aamukh katha

  • Oct 3 2019 2:10PM

कोयनारडीह में लकड़ी व बांस की अद्भुत कारीगरी

कोयनारडीह में लकड़ी व बांस की अद्भुत कारीगरी

पंचायतनामा टीम
प्रखंड: अनगड़ा
जिला: रांची 

रांची के अनगड़ा प्रखंड स्थित जोन्हा फॉल को ऊंचे पहाड़ से गिरते झरने, घने जंगल और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है. इसके अलावा यहां की एक और चीज मशहूर है, जो लोगों को बरबस अपनी ओर खींच लाती है. वो है लकड़ी व बांस से बनी अदभुत कलाकृतियां. स्थानीय लोगों के मुताबिक, जब से यहां पर्यटकों का आना शुरू हुआ है, तब से यहां पर लकड़ी से बने सामानों की बिक्री शुरू हुई है. समय के साथ सामानों के आकार, रंग और डिजाइन में बदलाव हुआ है और यह काम यहां की विशेष पहचान बन गयी है. लकड़ी व बांस से बने सजावट के सामान, रसोई की वस्तुएं और खिलौने यहां खूब बिकते हैं. स्थानीय लोगों की आजीविका का यह एक मुख्य साधन बन गया है.

हर घर में हैं कारीगर
जोन्हा फॉल के नीचे लगभग चार किलोमीटर दूर है कोयनारडीह गांव. जंगलों के बीच बसा हुआ है. इस कारण ग्रामीणों ने जंगल से ही आजीविका की तलाश शुरू की और लकड़ी के सामान बनाने में जुट गये. गांव में लगभग 150 परिवार रहते हैं. इस गांव के हर घर में लकड़ी के कारीगर हैं, जो अपने हुनर से सूखी लकड़ी में जान डाल देते हैं. जोन्हा फॉल में लकड़ी से बने सजावट के सामान बेच रहे कलेश्वर बेदिया कहते हैं कि पिछले साढ़े तीन दशक से यहां बांस और लकड़ी से बने सामान की बिक्री हो रही है. पहले उनके पिता यह काम करते थे. बताते हैं कि पहले तो घर के आसपास के जंगलों में लकड़ी मिल जाती थी, लेकिन अब दूसरे गांवों के जंगल में जाकर लकड़ी खरीदनी पड़ती है.

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पर्यटकों को खूब भाता है यहां का सामान
कारीगर करमा बेदिया बताते हैं कि जो भी पर्यटक यहां आते हैं, वो यहां से निशानी के तौर पर लकड़ी के बने कुछ न कुछ सामान जरूर ले जाते हैं. साथ ही खूब तारीफ भी करते हैं. यहां मुख्य रूप से लकड़ी का बना हुआ दिल, खिलौना, भगवान की मूर्ति, छोटी बैलगाड़ी, पुतला, फूलदानी, कल्छून, बेलन, दलघोटनी और बांस से बने फूल की बिक्री खूब होती है. इन्हें बनाने में बांस, बकाइंद, गम्हार और दूधी पेड़ की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. यहां तो वैसे सालोंभर पर्यटक आते हैं, लेकिन नवंबर से फरवरी तक चार महीने जोन्हा फॉल पर्यटकों से गुलजार रहता है. इस दौरान इन सामानों की यहां खूब बिक्री होती है.

बाजार मिले तो और फायदा होगा : कलेश्वर बेदिया
कारीगर कले‌श्वर बेदिया बताते हैं कि उन्होंने इस काम के लिए कहीं से कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है. बस घर में बनाते हुए देख कर सीख गया और यह काम कर रहे हैं. इससे घर-परिवार चलाने का खर्च निकल जाता है. कहते हैं कि अगर बेहतर बाजार मिले, तो हमारे जीवन स्तर में और सुधार हो सकता है. पर्यावरण के प्रति भी कलेश्वर काफी सजग हैं. कहते हैं कि हमें लकड़ी के लिए पेड़ काटना पड़ता है, इसलिए उन्होंने पेड़ भी लगाये हैं.

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थोक में मांग होती तो बेहतर होता : करमा बेदिया
कारीगर करमा बेदिया बताते हैं कि पहले गांव में परिवार कम थे, तो सबकी अच्छी कमाई हो जाती थी. परिवार बढ़े और हर घर में यह काम हो रहा है. इसलिए अगर हमारे बनाये सामानों का थोक खरीदार मिलता, जो एक साथ सामान खरीद कर बाहर के बाजारों में जाकर बेचता, तो उन्हें फायदा और होता तथा दाम भी अच्छे मिलते. करमा बताते हैं कि पिकनिक के समय में वो हुंडरू फॉल में भी जाकर अपनी दुकान लगाते हैं.

हमें और प्रशिक्षण की जरूरत है : विशेश्वर बेदिया
कारीगर विशेश्वर बेदिया पिछले 15 वर्षों से लकड़ी और बांस के खिलौने एवं सजावट के सामान बेच रहे हैं. दुमका में आयोजित अंतरराष्ट्रीय बांस मेले में भी शामिल हुए. वहां उन्होंने काफी नयी चीजें देखीं और उन्हें बहुत कुछ नया सीखने को मिला. उन्होंने कहा कि वो सिर्फ देख कर ही इतना सीख पाये हैं. अगर प्रशिक्षण मिल जाये, तो और भी बेहतर कार्य कर सकते हैं. पिकनिक के दौरान वह दशम फॉल में अपनी दुकान लगाते हैं.