aamukh katha

  • Sep 16 2019 1:01PM

दुनिया को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहे झारखंड के टानाभगत

दुनिया को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहे झारखंड के टानाभगत

गुरुस्वरूप मिश्रा
प्रंखड: भंडरा
जिला: लोहरदगा 

महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी झारखंड के टानाभगत दुनिया को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहे हैं. अंतरिक्ष युग में भी ये बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, लेकिन गांधीगीरी रग-रग में है. मिट्टी के खपरैल घरों में भी बड़ी ही सादगी से जीवन गुजार रहे टानाभगतों की तंगहाली देख आप तरस खायेंगे. आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर करने के सात दशक बाद भी अपने पुरखों की जमीन वापसी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर इन खादीधारी चेहरों को देख कभी खुद को, तो कभी हुक्मरानों को कोसेंगे, लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी गांधी को जी रहा दुनिया का इकलौता समुदाय है टानाभगत, जो आज भी सत्य-अहिंसा के मार्ग पर चल कर विश्व को स्वच्छता की सीख दे रहा है.

सिर पर गांधी टोपी, बदन पर सफेद खादी कुर्ता-धोती, जनेऊ, हाथों में तिरंगा, शंख व घंट लिए झारखंड के टानाभगतों को आपने अक्सर देखा होगा. स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती पर इनके खिले चेहरे भी आपने देखे होंगे, लेकिन इन साधारण चेहरों के पीछे के असाधारण स्वच्छता मॉडल से आप शायद ही वाकिफ होंगे. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि विपरीत हालात में भी महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी टानाभगतों ने कभी गांधीगीरी नहीं छोड़ी. स्वच्छता ही इनकी जिंदगी है. शुद्धिकरण से पहले ये भोजन नहीं करते. रोजाना पूजा धाम में तिरंगे की पूजा के बाद ही शुद्ध शाकाहारी टानाभगत शांत चित्त से भोजन करते हैं. ये बाहरी भोजन से परहेज करते हैं. अपने हाथ से भरा पानी पीते हैं. घर में बना भोजन करते हैं. गाय का दूध इन्हें अतिप्रिय है, लेकिन पैकेट दूध नहीं पीते. नशापान से कोसों दूर रहने वाले स्वच्छता के दूत टानाभगत अभी भी मिट्टी के खपरैल घरों में रह रहे हैं, लेकिन लिपाई-पुताई से चकाचक दीवारें और घर-आंगन की साफ-सफाई देख मन प्रसन्न हो जायेगा. तंगहाली में भी तन-मन को स्वच्छ रखने वाले टानाभगत स्वच्छता के पुजारी हैं.

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स्वच्छता का शुद्धिकरण मंत्र
खेती-बारी और मजदूरी कर अपनी आजीविका चलाने वाले टानाभगत सुबह नींद खुलते ही धरती माता को प्रणाम करते हैं. नित्यक्रिया से निवृत होकर घर-आंगन की साफ-सफाई व रसोईघर में चूल्हे की लिपाई-पुताई के बाद स्नान कर वे शुद्धिकरण करते हैं. इसके लिए बर्तन में रखे पंचामृत (दुबला घास, हल्दी, तांबा, तुलसी और आम की पत्तियां) को पानी में मिलाकर अपने शरीर पर छिड़कते हैं. पंचामृत पीकर हाथ-पांव धोने के बाद इसे न सिर्फ रसोईघर समेत पूरे घर में छिड़कते हैं, बल्कि घर के आंगन में बने पूजा धाम में तिरंगे की पूजा में भी इसका उपयोग करते हैं. तन-मन शुद्ध करने के बाद मिट्टी के चूल्हे पर भोजन पकता है. भोजन से पहले सुबह-शाम रोजाना तिरंगे की पूजा करने वाला ये इकलौता समुदाय है.

स्वच्छता व शुद्धता की नौहंडी
धर्मेश की आराधना करने वाले टानाभगत स्वच्छता और शुद्धता को लेकर साल में तीन बार नौहंडी पर्व मनाते हैं. इनके महंत (टानाभगत) विधि-विधान से धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते हैं. नौहंडी पर्व में विशेष साफ-सफाई और लिपाई-पुताई होती है. तिरंगा झंडा और जनेऊ बदले जाते हैं. इससे घर-टोले और गांव स्वच्छ हो जाते हैं. पूजा के दौरान लोग उपवास करते हैं. हर घर और हर टोले में नौहंडी मनती है, ताकि पूरा गांव स्वच्छ व शुद्ध हो सके. अलग-अलग गांवों में अलग-अलग दिन मनाया जाता है, ताकि सभी एक दूसरे के घरों में शामिल हो सकें. साल में तीन बार होली, रथयात्रा और दीपावली से पहले नौहंडी का पर्व मनाया जाता है.

तन-मन की शुद्धता का उपवास
झारखंड में उरांव, मुंडा व खड़िया जनजाति से आने वाले टानाभगतों की जनसंख्या 20,518 है. राज्य के आठ जिले(रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, चतरा, लातेहार एवं पलामू) में 3,283 परिवार निवास करते हैं. महिला-पुरुष दोनों जनेऊ पहनते हैं. इनके लिए उपवास स्वच्छता व शुद्धता का मूलमंत्र है. तन-मन की शुद्धता के लिए वे उपवास करते हैं. इससेे उन्हें आंतरिक शक्ति मिलती है.

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स्वच्छता के विशेष दिवस
स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस व गांधी जयंती पर घर में तिरंगा झंडा व जनेऊ बदलते हैं. विशेष साफ-सफाई करते हैं. स्वच्छता पर पूरा जोर होता है.

स्वच्छता दूत महेश्वर सीखा रहे गांधीगीरी
रांची, गुमला और लोहरदगा जिले की तीन सीमानी स्थित झिको में गांव से दूर अपनी कुटिया बनाकर रह रहे महेश्वर बाबा (महेश्वर टानाभगत) की गांधीगीरी देख आप चौक जायेंगे. चेहरे पर चमक, माथे पर चंदन का टीका, खुला बदन और पके हुए बाल व दाढ़ी. जनेऊधारी महेश्वर वस्त्र के नाम पर सिर्फ लंगोट पहनते हैं. यदा-कदा धोती ओढ़ते हैं. इनकी कुटिया में चरखा, घंट, शंख एवं तिरंगा है. वह चरखा चलाकर और लोगों को सिखाकर प्रवचन के जरिए टानाभगतों को अहिंसा का पाठ पढ़ाते हैं. इनकी कुटिया में प्रवेश आसान नहीं है. चप्पल व जूते कुटिया से दूर खोलने के बाद निर्धारित स्थल पर खड़े रहना है. बाबा महेश्वर स्वयं जल एवं मंत्रोच्चार से आपका शुद्धिकरण करेंगे. इसके बाद बांस-फुस की बनी कुटिया में प्रवेश कर सकेंगे. यहां आकर आपको सुकून मिलेगा.

रह चुके हैं हवा-पानी पीकर
महेश्वर ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, लेकिन टानाभगतों को हर गुरुवार बापू के सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ाते हैं. एक सप्ताह तक केवल हवा-पानी पीकर रह चुके हैं. करीब डेढ़ माह तक एक फल खाकर रहे. कच्चा चावल, सब्जी व फल खाकर रहते हैं. पका हुआ भोजन नहीं करते. हैरत ये कि अब तक बीमार भी नहीं पड़े हैं. पिछले एक साल से वह इस कुटिया में रह रहे हैं. इससे पूर्व घुमंतू जीवन जी रहे थे. ऊंचे टीले पर बनी कुटिया शोर-शराबे से दूर बिल्कुल शांत जगह पर है. करीब एक किलोमीटर दूर गांव बसे हैं.

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स्वच्छता के प्रति समर्पित : डॉ एस नारायण
समाजशास्त्री डॉ एस नारायण कहते हैं कि दुनिया में बापू के ये इकलौते अनुयायी हैं, जिनकी सादगी और स्वच्छता के प्रति समर्पण एक उदाहरण है.

प्रवेश के लिए शुद्धिकरण जरूरी : महेश्वर
महेश्वर बाबा कहते हैं कि कुटिया में प्रवेश के पहले शुद्धिकरण कर उद्धार किया जाता है. चरखा चलाना है. सिखाना है और अहिंसा का पाठ पढ़ाना है.

जीवन का अभिन्न अंग है स्वच्छता : यशोदा
रांची की यशोदा टानाभगत कहती हैं कि स्वच्छता से हमारी दिनचर्या शुरू होती है. ये हमारे जीवन का अभिन्न अंग है. इसके बिना हम भोजन नहीं करते.

पंचामृत से रोजाना शुद्धिकरण : कृष्णा
लोहरदगा के कृष्णा टानाभगत कहते हैं कि रोजाना स्नान करने के बाद पंचामृत से शुद्धिकरण करते हैं. तिरंगे की पूजा के बाद ही घर में भोजन पकता है.

स्वच्छता के लिए नौहंडी : छोटूना
गुमला के महंत छोटूना टानाभगत कहते हैं कि स्वच्छता व शुद्धता के लिए नौहंडी पर्व मनाते हैं. इससे तन-मन शुद्ध और गांव-घर स्वच्छ हो जाता है.