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  • Jul 2 2019 11:47AM

कृषि योजनाओं का मिले लाभ, तो बदलेगी किसानों की सूरत

कृषि योजनाओं का मिले लाभ, तो बदलेगी किसानों की सूरत

पंकज कुमार पांठक
प्रखंड: बेड़ो
जिला: रांची

साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. इसके लिए कई सरकारी योजनाएं चलायी जा रही हैं. राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से किसानों के खाते में डीबीटी के जरिए पैसे ट्रांसफर किये जा रहे हैं. लक्ष्य है किसानों की हर संभव मदद की जाये. सरकार पूरी कोशिश कर रही है, लेकिन किसानों की स्थिति कितनी सुधरी ? कितना लाभ हुआ, आनेवाले समय में किसानों को कितना लाभ मिलेगा ? इन सारे सवालों का जवाब किसानों से पूछा जाये, तो बेहतर है.रांची के बेड़ो ब्लॉक के विनय बगीचा, पाकलमेड़ी, पुरियो एवं कठ्ठल टोली के किसानों का हाल. इन इलाकों में खूब खेती होती है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर बनी योजनाएं किसानों के खेत तक नहीं पहुंच रही. मिट्टी की जांच, सब्सिडी पर खाद और बीज एवं पानी तक नहीं पहुंच रहा.

खेती में कितना फायदा, कितना नुकसान
इस इलाके में कई किसान हैं, जो धान की खेती करते हैं. राजेश आठ एकड़ में धान की खेती करते हैं. एक एकड़ में अगर हम खेती का हिसाब लगायें, तो 10 से 12 क्विंटल धान होंगे. ज्यादा भी हो सकते हैं. मौसम, खेत और बीज के साथ- साथ आपकी मेहनत पर निर्भर करता है. इसमें खाद, बीज और मजदूरी मिला कर 16 से 17 हजार रुपये का खर्च आता है. फसल तैयार होने में चार महीने का वक्त लगता है. बाजार की कीमत के आधार पर आपके धान की बिक्री होती है. कुल मिला कर किसान के पास मुनाफे के रूप में कुछ हजार रुपये बचते हैं. डीएपी की कीमत बढ़ी, तो लागत बढ़ गयी. किसान बताते हैं कि हमारे पास मुनाफे के रूप में कुछ पैसों के साथ-साथ बच जाता है तो पुआल. इसे हम या तो बेच देते हैं या मवेशी को खिलाते हैं.

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पुरानी विधि से ही रही है खेती
इस इलाके के ज्यादातर किसान खेती के लिए पीढ़ियों से चली आ रही तकनीक का ही इस्तेमाल करते हैं. केश्वर महतो पुराने किसान हैं. बताते हैं कि खेती की तकनीक बदली है, लेकिन हम पुराने तरीके ही इस्तेमाल कर रहे हैं. हां, हाइब्रिड के आने से फसल में फर्क पड़ा है, लेकिन तरीका वही पुराना है. हमारे क्षेत्र से कुछ किसान जाते जरूर हैं लेकिन हमें आकर कुछ बताते नहीं हैं.

सॉयल हेल्थ योजना की जानकारी नहीं
इन गावों में किसानों को सॉयल हेल्थ योजना के तहत हो रही मिट्टी जांच की कोई जानकारी नहीं है. ना किसी अधिकारी ने पहुंच कर यहां से मिट्टी की जांच की और न ही किसान अपनी मिट्टी के स्वास्थ के लिए जांच केंद्र तक पहुंचे. वैसे इलाके जो पूरी तरह से खेती पर निर्भर हैं, उनकी मिट्टी की जांच भी नहीं हुई.

कृषि मित्र भी नहीं रखते जानकारी
किसानों के सहयोग के लिए कृषि मित्र को नियुक्त किया गया है, लेकिन आलम देखिये कि इन इलाकों में कार्य करनेवाले कृषि मित्र को भी किसान संबंधी सरकारी योजनाओं की जानकारी नहीं है. कृषि मित्र कृष्णा महतो बताते हैं कि हमें योजना की जानकारी है, लेकिन किसान लाभ लेना नहीं चाहते हैं. इन्हें जांच के लिए सैंपल ले जाना चाहिए था.

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फूलगोभी और बंधागोभी नहीं खा रहे हैं किसान
सब्जी की खेती से लाखों का मुनाफा कमा रहे किसान मानते हैं कि मिट्टी में पहले जैसी उर्वरक क्षमता नहीं रही. फूलगोभी, बंधागोभी, बैंगन जैसी सब्जियों में कीटनाशक का खूब इस्तेमाल होता है. इस कारण वे इसे नहीं खाते. किसान बताते हैं कि इनका इस्तेमाल किये बगैर इनकी खेती मुश्किल है, इसलिए हमें मजबूरन करना पड़ता है.

केस स्टडी - 1
मेहनत, पैसा व किस्मत है खेती में सफलता का फार्मूला : बजरंग महतो
बजरंग महतो पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं. 10 एकड़ में तरह- तरह की सब्जियों के साथ अदरक, लहसून जैसे मसालों की भी खेती करते हैं. बजरंग के खेतों से निकलकर सब्जियां दूसरे राज्यों तक जाती हैं. कई बार बाजार में मांग अच्छी होती है, तो अपनी मेहनत से लाखों कमाते हैं, खेती में नुकसान हुआ, तो लाखों गंवा भी देते हैं. बजरंग बातचीत में कहते हैं कि खेती जुआ है. इसमें आपके पैसे भी लगते हैं, मेहनत भी लगती है और किस्मत भी चाहिए. अगर तीनों ने साथ दिया तो मुनाफा और किसी एक में भी कमी हुई तो नुकसान तय है.

केस स्टडी - 2
चार एकड़ में करती हैं धान की खेती : मालती देवी
मालती देवी इस टोले में रहती हैं. पति के निधन के बाद किसान बन गयीं. इनकी चार बेटियां हैं. मालती खेत के दम पर बच्चों को स्कूल भेज पा रही हैं. बच्चे भी मां के खेत में पूरी मदद करते हैं. सब्जियों के साथ- साथ मालती धान की भी खेती करती हैं. चार एकड़ में खेती करती हैं. इन्हें भी कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही. मालती कहती हैं कई बार इतना नुकसान हो जाता है कि हमारे पास कुछ नहीं बचता. दोबारा खेती की शुरुआत के लिए सोचना पड़ता है.

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केस स्टडी - 3
मेहनत के अनुरूप परिणाम नहीं मिला : राजेश महतो
राजेश महतो हर तरह की सब्जियों की खेती करते हैं. 10 एकड़ में धान समेत कई फसलों की खेती की तैयारी है. पिछली बार भारी नुकसान से बचे. खेत में पानी की कमी से फसल खराब हो रही थी. मेहनत दोगुनी करनी पड़ी. कहते हैं जिस तरह मेहनत करते हैं, उतना परिणाम नहीं मिला.

केस स्टडी - 4
पहले और अब की खेती में काफी अंतर आया : केश्वर महतो
केश्वर महतो पहले 25 एकड़ में खेती करते थे. 1984- 85 का दौर याद कर कहते हैं कि वह वक्त ही अलग था. मैं जितनी मेहनत करता था, पैदावार भी उतनी अच्छी थी. खेत में खाद कम पड़ते थे. मिट्टी में उर्वरता थी. अब हालात उलट हैं. मैं सिर्फ एक एकड़ में खेती करता हूं. मैंने भी अबतक किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं लिया. हां, कुछ महीनों पहले मेरे खाते में पीएम किसान योजना के तहत दी गयी धनराशि जरूर पहुंची है.

संसाधन कम और क्षेत्र बड़ा, फिर भी हर गांव तक पहुंचने की कोशिश : अशोक सिन्हा
रांची जिला कृषि पदाधिकारी अशोक सिन्हा कहते हैं कि हम सभी गांवों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. हमारे पास संसाधन कम है और क्षेत्र काफी बड़ा है. किसानों में भी जागरूकता की कमी है. हमारे पास जितने बीज और खाद आते हैं, किसान उसका इस्तेमाल नहीं करते. आजकल किसान हाइब्रिड का इस्तेमाल अधिक करते हैं. किसानों की मदद के लिए हम समूह बना रहे हैं, ताकि उन्हें मुनाफा हो. हमने चान्हो के कुछ गांवों में किसानों का समूह बनाया है. उनकी फसल की अच्छी कीमत दिलायी. जिन इलाकों में मिट्टी की जांच नहीं हुई, इस बार हम वहां तक पहुंचने की कोशिश करेंगे. किसान मिट्टी की जांच और खेती के नये तरीकों को गंभीरता से नहीं लेते. मिट्टी की जांच के बाद उसके बेहतर स्वास्थ्य के लिए पूरे गांव को काम करना होगा. यह सरकार की नयी नीति है. हमें उम्मीद है इससे किसानों को फायदा होगा.