aamukh katha

  • Dec 1 2017 1:36PM

यहां हैं भगवान राम के पदचिन्ह

यहां हैं भगवान राम के पदचिन्ह
कसमार प्रखंड के डुमरकुदर गांव के पास हिसीम-केदला पहाड़ी श्रंखला में मृगखोह नामक जगह है. कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम का यहां आगमन हुआ था. उस वक्त भगवान श्रीराम 14 साल के वनवास पर थे और सीता मइया की जिद व इच्छा पूरी करने के लिए स्वर्ण मृग का पीछा करते हुए यहां तक पहुंचे थे.

कहा जाता है कि स्वर्ण मृग को एक खोह में प्रवेश करता देख भगवान श्रीराम ने धनुष से उस पर तीर चलाया था. वह तीर खोह के जिस हिस्से में टकराया था, वहां से दूध की धार निकलने लगी थी. पहाड़ी पर दो अलग-अलग जगहों पर भगवान श्रीराम के पदचिह्न हैं.

एक पदचिह्न पर मंदिर का निर्माण भी काफी समय पहले हो चुका है. दूसरा पदचिह्न पहाड़ की चोटी पर स्थित है. इसमें ग्रामीण अपने स्तर से मंदिर का निर्माण कर रहे हैं. इन पदचिह्नों तक पहुंचने के लिए पहाड़ की पगडंडियों से गुजरना पड़ता है. यहां पर मंदिर और खोह के बीच झरना बहता है. यहां की मनमोहक वादियां लोगों को सहज लुभाती हैं. हर साल 15 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर यहां विशाल टुसू मेला लगता है. नये साल के अवसर पर पिकनिक मनाने के लिए यहां केवल आसपास के गांवों से ही नहीं, बल्कि दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं.
 
राम-लखन टुंगरी भी आये थे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम
मृगखोह से मंजूरा गांव की राम-लखन टुंगरी का भी संबंध है. यहां भी कुछ पदचिह्न हैं, जो भगवान श्रीराम के बताये जाते हैं. हसीन वादियों में इस स्थल के होने से सालों भर लोग दर्शन-पूजन के लिए आते हैं. क्षेत्र का यह प्रमुख पिकनिक स्पॉट भी है. मकर संक्रांति के अवसर पर यहां भी विशाल टुसू मेला लगता है.