aamukh katha

  • Jan 17 2020 1:21PM

छाता बरटोली: दो साल से गांव में नहीं मिली कुपोषण की एक भी शिकायत

छाता बरटोली: दो साल से गांव में नहीं मिली कुपोषण की एक भी शिकायत
छाता बरटोली के मॉडल आंगनबाड़ी केंद्र में पढ़ते बच्चे

पवन कुमार
जिला: खूंटी 

खूंटी जिला अंतर्गत छाता बरटोली का आंगनबाड़ी केंद्र दूर से देखने पर ही अपनी ओर आकर्षित करता है. दीवारों पर फूल, पौधे, मोटू-पतलू कार्टून के अलावा कई खूबसूरत चित्र बने हुए हैं. यही कारण है कि अब बच्चे भी इस आंगनबाड़ी केंद्र में आने को आतुर रहते हैं. छाता बरटोली गांव की जनसंख्या के हिसाब से यह मिनी आंगनबाड़ी केंद्र है, लेकिन इसे मॉडल आंगनबाड़ी केंद्र की तरह बनाया गया है. केंद्र को देखने पर यह किसी निजी प्ले नर्सरी स्कूल की तरह ही दिखता है. अंदर भी बच्चों के खेलने और खेल-खेल में पढ़ने के लिए ऐसी व्यवस्था है कि बच्चे खेल-खेल में बहुत कुछ सीख रहे हैं. इतना ही नहीं, गांव से कुपोषण की समस्या भी दूर हो रही है, क्योंकि इस केंद्र में समय- समय पर स्वास्थ्य की जांच भी होती है. जो बच्चा कमजोर पाया जाता है, उसे एमटीसी भेज दिया जाता है. इससे समय रहते बच्चे का इलाज हो जाता है. पिछले दो वर्ष से कुपोषण की एक भी शिकायत गांव से नहीं मिली है.

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दूरी के कारण नहीं आ पाते हैं बच्चे

छाता बरटोली गांव में 309 घर हैं. इन घरों से आठ से 10 बच्चे रोजाना आंगनबाड़ी केंद्र में आते हैं, जबकि आंगनबाड़ी के रजिस्टर में 12 बच्चे नामांकित हैं. गांव में घर दूर-दूर है. इस कारण बच्चों को केंद्र तक पहुंचने में परेशानी होती है. सहायिका नहीं होने के कारण आंगनबाड़ी सेविका को ही बच्चों को बुलाने जाना पड़ता है. पढ़ाना और खाना बनाना सब सेविका के ही जिम्में है. आंगनबाड़ी केंद्र में पेयजल की व्यवस्था है. पानी के लिए नल लगा हुआ है. शौचालय की व्यवस्था भी है.

कसरत से होती है दिन की शुरुआत

बच्चे जब आंगनबाड़ी केंद्र में आते हैं, तब उन्हें कसरत कराया जाता है. इसके बाद नाश्ते में दलिया दिया जाता है. पहले अंडा दिया जाता था, पर अब यह बंद हो गया है. इसके बाद बच्चों को अक्षर ज्ञान, संख्या ज्ञान, फल-फूल और सब्जियों के नाम तस्वीर दिखाकर सीखाये जाते हैं. बच्चे लिखने का भी अभ्यास करते हैं. इसके बाद दोपहर में बच्चों को खिचड़ी दिया जाता है. महीने के तीसरे सप्ताह में टेम होम राशन के तहत राशन विरतण होता है. वहीं, महिलाएं व बच्चों की जांच और टीकाकरण भी किया जाता है.

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समय से नहीं मिलता है मानदेय : मुक्ता आइन्द

आंगनबाड़ी सेविका मुक्ता आइन्द बताती हैं कि भवन तो अच्छा बन गया है, लेकिन समय से उन्हें मानदेय नहीं मिलता है. आंगनबाड़ी भवन के लिए उन्होंने अपनी जमीन दान में दी है. केंद्र में खाना बनाने के लिए एक गैस चूल्हा भी अपने पैसे से लिया है. नया भवन बन जाने से बच्चों का रूझान बहुत बढ़ा है. बच्चे यहां आते हैं और बहुत कुछ सीख कर जाते हैं.


गांव का प्ले स्कूल है मॉडल आंगनबाड़ी केंद्र : सरोज सांगा

सरोज सांगा ने बताया कि गांव में प्ले स्कूल नहीं होने के कारण छोटे बच्चों को परेशानी होती थी. पर, अब मॉडल आंगनबाड़ी बन जाने के बाद गांव में प्ले स्कूल की कमी पूरी हो गयी है. साथ ही, ग्रामीण महिलाओं की समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी होती है. बच्चे दूसरे बच्चों के संपर्क में आ रहे हैं. नये दोस्त बना रहे हैं.

बच्चों के लिए है बेहतर व्यवस्था : सुरेंद्र तिड़ू

बिचना पंचायत के मुखिया सुरेंद्र तिड़ू कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की शुरुआती शिक्षा, कुपोषण दूर करने और महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर मॉडल आंगनबाड़ी की भूमिका अहम है. अपने स्तर से वो बच्चों को आंगनबाड़ी भेजने के लिए अभिभावकों को प्रेरित करते हैं. अब तो यहां के छोटे-छोटे बच्चे भी कई सवालों का जवाब आसानी से देते हैं.