगाें काे दूध बेचने के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता, बाजार नहीं तलाश करना पड़ता है. उनके गांवाें में गाड़ियां आती हैं आैर दूध ले जाती हैं. इतनी सुविधा मिलने से ग्रामीणाें में रुचि बढ़ी है. दूध के व्यवसाय ने देश में पहले ही कराेड़ाें लाेगाें की तकदीर बदली है. गुजरात काे-अॉपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड इसका आदर्श मॉडल है. यह डॉ वर्गीज कूरियन का विजन था, जिसने देश में श्वेत क्रांति ला दी. देश काे दूध के उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया. लगभग डेढ़ कराेड़ लाेग 1.44 लाख डेयरी काे-अॉपरेटिव साेसायटी के जरिये इससे जुड़े हैं आैर दूध उत्पादन कर अपनी जिंदगी अच्छी तरह चला रहे हैं. ठीक है झारखंड अभी दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं बन सकता. लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ सकता है आैर उसी का प्रयास चल रहा है. सबसे अच्छी बात यह है कि डेयरी उद्याेग काे बढ़ावा देने के लिए जिन चीजों की जरूरत हाेती है, झारखंड में माैजूद है. लाेगाें में उत्साह भी है. दाे-दाे गायाें से जिन लाेगाें ने इस व्यवसाय की शुरुआत की थी, आज उनके पास दर्जनाें गाय हैं. कई ऐसे लाेग भी है जिनका टर्नआेवर एक कराेड़ से भी ज्यादा है आैर वे दूसराें काे भी राेजगार दे रहे हैं. ऐसे भी उदाहरण हैं कि युवक इंजीनियरिंग की नाैकरी छाेड़ कर दूध के व्यवसाय में लग गये हैं. यह बड़ा बदलाव है. एक समय था जब किसी पढ़े-लिखे युवक काे दूध उत्पादन (गाय-भैंस पालन) का काम करने काे कहा जाता था, ताे नाक-मुंह सिकाेड़ते थे. अब दुनिया बदल चुकी है. इस व्यवसाय में आय ज्यादा है, बाजार अच्छा है, इसलिए युवक इस क्षेत्र में तेजी से आ रहे हैं. गांव की महिलाआें के लिए भी आय का अच्छा स्त्राेत है. उनकी जिंदगी बदल रही है, बेहतर हाे रही है आैर उनके चेहरे पर खुशियां आ रही हैं. आनेवाले दिनाें में यह क्षेत्र आैर आगे बढ़ेगा. इससे राज्य में संपन्नता बढ़ेगी, बेराेजगारी भी घटेगी.