aamukh katha

  • Apr 27 2019 5:03PM

गांव-जवार की महिलाएं अब परिजनों से नहीं पूछतीं, मेहमान कब जायेंगे, चुटकी में भोजन तैयार

गांव-जवार की महिलाएं अब परिजनों से नहीं पूछतीं, मेहमान कब जायेंगे, चुटकी में भोजन तैयार

 

गुरुस्वरूप मिश्रा 

एक वक्त था, जब झारखंड के गांव-जवारों में सुबह-शाम भोजन बनाते वक्त मिट्टी के घरों से निकलने वाले धुएं ग्रामीण भारत की तस्वीर बयां करते थे. लकड़ी, गोइठा, कोयला या सूखे पत्ते के लिए खेतों व जंगलों में कड़ी मशक्कत करती गांव-घर की महिलाओं को देखा जा सकता था. बरसात के दिनों में तो इनकी मुश्किलें और बढ़ जाती थीं. अतिथि देवो भव: हमारा संस्कार रहा है. इसके बावजूद जब कभी देर रात को कोई मेहमान घर पर आता, तो दोबारा धुएं झेलने को मजबूर महिलाओं का दर्द छलक उठता था. वह अपने परिजनों से पूछ बैठती थीं कि मेहमान कब जायेंगे. प्रधानमंत्री उज्जवला योजना का कमाल देखिए. बीते दो-तीन वर्षों से ये तस्वीर बदलने लगी है. चूल्हा-चौका करने वाली गरीब-गुरबा घर की महिलाएं भी लाइटर से गैस चूल्हा जलाकर धुआं को बाय-बाय कह चुटकी में भोजन तैयार कर रही हैं.

वर्षों से चूल्हा फूंकने पर मजबूर हमारी मां-बहनों को भी शायद ही ये अहसास होगा कि धुआं जिंदगी निगलता है. तिल-तिल कर मारता है. आपको ये जानकर हैरत होगी कि इस 'मीठे जहर' धुएं के दुष्प्रभाव से देशभर में सालाना पांच लाख महिलाओं की मौत हो जाती है. ये जानकर आप चौंक जायेंगे कि एक घंटे धुएं का प्रदूषण 400 सिगरेट के धुएं के बराबर है. अब आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि खुद की जिंदगी दांव पर लगाकर सबको भोजन परोसकर सबसे आखिर में खाने वाली महिलाओं को नया जीवन देने की दिशा में ये कितना बड़ा कदम उठाया गया है.

अब धुआं-धक्कड़ खत्म, खाना बनाना हुआ आसान
रांची जिले के कांके प्रखंड की उत्तरी सुकुरहुट्टू पंचायत में अपनी पीठ पर छऊआ लिए सुनीता देवी हों, मिट्टी के घर में रहने वाली मुनि देवी हों या बुजुर्ग मधिया देवी. वर्षों से लकड़ी-काठी बीनकर मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाने वाली इन आदिवासी महिलाओं के चेहरे पर सुकून है. कहती हैं कि मुफ्त में गैस चूल्हा मिलने से काफी आराम हुआ है. सच कहिए तो सपना पूरा हो गया. मेहनत-मजदूरी करने सुबह निकलना होता है, तो झट से खाना बन जाता है. लकड़ी-कोयला का कोई चक्कर नहीं. कोई धुआं-धुक्कड़ नहीं. इत्मीनान से परिवार को ताजा भोजन खिलाते हैं. शुरु में उपयोग करने को लेकर डर लग रहा था, लेकिन अब खुशी होती है. कोई मेहमान किसी भी समय घर आ जाये, तो दिक्कत नहीं होती. उनसे बातचीत करते हुए उनका आवभगत करती हैं.

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आंखें खोलने वाले आंकड़े
400
सिगरेट के धुएं के बराबर है एक घंटे धुएं का प्रदूषण
5
लाख महिलाओं की धुएं से होती है देश में सालाना मौत
35
फीसदी घरों (शहरी क्षेत्र) में ही थी एलपीजी गैस की सुविधा वर्ष 2016 में
65
फीसदी औसत था देश के अन्य शहरों में एलपीजी गैस उपलब्धता का
हार्ट अटैक और सांस की बीमारी से देश में सर्वाधिक मौतें (डब्ल्यूएचओ)

जिंदगी निगलते धुएं हो रहे फुर्र
तिल-तिल कर मारते धुएं रसोई से हो रहे गायब, अब आंखों से नहीं गिरते आंसू
कोयला, लकड़ी, पत्ता व गोइठा चुनने के लिए भटकना नहीं पड़ता
अब जब मर्जी हुई, गैस किया ऑन और भोजन तैयार
परिवार को देती हैं समय, पहले खाना ही बनाती रहती थीं
बरसात में लकड़ी, गोइठा व कोयला भींगने का कोई झंझट नहीं.
जहरीले धुएं व प्रदूषण से मिली मुक्ति
गर्मी में चूल्हे की आग से अब तर-बतर नहीं होतीं
कम मेहनत में जल्द परिवार को देती हैं ताजा व स्वस्थ भोजन

परिवार में नहीं हैं महिला लाभुक
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लिए सूचीबद्ध राज्य के 29.4 परिवारों में से तीन लाख 18 हजार 61 परिवारों में एक भी महिला लाभुक नहीं है. ये आंकड़े सामाजिक,आर्थिक एवं जाति आधारित जनगणना 2011 के हैं.

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पाकुड़ की स्थिति थी सबसे खराब
वर्ष 2016 में इस योजना की शुरुआत होने से पूर्व एलपीजी कनेक्शन के मामले में सबसे खराब स्थिति पाकुड़ जिले की थी. यहां 100 में से महज 10 लोगों के पास भी गैस का कनेक्शन नहीं था. जामताड़ा में 10, गोड्डा और दुमका में 14-14, जबकि रांची में 62 फीसदी लोगों के पास गैस कनेक्शन की सुविधा थी.

सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कारगर कदम
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आइआइएम), अहमदाबाद के अध्ययन में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को सबसे बड़ी सामाजिक योजनाओं में से एक बताया गया है. आइआइएम अहमदाबाद के प्रोफेसर समीर बरूआ और सोभेश कुमार अग्रवाल ने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में गरीबों और वंचित वर्गों को रसोई गैस (एलपीजी) उपलब्ध कराने की योजना को अहम करार दिया है. एक रिपोर्ट की मानें, तो 1.36 अरब की आबादी वाले अपने देश भारत में करीब 10 करोड़ घरों में भोजन पकाने के लिए गोबर, लकड़ी और कोयले का उपयोग होता था. उज्ज्वला के जरिए तेजी से ये तस्वीर बदल रही है.