aamukh katha

  • Jun 5 2019 5:34PM

तालाब का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं ककरिया के ग्रामीण

तालाब का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं ककरिया के ग्रामीण

पवन कुमार
प्रखंड: लापुंग
जिला: रांची 

आपने रांची जिले के बेड़ो प्रखंड स्थित हरिहरपुर जामटोली पंचायत में पानी की स्थिति को जाना. इस पंचायत के ग्रामीणों के घर पाइपलाइन के माध्यम से पानी पहुंच रहा है, वहीं पास के लापुंग प्रखंड की ककरिया पंचायत के ग्रामीण आज भी पानी के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं. अपनी प्यास बुझाने व अन्य जरूरतों के लिए तालाब, कुएं या चापाकल पर आश्रित हैं. इलाके में चापाकल का पानी भी इतना बदरंग है कि उसे पीया नहीं जा सकता है.

देखिये, वैसे तो पूरे लापुंग प्रखंड में ही लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं, लेकिन ककरिया पंचायत के कुछ गांव व टोलों की स्थिति बेहद खराब है. इसके लिए जल्द बड़े कदम उठाने होंगे. ककरिया के जिप सदस्य बांदे हेरेंज इस बात को बताते हुए अपना पसीना पोछने लगते हैं. रांची जिला अंतर्गत लापुंग प्रखंड की ककरिया पंचायत बेड़ो और लापुंग की सीमावर्ती पंचायतें हैं. इस पंचायत में पानी की बेहद कमी है. हालांकि, पूर्व में इस क्षेत्र में जलापूर्ति और सिंचाई के लिए कई योजनाएं चलायी गयीं, लेकिन सभी फेल दिखाई पड़ती हैं. सिंचाई के लिए नहर भी बने हैं, लेकिन नहर में धूल और सूखे पत्तों के अलावा पानी का कहीं नामोनिशान नहीं है. ग्रामीणों के मुताबिक, ककरिया में पीएचइडी द्वारा टंकी बनाने का कार्य शुरू किया गया. पानी के लिए बोरिंग भी करायी गयी, लेकिन इस योजना के साथ-साथ बोरिंग भी फेल हो गयी. अब ककरिया पंचायत के ग्रामीणों की स्थिति यह है कि उन्हें पीने तक के लिए पानी बड़ी मुश्किल से मयस्सर हो पा रही है.

सूख गये कुएं, खराब हैं चापाकल
ककरिया पंचायत में कुल आठ राजस्व गांव हैं. सेमला, डुरू, खटंगा, निकेल, चंपाडीह, ककरिया, कंडरकेल और कुरकुरिया. इसके अलावा आठ टोले भी हैं. इन सभी गांव और टोले को मिला कर लगभग 10 हजार की आबादी है. पंचायत में पेयजल को लेकर कार्य भी हुए हैं. कुरकुरिया में विद्युत संचालित मोटर पंप लगे हैं, जहां से ग्रामीण आकर पानी ले जाते हैं. डुरू के स्कूल में एक जलमीनार लगा हुआ है. ककरिया में बिजली संचालित तीन मोटर जलमीनार लगे हैं और एक सौर ऊर्जा संचालित पंप लगा हुआ है, जबकि निकेल में एक बिजली संचालित जलमीनार लगा हुआ है, लेकिन इतनी बड़ी आबादी के लिए इससे जलापूर्ति कर पाना संभव नहीं है. जिनके घर जलमीनार के सामने हैं, उन्हें थोड़ी राहत है, लेकिन अन्य ग्रामीणों के लिए परेशानी है, क्योंकि सभी कुएं सूख चुके हैं. पंचायत में चापाकल की भी स्थिति अच्छी नहीं है. आधे से अधिक चापाकल खराब हैं. महिला मुखिया बताती हैं कि चापाकल खराब होने की शिकायत करने के बाद भी अभी तक मरम्मत कार्य शुरू नहीं किया गया है.

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पंचायत में चापाकल की स्थिति
ककरिया पंचायत के ग्रामीणों से बातचीत के आधार पर आंकड़े दिये जा रहे हैं. इसमें सिर्फ राजस्व गांवों के आंकड़े हैं. टोलों की जानकारी नहीं है.

 

गांव                                चालू चापाकल                                      खराब चापाकल
सेमला                                       03                                                      10
ककरिया                                   05                                                       08
खटंगा                                      01                                                       04
डुरू                                         03                                                       07
चंपाडीह                                     02                                                      04
निकेल                                      03                                                      04
कन्डरकेल                                  02                                                      04
कुकुरिया                                    01                                                      02

गांव से गुजरती है कनकी नदी
सेमला गांव से कनकी नदी शुरू होती है और कारो नदी में जाकर मिलती है. सेमला से शुरू होकर कनकी नदी ककरिया, कुसुमटोली, डाड़टोली, अम्बाटोली, निकेल, चंपाडीह और कंडरकेल होकर गुजरती है. जिस किसी भी गांव और टोलों से यह नदी गुजरती है, पहले वहां के लोगों के लिए यह नदी जीवनधारा की तरह काम करती है, लेकिन गर्मी में यह नदी भी सूख जाती है. गड्ढों पर जो पानी जमा रहता है, उसे ग्रामीण इस्तेमाल करते हैं. कई स्थानों पर जेसीबी से गड्ढा खोद कर पानी निकाला जाता है. ग्रामीण बताते हैं कि पहले गर्मी के मौसम में भी कुओं और तालाब में पानी भरा रहता था. नदी में भी पानी रहता था, पर इधर बीते एक दशक से समस्या शुरू हुई है. ग्रामीणों के मुताबिक, जल प्रबंधन की अनदेखी और घटते जंगल के कारण ही ऐसा हो रहा है. फिलहाल ककरिया पंचायत के 30 फीसदी क्षेत्र में जंगल है. पानी की कमी होने के कारण लोग खेती-बारी भी नहीं कर पा रहे हैं.

सेमला डाड़टोली में हालत बदतर
पानी को लेकर सेमला डाड़टोली की स्थिति काफी गंभीर दिखती है. ग्रामीणों को पानी के लिए कड़ी धूप में भटकना पड़ता है. यहां लगभग 14 परिवार रहते हैं और आबादी 150 के करीब है. गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है. यहां पांच कुएं हैं, पर सब सूख चुके हैं. मात्र एक चापाकल है, लेकिन पानी खराब होने के कारण ग्रामीण इसका उपयोग नहीं करते हैं. मजबूरीवश अपनी प्यास व अन्य जरूरतों के लिए ग्रामीण नदी, तालाब या नाले में जमा पानी का उपयोग करते हैं या कभी-कभी इसी चापाकल के पानी का उपयोग करने को बाध्य होते हैं.

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जमीन होने के बावजूद हम गरीब हैं : महादेव मुंडा
डेढ़ एकड़ जमीन है. सब्जी-खेती के लिए बहुत बढ़िया है, लेकिन पानी नहीं है. कैसे सिंचाई करेंगे. बस बरसाती खेती पर निर्भर है. महादेव मुंडा इस बात को बताने के साथ ही कहते हैं कि कहीं से हमारे लिए पानी का इंतजाम हो जाता, तो खेती-बारी करके अच्छे से जिंदगी बीता सकते थे. अभी रोजगार के लिए पलायन करना पड़ता है.

मजबूरी में चापाकल का गंदा पानी पीना पड़ता है : मैनो देवी
चापाकल का गंदा पानी दिखाते हुए मैनो देवी बताती हैं कि देखिए इसी पानी को पीना पड़ता है, नहीं तो पानी लाने के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है. हम तो इस पानी को पीने के आदि हो गये हैं, लेकिन बाहर के लोग इस पानी को नहीं पी पाते. चापाकल के अलावा नदी ही दूसरा विकल्प है. उसके लिए बहुत दूर जाना पड़ता है.

पानी के चक्कर में आधा दिन बर्बाद हो जाता है : रिंकी मुंडा
क्या करें, आधा दिन तो पानी के चक्कर में बर्बाद हो जाता है. गर्मी में भरी दोपहर में पानी के लिए भटकना पड़ता है. इतना बताते हुए रिंकी दूर इशारा करते हुए कहती हैं कि जहां तक आपका नजर जा रहा है, वहां से पानी लाते हैं. गंदा पानी पीने के कारण कई बार बीमार भी पड़ते हैं. मजबूरी में पानी पीना ही पड़ता है. कुआं का पानी भी शुरुआती बारिश में गंदा ही रहता है. गर्मी में कीड़े हो जाते हैं.

पहले ऐसे हालात नहीं थे : चरण मुंडा
चरण मुंडा बताते हैं कि अगर कहीं बाहर जाना रहता है, तो अहले सुबह उठ कर नहाने जाना पड़ता है, क्योंकि नदी जाकर नहा कर आने में लगभग दो घंटे लग जाते हैं. चरण बताते हैं कि पहले ऐसे हालात नहीं थे. कुआं और तालाब में पानी रहता था, पर धीरे-धीरे जलस्तर नीचे जाने लगा. पेड़ कट रहे हैं, जिसके कारण ऐसा हो रहा है. क्या करें अपना घर है, छोड़कर कहां जाएं.

जल्द दूर करनी होगी पानी की समस्या : बिरसमुनी देवी
ककरिया पंचायत की मुखिया कहती हैं कि पंचायत के और कई गांवों का भी यही हाल है. पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए जलमीनार लगाने की जरूरत है. इसके साथ ही गिरते जलस्तर को बढ़ाने के लिए बेहतर जल प्रबंधन तकनीक का इस्तेमाल करते हुए आगे कार्य करना होगा. इसके लिए सरकारी सहयोग के साथ-साथ ग्रामीणों का सहयोग भी बेहद जरूरी है. अगर पानी की उपलब्धता सुनिश्चित हो जाये, तो ग्रामीण कृषि कार्य भी बेहतर तरीके से कर पायेंगे. वनों से सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है.