aamukh katha

  • Aug 21 2017 2:26PM

इन न्यायिक योजनाओं का उठाइए लाभ

इन न्यायिक योजनाओं का उठाइए लाभ
देश का हर नागरिक कानून की नजर में समान है. हर नागरिक को कानूनी अधिकार का लाभ लेने का हक है, लेकिन अशिक्षा, जागरूकता का अभाव एवं गरीबी के कारण बड़ी आबादी कानून का लाभ लेने से वंचित रह जाती थी. अब हालात बदल रहे हैं. झालसा यानी झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के गठन के बाद सुधार दिखने लगा है. लोग जागरूक हुए हैं और अपनी समस्याओं को लेकर सामने भी आने लगे हैं. न्याय प्रणाली और कोर्ट में उनका विश्वास बढ़ा है. झालसा द्वारा किये जा रहे नये-नये प्रयोग के कारण तसवीर बदली है. 
 
अब दूर-दराज के ग्रामीण इलाके के लोग भी न्याय के लिए सामने आने लगे हैं, जो कभी न्याय के लिए कोर्ट या पुलिस के पास जाने से भी डरते थे. बच्चे देश का भविष्य होते हैं. अनमोल संपत्ति होते हैं. ऐसे में समाज के साथ-साथ सरकार का भी यह फर्ज है कि उन बच्चों के लिए ऐसा माहौल तैयार किया जाये, जहां बच्चे अपनी क्षमता का बेहतर विकास कर सकें. बच्चे बड़े होकर देश का नागरिक बनेंगे. अपने कर्तव्यों और अधिकारों को जाननेवाला व्यक्ति ही एक बेहतर नागरिक बन सकता है. 
 
पारा लीगल वोलेंटियर्स
 
पारा लीगल वोलेंटियर्स (पीएलवी) झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार का एक अनूठा और सफल प्रयोग है. इस प्रयोग से काफी सफलता मिली है. ग्रामीण इलाकों में इसका असर भी दिख रहा है. पारा लीगल वोलेंटियर्स के माध्यम से अब राज्य और जिले की विधिक संस्थाएं ताल्लुका यानी प्रखंड से लेकर गांवों तक पहुंच रही हैं. पारा लीगल वोलेंटियर्स अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रहे हैं. दरअसल सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में विधिक सेवाएं देना और उन सेवाओं की जानकारी उन तक पहुंचाने में कई समस्याएं आ रही थीं
 
खास कर भाषा को लेकर समस्याएं आ रही थीं. झालसा ने इसका हल निकाला और उन इलाके के युवाओं को ही पारा लीगल वोलेंटियर्स के तौर पर चुना, ताकि भाषाई परेशानी दूर हो सके और आम लोगों को उन्हीं की भाषा में कानूनी रूप से जागरूक किया जा सके. प्रशिक्षण मिलने के बाद अब पारा लीगल वोलेंटियर्स गांवों में जाते हैं और लोगों को जागरूक करते हैं. स्थानीय होने की वजह से वे उनकी भावनाओं को बेहतर तरीके से समझ कर उसका समाधान बताते हैं. पीएलवी उनकी परेशानियों से डीएलएसए या झालसा को अवगत कराते हैं. 
 
लीगल लिट्रेसी क्लब से बच्चे हो रहे जागरूक
 
बच्चों को कानून की जानकारी देने के लिए राज्य के पांच सौ स्कूलों में लीगल लिट्रेसी क्लब की स्थापना की गयी है. इन क्लबों के जरिये बच्चों को कानून और संवैधानिक अधिकारों को लेकर जागरूक किया जा रहा है. 
 
झालसा का उद्देश्य इन क्लबों के माध्यम से राज्य भर के स्कूली बच्चों और झालसा के बीच एक मजबूत संवाद एवं सामंजस्य स्थापित करना है. झारखंड के ग्रामीण इलाकों में अंधविश्वास के कारण कई घटनाएं घटित होती है. डायन हत्या इनमें से एक है. इसके तहत महिलाओं को काफी प्रताड़ित किया जाता है. कई महिलाओं की हत्या भी कर दी जाती है. 
 
 लीगल लिट्रेसी क्लब के जरिये बच्चों को कानून की जानकारी दी जा रही है, ताकि वो इसे याद रखें और अपने माता-पिता को भी कानून की जानकारी देकर जागरूक कर सकें. लीगल लिट्रेसी क्लब के तहत झारखंड के हर हाइस्कूल और कॉलेज में 10-25 छात्रों का चयन सदस्य के रूप में किया जाता है.
 
ये सदस्य प्रधानाचार्य द्वारा चुने गये टीचर इन चार्ज के साथ कार्य करते हैं. लीगल लिट्रेसी क्लब द्वारा स्कूल में ही लीगल लिट्रेसी क्लास का आयोजन किया जाता है. इसमें न्यायिक अधिकारी, वकील, मध्यस्थ, पुलिस अधिकारी और अन्य अधिकारी शामिल होते हैं. इसमें बच्चों को अलग-अलग कानून, कल्याणकारी योजनाएं और उनके अधिकारों के बारे में जानकारी दी जाती है. महिलाओं के लिए योजनाएं, बच्चों के कल्याण के लिए योजनाएं, श्रमिक कानून और श्रमिकों के अधिकार, गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले लोगों को मिलनेवाली सुविधाएं, मानसिक रूप से विक्षिप्त या दिव्यांगजनों को मिलनेवाली सुविधाओं के बारे में छात्रों को जागरूक किया जाता है. 
 
 पंपलेट और बुकलेट के माध्यम से बच्चों को पढ़ने के लिए सामग्री भी उपलब्ध करायी जाती है. इस क्लब की स्थापना का लाभ दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में दिख रहा है. बच्चे कानूनी रूप से जागरूक होकर अपने माता-पिता के साथ-साथ पड़ोसियों को भी इसकी जानकारी दे रहे हैं. बच्चों के जरिये ग्रामीणों को भी इसका लाभ मिल रहा है. झालसा द्वारा लीगल लिट्रेसी क्लब के जरिये विधिक जागरूकता फैलाने के 
उद्देश्य से कई तरह के आयोजन कराये जाते हैं. 
 
विक्टिम कंपन्सेशन
 
अपराध के कारण हुई क्षति या हानि से पीड़ित व्यक्ति या उसके आश्रित को अपेक्षित पुनर्वास प्रतिकर यानी कंपन्सेशन को लेकर निधि (फंड) उपलब्ध कराने के लिए यह स्कीम बहुत ही सहायक है. 
 
इस स्कीम के तहत किसी अपराध से यदि किसी व्यक्ति को हानि होती है और उसे तुरंत पुनर्वास की जरूरत है, तो उसे आर्थिक मदद की जाती है, क्योंकि अक्सर ऐसा देखा जाता है कि हत्या, शोषण, तेजाब हमला एवं दुष्कर्म जैसे मामलों में कोर्ट से फैसला आने में वक्त लगता है, जबकि इन मामलों में पीड़ित या उसके परिवार को त्वरित राहत की आवश्यकता होती है. उदाहरण के तौर पर हत्या की बात करें, तो अगर किसी बच्चे के माता-पिता की हत्या हो जाती है, तो बच्चे अनाथ हो जाते हैं और मामला कोर्ट में चला जाता है. लेकिन, उस अनाथ बच्चों को तुरंत देखभाल, खाना-कपड़ा एवं अच्छी शिक्षा की आवश्यकता होती है. 
इसके लिए उन्हें तुरंत पैसे चाहिए. ऐसे मामले जब कोर्ट में जाते हैं, तो फैसला आने में वक्त लगता है. ऐसे में इतने वर्षों तक बच्चों का बेहतर पालन-पोषण कैसे होगा. इन समस्याओं को देखते हुए पीड़ित प्रतिकर की शुरुआत की गयी. 
 
 इसके तहत पीड़ित बच्चों को तुरंत आर्थिक सहायता मिल जाती है. इससे परिवार बिखरने से बच जाता है और बच्चों की शिक्षा एवं बेहतर पालन-पोषण के लिए पैसे भी मिल जाते हैं. अगर तेजाब हमले या दुष्कर्म की घटनाओं की बात करें, तो दोनों ही मामलों में पीड़ित असहनीय दर्द से गुजरता है. पीड़ित को इलाज के लिए पैसों की आवश्यकता होती है. 
 
ऐसे में दोषी द्वारा जो जुर्माना दिया जाता है, वो भी नाकाफी होता है और समय पर नहीं मिलता है. इसके कारण पीड़ित और उसके परिवार को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (झालसा) की ओर से पीड़ितों या पीड़ित परिवारों को तुरंत मुआवजा की राशि मुहैया करायी जाती है. यह राशि राज्य सरकार की ओर से दी जाती है.
 
केस स्टडी
 
बच्चों को मिला मुआवजा
 
नक्सलवाद से ग्रस्त गुमला जिले में नक्सलियों ने एक दंपती की हत्या कर दी थी. इसके कारण तीन बच्चे अनाथ हो गये थे. तीनों अनाथ बच्चों को बेहतर परवरिश एवं अच्छी शिक्षा देना परिवारवालों के लिए आसान नहीं था, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी. 
 
पारा लीगल वोलेंटियर भिखारी उरांव ने इस मामले को गंभीरता से लिया और सभी कागजी कार्रवाई पूरी कर बच्चों के पुनर्वास के लिए इस मामले को जिला विधिक सेवा प्राधिकार के संज्ञान में लाया. इसके बाद जिला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव को उन बच्चों का कानूनी अभिभावक बना दिया गया. 23 जनवरी, 2016 को आयोजित कार्यक्रम में उन बच्चों को दो लाख रुपये दिये गये. गुमला के आवासीय स्कूल में तीनों बच्चों का दाखिला भी कराया गया. 
 
झारखंड में हैं 22 मध्यस्थता केंद्र
 
झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार द्वारा नालसा के सहयोग से झारखंड में कुल 22 मध्यस्थता केंद्र खोले गये हैं. इनमें से एक झारखंड उच्च न्यायालय मध्यस्थता केंद्र है, जो वर्तमान में न्याय सदन परिसर में संचालित हो रहा है. रांची सिविल कोर्ट में भी मध्यस्थता केंद्र है.
 
जमशेदपुर, हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, देवघर, चाईबासा, गिरिडीह, दुमका, पलामू, लातेहार, गुमला, लोहरदगा, पाकुड़, साहेबगंज, चतरा, कोडरमा, गोड्डा, जामताड़ा, सरायकेला-खरसावां और सिमडेगा में मध्यस्थता केंद्र हैं. मध्यस्थता केंद्र की सफलता और इसके प्रति लोगों का विश्वास लगातार बढ़ रहा है. लोग एक बेहतर विकल्प के तौर पर इसे अपना रहे हैं. अब तो समन और नोटिस के जरिये भी लोगों को विकल्प के तौर पर मध्यस्थता को अपनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है. वो दिन दूर नहीं, जब मध्यस्थता बिना खर्च के किसी विवाद के निपटाने और उसे जड़ से खत्म करने का एक बेहतर जरिया बन जायेगा. 
 
पीड़ित परिवारों को मिला कंपन्सेशन
 
झारखंड में नक्सल घटनाओं, सांप्रदायिक और अन्य दूसरे कारणों से हुई हिंसा में मारे गये लोगों के परिजनों को पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत राशि दी गयी है. 
 
माह पीड़ित परिवार सहायता राशि
 
जनवरी 2016  141 32,57,410  
फरवरी 2016 88 62, 05,315 
मार्च 2017 326 2.5 करोड़
पीड़ितों को दी जानेवाली सहायता राशि 
हानि/क्षतिपूिर्त न्यूनतम कंपन्सेशन
तेजाब से हमला 03 लाख 
दुष्कर्म 03 लाख 
नाबालिग का शारीरिक शोषण 02 लाख 
मानव तस्करी से पीड़ित का पुनर्वास 01 लाख 
यौन प्रताड़ना (दुष्कर्म नहीं) 50 हजार 
मृत्यु 02 लाख 
स्थायी विकलांगता (80% या अधिक) 02 लाख
आंशिक विकलांगता (40 से 80 %) 01 लाख
शरीर का 25% से अधिक जलना (तेजाब हमले को छोड़कर) 02 लाख
भ्रूण हानि 50 हजार
 
प्रजनन क्षमता की हानि 1.5 लाख 
 
स्थायी विकलांगता के साथ मृत्यु (80% या अधिक) 02 लाख 
शरीर के किसी भाग या अंग की हानि, जिसके चलते 40% से कम विकलांगता 50 हजार 
बाल पीड़ित की साधारण हानि या क्षति 10 हजार
कोई अन्य पीड़ित या पुनर्वास 50 हजार
(यदि पीड़ित व्यक्ति की उम्र 14 वर्ष से कम है, तो कंपन्सेशन 
की रकम में 50 फीसदी की बढ़ोतरी होगी).