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  • Jun 5 2019 3:54PM

चुनाव बाद चुनाैतियां

चुनाव बाद चुनाैतियां

अनुज कुमार सिन्हा

लाेकसभा चुनाव हाे गया. रिजल्ट आ चुका. देश में एनडीए काे प्रचंड बहुमत मिल गया. झारखंड भी पीछे नहीं रहा. यहां एनडीए (भाजपा-आजसू) ने 14 में 12 सीटाें पर कब्जा जमाया. अगर 2014 से तुलना करें, ताे एनडीए के सांसदाें की संख्या न बढ़ी आैर न घटी. हां, भाजपा की एक सीट कम हुई (गिरिडीह में) लेकिन यह सीट भाजपा ने अपनी मर्जी से समझाैता के तहत आजसू काे दिया था. आजसू ने वह सीट जीत कर भाजपा काे घाटा नहीं हाेने दिया. चुनाव में कई चाैंकानेवाले फैसले आये. शिबू साेरेन दुमका से चुनाव हार गये. बाबूलाल मरांडी काेडरमा से हार गये आैर वह भी बड़े अंतर से. खूंटी से अर्जुन मुंडा आैर लाेहरदगा से सुदर्शन भगत मामूली अंतर से जीते. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्षमण गिलुआ सिंहभूम से चुनाव हार गये.

अब हर दल हार-जीत का पाेस्टमार्टम कर रहे हैं. इसे विधानसभा के आधार पर देखा जा रहा है कि किस विधानसभा में काैन भारी रहा. ऐसा इसलिए ताकि आगामी विधानसभा चुनाव का कुछ ताे आंकलन किया जा सके. आंकलन आसान नहीं हाेगा. यह लाेकसभा चुनाव था. मुद्दे अलग थे. नरेंद्र माेदी के नाम पर भाजपा ने चुनाव लड़ा था, मुद्दा था राष्ट्रवाद का, एयर स्ट्राइक का, सरकार की याेजनाआें के जनता तक पहुंचने का, मुद्दा था लीडरशिप का. इन सब में भाजपा भारी पड़ी. ये सारे मामले विधानसभा में नहीं रहेंगे. एनडीए के पक्ष में यह बात जाती है कि 81 विधानसभा में लगभग 60 में उसे बढ़त मिली है. लेकिन, इस बात काे नहीं भूलना चाहिए कि इतनी लहर के बावजूद बाकी 21-22 क्षेत्राें में एनडीए पीछे रह गया. इसका अधिकांश हिस्सा सिंहभूम आैर खूंटी का था.

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इसलिए एक सवाल का उत्तर राजनीतिक पंडित नहीं दे पा रहे हैं कि इन सीटाें पर जादू क्याें नहीं चला. हार के बावजूद विपक्ष इस बात से खुश हाे सकता है कि विधानसभा चुनाव के लिए इतनी सीटें (जिसमें इस बार उसने बढ़त ली है) सुरक्षित है. लाेकसभा चुनाव के बाद चुनाैतियां अलग-अलग हैं, दलाें के लिए भी. झारखंड में भाजपा के पास चार माह का वक्त है कि जिन पर वह मजबूत है, उसे आैर मजबूत करे, लेकिन उससे पहले जिन सीटाें पर उसे लहर के बावजूद हार मिली है, वहां के कारणाें काे तलाशे आैर उस कमी काे दूर करे. अगर कहीं काेई नाराजगी है, ताे उसे दूर करने की पहल करे. विपक्ष काे भी लाेकसभा चुनाव की हार से बाहर निकलना चाहिए.

चुनाव है, हार-जीत उसका हिस्सा है. इसलिए हार से बाहर निकल कर नये सिरे से विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट जाने का वक्त है. विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे. सरकार ने पांच साल में जाे काम किया है, उसे दूर-दराज में रहनेवाले लाेगाें तक पहुंचाने की चुनाैती रहेगी. यह सही है कि भाजपा के पास पंचायत आैर गांव स्तर पर भी संगठन है आैर उसका फायदा उसे मिलेगा ही. लेकिन, यह भी सही है कि काेल्हान आैर संताल के कई इलाकाें में उसे आैर काम करने की जरूरत है. विधानसभा चुनाव में जाे भी समय बचा है, उसका सत्ता आैर विपक्ष दाेनाें भरपूर उपयाेग करेगा आैर इसकी शुरुआत जल्द दिखेगी.