aamukh katha

  • Sep 20 2017 1:52PM

झारखंड पंचायत राज स्वशासन परिषद का गठन, परिषद से बढ़ेगी पंचायतों की भागीदारी

झारखंड पंचायत राज स्वशासन परिषद का गठन, परिषद से बढ़ेगी पंचायतों की भागीदारी
झारखंड में पंचायती राज संस्थाओं को मजबूती प्रदान करने के लिए जनजातीय परामर्शदातृ परिषद (टीएसी) की तर्ज पर झारखंड पंचायत राज स्वशासन परिषद का गठन किया गया है. इसका उद्देश्य पंचायत की शक्तियों का विकेंद्रीकरण, कर्तव्य, कोष एवं कर्मियों के हस्तांतरण पर विचार करना है. साथ ही पेसा के प्रावधानों का क्रियान्वयन कराना, पंचायतों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए आय के स्रोतों को विकसित करना, पंचायत स्वयंसेवकों का चयन, प्रशिक्षण, दायित्व का निर्धारण एवं नियंत्रण संबंधी कार्यों का मूल्यांकन करना है. पंचायतों को सुदृढ़ बनाने में यह अपना सुझाव भी देगी.

स्वशासन परिषद के कार्य, दायित्व और सदस्यों के बारे में समीर रंजन का यह आलेख पढ़िए.
गांवों में विकास की नयी परिभाषा गढ़ने और उसकी रफ्तार तेज करने के उद्देश्य से झारखंड पंचायत राज स्वशासन परिषद का गठन किया गया है. पंचायती राज व्यवस्था को और बेहतर बनाते हुए पंचायतों के सशक्तीकरण एवं सुदृढ़ीकरण के लिए अनुभव एवं सुझाव देने के लिए जनजातीय परामर्शदातृ परिषद यानी टीएसी की तर्ज पर इस परिषद का गठन किया गया है. यह एक परामर्श देनेवाली संस्था होगी. फैसला लेने की स्वायतता परिषद को नहीं दी गयी है. परिषद का मुख्यालय रांची में होगा. स्वशासन परिषद अपने सर्वे और जानकारी के आधार पर सुझाव देगी. देश के कई राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था को लेकर सफल प्रयोग हुए हैं. झारखंड में पंचायतों की बेहतरी के लिए उन्हीं प्रयोगों के अनुरूप कार्य किये जा रहे हैं. स्वशासन परिषद के गठन के बाद ग्रामीण खुद अपनी और अपने गांव की जरूरतों के मुताबिक योजना बना कर देंगे और उसके अनुसार विकास कार्य होगा, साथ ही ग्राम पंचायतों में ग्रामीणों की सहभागिता बढ़ेगी. सभी पंचायतों में विकास होगा. पंचायतों के बीच प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी और अधिक-से-अधिक विकास के कार्य होंगे, जिससे पंचायतों के समुचित विकास की परिकल्पना साकार हो पायेगी.
 
स्वशासन परिषद में होंगे 22 सदस्य 
पंचायत राज स्वशासन परिषद में कुल 22 सदस्य होंगे. इसके तहत सूबे के ग्रामीण विकास मंत्री की अध्यक्षता में परिषद की एक शासी निकाय होगी. जनजातीय कल्याण, राजस्व एवं भूमि सुधार,  शिक्षा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, महिला एवं बाल विकास , पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग के प्रभारी मंत्री परिषद के सदस्य होंगे. मुख्य सचिव, विकास आयुक्त सहित योजना सह वित्त विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, समाज कल्याण एवं महिला बाल विकास विभाग, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, वन एवं पर्यावरण विभाग, कल्याण विभाग, उद्योग, खान एवं भूतत्व विभाग के अपर मुख्य सचिव/प्रधान सचिव/सचिव इसके पदने सदस्य होंगे. पंचायत राज स्वशासन परिषद के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी भी इसके सदस्य होंगे. वहीं ग्रामीण विकास विभाग (पंचायती राज) के सचिव परिषद के सदस्य सचिव होंगे. इसके अलावा चार गैर सरकारी सदस्य मनोनीत विशेषज्ञ के रूप में रहेंगे. वहीं हर प्रमंडल से एक जिला परिषद अध्यक्ष, एक प्रखंड प्रमुख और दो ग्राम पंचायतों के मुखिया भी शासी निकाय में रहेंगे. इन्हें चयनित करने में राज्य/राष्ट्र स्तर पर पुरस्कृत होनेवाले पदधारकों को प्राथमिकता दी जायेगी. नामित सदस्यों में कम-से-कम एक अनुसूचित जनजाति एवं एक महिला का होना अनिवार्य है. इनका कार्यकाल एक वर्ष का होगा.

छह माह में एक बार शासी निकाय की बैठक 
शासी निकाय के लिए छह माह में कम-से-कम एक बार बैठक आयोजित करना अनिवार्य होगा. बैठक आयोजित करने का दायित्व सदस्य सचिव यानी ग्रामीण विकास विभाग (पंचायती राज) के सचिव पर होगा.

मुख्य सचिव कार्यकारिणी समिति की अध्यक्ष
परिषद की कार्यकारिणी समिति में मुख्य सचिव अध्यक्ष होंगी और विकास आयुक्त सह अध्यक्ष होंगे. इसके सदस्यों में योजना सह वित्त विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग, स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग, महिला, बाल विकास एवं समाज कल्याण विभाग, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, जल संसाधन विभाग, खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग, पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग, वन एवं पर्यावरण विभाग, कल्याण विभाग, उद्योग, खान एवं भूतत्व विभाग, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के अपर सचिव/प्रधान सचिव/ सचिव मुख्य रूप से होंगे. इसके अलावा ग्रामीण विकास विभाग (पंचायती राज) के सचिव सदस्य सचिव होंगे. पंचायती राज निदेशालय, झारखंड के निदेशक और पंचायत राज स्वशासन परिषद के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी परिषद की कार्यकारिणी समिति के सदस्य होंगे.

तीन माह में होगी कार्यकारिणी की बैठक 
पंचायत राज स्वशासन परिषद की कार्यकारिणी की बैठक तीन माह में कम-से-कम एक बार अवश्य आयोजित की जायेगी. बैठक आयोजित करने की जिम्मेदारी सदस्य सचिव यानी ग्रामीण विकास विभाग (पंचायती राज) के सचिव की होगी. उनकी अनुपस्थिति में निदेशक, पंचायत राज निदेशालय, झारखंड अथवा परिषद के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी की होगी. 

क्या है स्थानीय स्वशासन
स्वशासन यानी लोगों का अपना शासन. इसमें व्यक्ति एक समूह के रूप में अपने सामूहिक हित के मुद्दों पर विचार करे, निर्णय ले और उसे लागू करते हुए धरातल पर उतारे. इसके तहत गांव के लोगों की गांव में अपनी शासन-व्यवस्था हो तथा गांव स्तर पर ही खुद की न्याय प्रक्रिया हो. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि पंचायतें पूरी तरह से स्वतंत्र हों. पंचायतों को संविधान और राज्य सरकार द्वारा बनाये गये कानून के मुताबिक उसी तरह काम करना है, जिस तरह से राज्य सरकार को केंद्र सरकार द्वारा बनाये गये नियम-कानून के हिसाब से काम करना होता है. इसके तहत ऐसा शासन हो, जहां लोग स्थानीय मुद्दों व गतिविधियों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा सकें. स्थानीय स्वशासन में पंचायतों को ग्रामसभा सदस्यों के साथ मिल कर गांव के विकास से जुड़े मुद्दों पर नियम और उप नियम बनाने, उनको लागू कराने और उसमें आवश्यकतानुसार बदलाव करना होता है.
 
स्वशासन कैसे होगा मजबूत 
स्थानीय स्वशासन की मजबूती के लिए सबसे पहले पंचायत में सुयोग्य प्रतिनिधियों का चयन होना आवश्यक है. पंचायत का नेतृत्व ऐसा व्यक्ति करे, जिसकी छवि साफ-सुथरी हो और नि:स्वार्थ भाव से पंचायतों के विकास में अपनी पूरी भागीदारी निभाये. ग्रामसभा का हर सदस्य जागरूक रह कर पंचायत के कार्यों में भागीदारी निभाये. स्थानीय स्वशासन तभी मजबूत होगा, जब ग्रामीण अपनी आवश्यकता व प्राथमिकता के अनुसार योजनाओं व कार्यक्रमों का नियोजन करेंगे तथा उनका खुद ही क्रियान्वयन करेंगे. ऊपर से थोपी गयी परियोजनाएं कभी भी ग्रामीणों में योजना के प्रति अपनत्व की भावना नहीं ला सकती हैं. इसलिए सूक्ष्म नियोजन के आधार पर ही योजनाएं बनानी होंगी, तभी वास्तविक रूप से स्थानीय स्वशासन मजबूत होगा. युवाओं की प्रतिभा और पलायन को रोकने के उद्देश्य से कौशल विकास का प्रशिक्षण, स्वरोजगार, उनकी शक्ति व ऊर्जा का रचनात्मक कार्यों में सदुपयोग किया जाये, तो स्थानीय स्तर पर पंचायतों की मजबूती में वह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
 
कार्य और गठन का उद्देश्य 
  • स्वशासन परिषद पंचायतों को मिली शक्तियों का विकेंद्रीकरण करेगी.  पंचायतों के कार्य और अधिकारों के बारे में जनप्रतिनिधियों को जागरूक करने और पंचायतों को मिली राशि व सामने आ रही परेशानियों का आंकलन कर सही तरीके से कैसे कार्यों और अधिकारों का बंटवारा हो, इस पर अपना विचार देगी
  • अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था (पेसा) के प्रावधानों का क्रियान्वयन
  • पंचायतों को आर्थिक तौर पर मजबूत करने के लिए विभिन्न उपायों, विशेषकर अाय के स्रोतों को विकसित करना 
  • पंचायत स्वयंसेवकों का चयन, प्रशिक्षण, कार्यक्षेत्र और उनके अधिकारों को तय करना, नियंत्रित करना तथा उनका निष्कासन जैसे कार्य शामिल हैं. स्वयंसेवकों के कार्यों का मूल्यांकन करना और उन्हें बेहतर तरीके से कार्य करने के लिए मार्गदर्शन दिया जायेगा
  • गांवों में चल रहे महिला समूहों और पंचायती राज व्यवस्था के बीच आपसी संबंध और समन्वय स्थापित करना. स्वयं सहायता समूहों को पंचायत के कार्यों से जोड़ना, ताकि समूहों की क्षमता का इस्तेमाल पंचायत की बेहतरी के लिए किया जा सके
  • प्रशिक्षण के जरिये पंचायत जनप्रतिनिधियों की कार्य-क्षमता बढ़ाना. पंचायत जनप्रतिनिधियों को उनके हक और अधिकारों के बारे में जानकारी देकर जागरूक किया जायेगा, क्योंकि अक्सर यह शिकायत मिलती है कि वार्ड सदस्यों को अपने अधिकार और कार्यक्षेत्र की भी जानकारी नहीं है, जिसके कारण वो बेहतर तरीके से कार्य नहीं कर पाते हैं
  • सामाजिक सुरक्षा के तहत पंचायतों को जिम्मेदारी दी जायेगी, जिसके तहत नये-नये उपायों पर विचार किया जायेगा, ताकि पंचायती राज व्यवस्था के प्रति आमजनों का विश्वास बरकरार रहे और अधिक-से-अधिक ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके
  • पंचायतों के क्रियाकलाप, कार्य करने के तरीके एवं पंचायतों को सौंपे गये कार्यों का मूल्यांकन तथा सर्वेक्षण करना परिषद का कार्य होगा. परिषद अध्ययन और शोध के जरिये पंचायतों के ऑडिट रिपोर्ट पर विचार करेगी. उसके आधार पर पंचायतों का मार्गदर्शन किया जायेगा, ताकि पंचायती राज व्यवस्था को और सुदृढ़ एवं सशक्त बनाया जा सके
  • विभिन्न कार्यक्रमों व अभियानों के सफल संचालन का जिम्मा पंचायतों को मिलेगा. जनता की सेवाएं, जनता तक कैसे पहुंचे, इस संदर्भ में भी पंचायतों को मार्गदर्शन मिलेगा
  • पंचायती राज संस्थाओं को और मजबूत बनाते  हुए उसमें पारदर्शिता लाने, प्रशासनिक तंत्र को मजबूत करने और निर्णय को लेकर  विचार करने पर जोर दिया जायेगा
  • देश के अन्य राज्यों में हो रहे विकासोन्मुखी कार्यक्रमों की जानकारी पंचायतों को देने की जिम्मेवारी परिषद की होगी
  • ग्राम पंचायतों के सशक्तीकरण के लिए अलग-अलग स्वयंसेवी वर्गों को प्रोत्साहित करना, स्वयंसेवकों के अभिनव प्रयोग का अधिक-से-अधिक लाभ लेना आदि कार्य परिषद के तहत होंगे
  • पंचायती राज व्यवस्था को किस तरीके से पोषण मिले, इसे सुनिश्चित करने के लिए जरूरी इको-सिस्टम तैयार करना और इसके लिये विभिन्न विकल्पों पर विचार करना
  • विभिन्न प्रकार के प्रतिवेदन जैसे- ज्ञापन/याचिका/जिला योजना समिति की कार्यवाही, सिविल सोसाइटी की संस्थाओं के सुझाव, शैक्षणिक संस्थाओं के शोध प्रबंध आदि पर पंचायतों के विकास के लिए अपने विचार रख सकती है
  • पंचायती राज व्यवस्था के तहत सर्वांगीण विकास को लेकर ग्रामीण इलाकों का विकास कैसे हो, इस विषय पर परिचर्चा का आयोजन करना और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करना.