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  • Jun 18 2019 3:57PM

किसानाें के समक्ष चुनाैतियां

किसानाें के समक्ष चुनाैतियां

अनुज कुमार सिन्हा 

झारखंड में मानसून लगभग एक सप्ताह विलंब से आने की संभावना है. कुछ साल पहले तक झारखंड में 10 जून तक मानसून प्रवेश कर जाता था. अब वैसा नहीं रहा. इसका सीधा असर खेती पर हर साल पड़ रहा है. झारखंड में धान की खेती वर्षा पर ही निर्भर करती है. बड़े इलाकाें में सिंचाई की व्यवस्था नहीं है. इसलिए किसान मानसून का इंतजार करते हैं. अगर एक सप्ताह विलंब से मानसून आता है, ताे किसान इसकी थाेड़ी भरपाई कर सकते हैं, लेकिन अगर उसके बाद भी 10-15 दिन भी बारिश नहीं हुई, ताे खेती पर असर पड़ना तय है.

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झारखंड के किसानाें की बात करें, ताे इस बार उन्हें बीज-खाद के लिए पैसे की चिंता नहीं करनी हाेगी. एक सप्ताह के अंदर केंद्र द्वारा किसानाें के खाते में दाे-दाे हजार रुपये आनेवाले हैं. यह वह राशि है जिससे किसान बीज खरीद सकते हैं. अगले माह झारखंड सरकार भी हर किसान काे पांच-पांच हजार देनेवाली है. यह पैसा भी किसानाें के खाते में जानेवाला है. किसानाें काे अगर सात-सात हजार रुपये मिल जायें, ताे उन्हें बीज-खाद के लिए कहीं से उधार नहीं लेना पड़ेगा. इसलिए खाद-बीज की खरीद के लिए किसान चिंतित नहीं हैं. इसके बावजूद किसानाें के समक्ष चुनाैतियां कम नहीं हाेंगी.

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सबसे बड़ा संकट हाेगा कि मानसून में विलंब हाेेने के बाद भी तेजी से खेत की जुताई करना, बिचड़े का छिड़काव करना आैर बुआई करना. किसान ठगे न जायें, इसके लिए उन्हें सतर्क रहना पड़ेगा. झारखंड में बड़े किसानाें की संख्या बहुत कम हैं. वैज्ञानिक तरीके से खेती करने की भी अधिकांश काे जानकारी नहीं है. वे पारंपरिक तरीके से खेती करते हैं. हाल ही में श्रीविधि से धान की खेती करने की तकनीक का उपयाेग ज्यादा हाेने लगा है. इससे उपज दाेगुना तक हाे जाता है. गांव-गांव में अब बीज की दुकान खुल गयी है. उत्पादन बीज की गुणवत्ता पर भी निर्भर करता है. अगर बीज ही खराब निकला, ताे किसान खेती में कितना भी मेहनत कर लें, कितना भी खाद क्याें न डाल लें, अच्छा उत्पादन नहीं हाे सकता.

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इसलिए बीज की खरीद करते वक्त किसानाें काे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बीज बेहतर हाे आैर उसी दुकान से खरीदें, जिस पर उन्हें विश्वास हाे. हाल के दिनाें में बाजार में नकली बीज की भी शिकायत आती रही है. किसानाें काे फंसाने के लिए गांव-गांव में दलाल मिल जाते हैं. किसानाें काे इससे बचना चाहिए. अगर आवश्यकता हाे ताे किसान बीज आैर खाद के चयन में कृषि विशेषज्ञाें की सहायता ले सकते हैं. वे कृषि विभाग के अफसराें से मिल कर सलाह ले सकते हैं. इन सभी सतर्कता के बावजूद खेती ताे बहुत हद तक मानसून पर ही निर्भर करती है. लंबे समय के लिए किसानाें के लिए यही बेहतर हाेगा कि सिंचाई की सुविधा पूरे राज्य में हाे, ताकि कम बारिश हाेने पर या समय पर मानसून नहीं आने के बावजूद खेती पर बहुत असर न पड़े. किसान इस बात का भी ध्यान रखें कि अगर मानसून विलंब से आता है, ताे काैन सी किस्म का बीज उपयाेग में किया जाये, ताकि अधिक से अधिक उत्पादन हाे सके.