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  • Sep 18 2018 11:48AM

संकट में माटी कला

संकट में माटी कला

अनुज कुमार सिन्हा

भारतीय संस्कृति की खासियत रही है कि इसमें हर जाति-हर धर्म, हर संप्रदाय का ख्याल रखा गया है. प्राचीन काल से ऐसी व्यवस्था बनायी गयी है ताकि सभी का कल्याण हाे, हर काेई जी सके. सभी का अपना-अपना महत्व बना रहे. ऐसी व्यवस्था के तहत ही गांवाें का सामाजिक ताना बाना ऐसा था जिसमें लाेहार, कुम्हार, माेची, पंडित, धाेबी, नाई आदि सभी काे बसाया जाता था ताकि जरूरत के मुताबिक एक-दूसरे के काम आयें. पर्व-त्याेहार, शादी या विशेष अवसराें पर इनका महत्व आैर बढ़ जाता था. सुख-दुख के साथी सभी रहते थे.

समय के साथ-साथ बदलाव हुए आैर इसका असर भी दिखने लगा. ऐसा ही एक क्षेत्र है माटी कला का. आज इसके अस्तित्व पर संकट आ चुका है. कुम्हाराें के जिम्मे इस कला काे आगे बढ़ाने (एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी) की जिम्मेवारी हाेती थी. मिट्टी के बर्तन, दीया से लेकर दीपावली में मिट्टी के खिलाैने, देवी-देवताआें की मूर्तियां बनाना इनका मुख्य काम था. इससे हुई आय से इनकी जिंदगी चलती थी. आज दीपावली में दीये का स्थान बिजली के छाेटे-छाेटे बल्ब ने ले लिया है. देवी-देवताआें की मूर्तियां विदेशाें से आ रही हैं. घड़े आैर मिट्टी के बर्तन का उपयाेग लगभग बंद हाे गया है. पारंपरिक शादी के दाैरान मिट्टी के ग्लास अब दिखते नहीं हैं, कुल्हड़ का स्थान प्लास्टिक ने ले लिया है.

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ये सभी पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं, पर इनका चलन बढ़ता जा रहा है. अधिकांश कुम्हाराें का पारंपरिक पेशे से माेह भंग हाे गया है. कारण है कठिन से कठिन परिश्रम करने के बाद भी उन्हें उचित पैसा नहीं मिलता. नयी पीढ़ी इस पेशे में आना नहीं चाहती. वे नाैकरी या दूसरे धंधे में जा रहे हैं. सरकार की आेर से बहुत सहयाेग मिल नहीं पा रहा है. इस माटी कला काे बचाने के लिए बाेर्ड का गठन जरूर हाे गया लेकिन उसका लाभ मिल नहीं पा रहा.

अगर यही रवैया रहा ताे इसका असर भारतीय परंपरा, भारतीय संस्कृति पर पड़ेगी. दीपावली में दीये देखने काे लाेग तरशेंगे, देवी-देवताआें की माटी की मूर्तियाें की जगह धातु की मूर्तियां नजर आयेंगी. बाकी चीजाें काे भुल जायें ताे भी माटी से बने उत्पादाें काे पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है. कुल्हड़ में अभी भी चाय पीने की मांग हाेती है. मिट्टी की हांडी में बने भाेजन का स्वाद का जवाब नहीं. इसे हर काेई जानता है लेकिन माटी कला काे बचाने के लिए आगे नहीं आता. यह कला तभी बच पायेगी जब आम जनता इसके उपयाेग के लिए आगे आये, उचित पैसे के भुगतान के लिए आगे आये.

इसके साथ ही नजरिया बदलना हाेगा. जाे लाेग आज भी संघर्ष कर इस कला काे बचाने में लगे हुए हैं, उन्हें उचित सम्मान मिलना चाहिए. सरकार अगर सहयाेग दे, उनके उत्पादाें के लिए बाजार उपलब्ध कराये, लागत की तुलना में अच्छा खासा मुनाफा हाेने लगे ताे एक बार फिर से माटी कला की आेर लाेगाें का ध्यान जायेगा. यही सभी के हित में हाेगा.