aamukh katha

  • Oct 5 2017 1:47PM

सब्जियों से कीजिए मस्त कमाई

सब्जियों से कीजिए मस्त कमाई

रबी के मौसम में सब्जियों की बंपर खेती होती है. इससे किसानों को काफी लाभ होता है. सब्जी की खेती कर किसान अच्छी आमदनी कर सकते हैं. रबी की खेती मुख्यत: जाड़े में होती है. इस मौसम में किसानों को सब्जियों के अच्छे दाम मिलते हैं, हालांकि इस मौसम में किसानों को सब्जियों से संबंधित कई बीमारियों का भी सामना करना पड़ता है. अगर किसान भाई-बहन वैज्ञानिक तरीके से खेती करते हुए कृषि वैज्ञानिकों के सुझाव के साथ-साथ खाद और उन्नत बीज का उपयोग करें, तो उन्हें खेती में कभी नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा. किसान भाई-बहन कैसे सही बीजों की पहचान करें, खेतों में  किस समय कितनी खाद डाली जाये, जिससे उनकी फसलों की पैदावार अच्छी हो, इस संबंध में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर के प्लांडू (रांची) स्थित केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक रविशंकर पान और कीटनाशक विशेषज्ञ जयपाल सिंह चौधरी ने किसान भाई-बहनों के लिए कई महत्वपूर्ण जानकारी दी है. पेश है दोनों विशेषज्ञों से बातचीत पर आधारित यह आलेख.

रबी के मौसम में अपने खेतों से बंपर फसल उत्पादन के लिए किसान जी-तोड़ मेहनत करते हैं, साथ ही उन्हें यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि पूरे खेत में सिंचाई और खाद बराबर मात्रा में पहुंच जाये. इसके लिए खेत में तीन से चार बार अच्छे से हल चलायें और जुताई करें. जुताई करने के बाद मिट्टी को पूरी तरह से भुरभुरा बना कर लाइन या बेड बना कर ही बुआई करें या फिर बिचड़ों की रोपाई करें. रबी के मौसम में कई सब्जियों की सीधी बुआई की जाती है, लेकिन कुछ सब्जियों के बिचड़े भी तैयार करने पड़ते हैं.

रबी मौसम की सब्जियां
रबी मौसम में मुख्य तौर पर टमाटर, बैंगन, मटर, फरसबीन, साहेब सेम, गाजर, मूली, शलजम, फूलगोभी, पत्तागोभी, ब्रोकली, पालक, धनिया, मेथी, बथुआ, सरसों आदि की खेती होती है. अक्तूबर के पहले सप्ताह से किसान सब्जियों की बुआई की शुरुआत कर सकते हैं.

बीजोपचार

सब्जियों की सीधी बुआई या बिचड़ा तैयार करने से पहले बीजोपचार करना बेहद जरूरी होता है. बीजोपचार के लिए कैपटॉन, थीरम या बैबिस्टीन पाउडर को दो से तीन ग्राम प्रति किलो बीज की दर से इस्तेमाल कर सकते हैं. बीजोपचार करने से बीज खराब नहीं होते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी बढ़ जाती है.

हर जिले में खुला मिट्टी जांच केंद्र
राज्य के प्रत्येक जिले में मिट्टी जांच केंद्र खोले गये हैं. यहां किसान अपने खेत की मिट्टी लाकर जांच करा सकते हैं. जांच केंद्र से मिट्टी की जांच कराना जरूरी है, क्योंकि यहां मिट्टी की जांच वैज्ञानिक तरीके से की जाती है.

मिट्टी जांच के तरीके
मिट्टी उठाने के लिए किसान सबसे पहले खेत में एक आड़ी तिरछी रेखा खींची हुई मान कर जहां पर दो रेखाएं मिल रही हैं, वहां से मिट्टी उठा लें. ऐसी रेखाएं एक एकड़ खेत में कई जगहों पर मिल कर कोण बनायेंगी. जितनी जगह पर कोण बन रहे हैं, उतनी जगह की मिट्टी को उठा लें. अगर सब्जी या अन्न उत्पादन कर रहे हैं, तो मिट्टी लेने के लिए सबसे पहले फावड़े से छह सेंटीमीटर का गड्ढा खोदें. गड्ढे का आकार वी आकार का होगा. इसके बाद गड्ढे को छील कर उसमें से लगभग आधा किलो मिट्टी निकालें. इस प्रक्रिया के तहत किसान एक एकड़ खेत से आठ-दस जगह से मिट्टी निकाल सकते हैं. इसके बाद सभी मिट्टी को एक साथ अच्छी तरह से मिला लें और उसे एक जगह फैला दें. उस मिट्टी को चार हिस्सों में बांट दें. चार हिस्सों में दो हिस्सों को फेंक दें. बाकी बचे दो हिस्से की मिट्टी को फिर से मिला लें और इसी प्रक्रिया को तब तक दोहरायें जब तक मिट्टी घट कर आधा किलो न हो जाये. इस आधा किलो मिट्टी को अपने पास के मिट्टी जांच केंद्र में ले जाकर जमा कर दें. फलदार पेड़ों की खेती के लिए इसी प्रक्रिया के तहत किसान मिट्टी उठा सकते हैं, लेकिन इसके लिये मिट्टी उठाने के लिए गड्ढा कम-से-कम एक मीटर का होना चाहिये. मिट्टी की जांच के बाद किसानों को मिट्टी हेल्थ कार्ड दिया जाता है, जिससे किसान अपनी जमीन के बारे में जान सकते हैं. मिट्टी हेल्थ कार्ड में दी गयी जानकारी के मुताबिक किसान अपने खेत में चूना-खाद आदि का इस्तेमाल तय मानकों के आधार पर कर सकते हैं, जिससे उपज में बढ़ोत्तरी होती है.

सब्जियों के उन्नत बीज
टमाटर
स्वर्ण संपदा, स्वर्ण लालिमा, अरकारक्षक.
बैंगन
स्वर्ण श्यामली, स्वर्ण प्रतिमा, स्वर्ण शक्ति.
मटर
आरकेल, स्वर्ण मुक्ति, काशी उदय, कासी नंदिनी.
मिर्च
स्वर्ण प्रफुल्ल, काशी अनमोल.
फूलगोभी
पूसा स्नोबॉल, पूसा शुभ्रा, पंत शुभ्रा.
फरसबीन
काशी परम, अरकाकोमल, स्वर्ण प्रिया.
(ये सभी बीज रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले होते हैं.)

 कहां करें संपर्क : खेती-किसानी से जुड़े किसान भाई-बहन, जो भी सब्जी बीज उत्पादन से जुड़ना चाहते हैं, उन्हें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर के पलांडू-रांची में प्रशिक्षण देकर प्रोत्साहित किया जाता है. इसके लिए आइसीएआर केंद्र में जाकर संबंधित विभाग के अधिकारियों से मिल कर विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.


मटर
सूबे में सब्जी और दाल के लिए मटर की खेती की जाती है. इसकी खेती हरी फल्ली (सब्जी), साबुत मटर एवं दाल के लिए की जाती है. राज्य के करीब 86 फीसदी क्षेत्रों में मटर की खेती की जाती है. रबी वर्ष 2016-17 में मटर की खेती का लक्ष्य 58 हजार हेक्टेयर क्षेत्र निर्धारित किया गया था. इसके तहत करीब 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मटर की खेती हुई.

अच्छी पैदावार के उपाय : मटर की खेती में बीज की सीधी बुआई की जाती है. बीजोपचार करने के बाद इसे खेत में लगा सकते हैं. किसान अक्तूबर के पहले सप्ताह की शुरुआत से ही मटर की बुआई कर सकते हैं. किसान एक हेक्टेयर जमीन में 70 से 80 किलोग्राम मटर की बुआई कर सकते हैं. मटर की बुआई के लिये अक्तूबर से नवंबर का समय सबसे अनुकूल माना जाता है. मटर लगाने में दो पौधों के बीच की दूरी कम-से-कम पांच सेंटीमीटर रखें और दो लाइन की दूरी कम-से-कम 30 सेंटीमीटर रखें. किसान ध्यान रखें कि जो भी खाद का इस्तेमाल वो कर रहे हैं, वो बुआई के समय ही डाल दें. मटर, बोदी और फरसबीन के खेत में किसान 150 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खाद का इस्तेमाल कर सकते हैं. मटर में कई प्रकार के रोग होने की संभावना रहती है. मटर में अमूमन छाछा रोग होता है, जिसे चुरनी आसिता भी कहते हैं. इस रोग में मटर के पत्तों और फूलों पर सफेद पाउडर जैसा पदार्थ दिखता है. इसके साथ-साथ झुलसा रोग भी मटर में आम है. फसल में यह रोग लगने पर हेक्साकोनाजोल नामक दवा को एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें या स्लफाक्स पाउडर ढाई ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर उसका छिड़काव कर सकते हैं. झुलसा रोग होने पर कार्बेंडाजिम को एक ग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर इसका छिड़काव करें या एजोक्सीस्ट्रोबिन एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिला कर इसका छिड़काव कर सकते हैं. मटर की अच्छी उपज के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले उन्नत किस्म के बीज का उपयोग करें. मटर की खेती में निकाई गुड़ाई समय पर अवश्य करें.

बिचड़ा तैयार करना : फूलगोभी, टमाटर, बैंगन और मिरचा का बिचड़ा तैयार करना पड़ता है. बिचड़ा तैयार करने के लिए सबसे पहले खेत में मिट्टी का बेड तैयार करें. बेड की ऊंचाई 15 सेंटीमीटर, चौड़ाई एक मीटर और लंबाई अपनी जरूरत के हिसाब से रखें. बेड तैयार करने के लिए उसमें गोबर, खाद और नीम या करंज की खली को अच्छे से मिला लें. बेड में हमेशा लाइन में बुआई करें. बुआई करने के बाद बेड में मच्छरदानी लगा दें, ताकि पौधों को कीटों से बचाया जा सके. बिचड़ा तैयार होने के बाद इन्हें खेतों में लगायें.

पोषक तत्व : सभी प्रकार के पौधों में पोषक तत्वों का छिड़काव करें. बोरोन मॉलीबोडियम नामक पोषक तत्वों का उपयोग करें. गोभी वर्गीय सब्जियों में पोषक तत्वों का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है. किसान हमेशा यह ध्यान रखें कि पोषक तत्वों के साथ स्टीकर अवश्य करें. खास कर फूलगोभी, मटर और पत्तागोभी की सब्जियों के लिए यह बहुत जरूरी है. स्टीकर लगाने से पोषक तत्व पत्तों में चिपक जाते हैं व सब्जियों को उसका लाभ मिलता है.

पौधों को कीट से बचाने के उपाय : सब्जियों के पौधों को कीट और बीमारियों से बचाना जरूरी है. फल छेदक कीटों के लिए सबसे पहले नीम आधारित कीटनाशकों का छिड़काव करें या डेलफीन एक किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पाउडर को पानी में मिला कर उसका छिड़काव करें. एनपीवी आधारित कीटनाशकों का भी समय-समय पर छिड़काव करें. कीटों का अधिक आक्रमण होने की दशा में फ्लूबेंडामाइड फेम एक ग्राम प्रति चार लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें या थाइयोडीकार्ब लार्विन एक ग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें या इमामेक्टिन बेंजोआइड एक ग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. सभी प्रकार के कीटनाशकों का 7 से 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव अवश्य करें. रस चूसनेवाले कीट को मारने के िलए नीम का तेल पांच मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें या थियोमेथॉक्शन एक मिलीग्राम प्रति तीन लीटर पानी में उपयोग कर 7 से 10 दिन के अंतराल पर िछड़काव करें.