aamukh katha

  • Jul 4 2017 1:33PM

हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी झोली खाली

हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी झोली खाली
पवन कुमार
किसान की बात आते ही जेहन में खेती-किसानी की बातें सामने आ जाती है. हाड़तोड़ मेहनत, खेतों में फसल उपजाने का जुनून और अच्छे मुनाफे की उम्मीद, ये हर किसान को होती है. लेकिन, मुनाफा तो छोड़िये, कभी-कभी तो पूंजी निकालने को भी परेशान रहनेवाले किसान वर्तमान में कई समस्याओं से जूझने लगे हैं. इसका परिणाम यह होता है कि किसान उपजाऊ फसल की चिंता छोड़ सरकारी योजनाओं की ओर अधिक टकटकी लगाये रहते हैं और नतीजा किसानों को सिफर हाथ लगता है. सरकार किसानों के कल्याण के लिए कई योजनाओं की घोषणा करती है, लेकिन हालत यह है कि इन योजनाओं का सही रूप में लाभ किसानों को नहीं मिल पाता है. कई योजनाओं की जानकारी तो किसानों तक पंहुच भी नहीं पाती है, तो भला किसान उसका लाभ कैसे उठा पायेंगे. किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है, तो समझा जा सकता है फसल बीमा का लाभ कितने किसानों काे मिल पाता होगा. आधुनिक खेती, हर खेत को पानी और हर किसान को उन्नत बीज दूर की कौड़ी लगती है. राजधानी रांची के आसपास के कई किसानों से उसकी समस्या व समाधान के उपाय जानने की कोशिश की. 
 
पूजा तिर्की ने कहा, एक हाथ में किताब, दूसरे में कुदाल
नगड़ी प्रखंड के कोलांबी गांव की युवा महिला किसान है पूजा तिर्की. पूजा की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. परिवार में पिता हैं. मां हैं और एक बड़ी भी बहन है. बड़ी बहन की शादी हो चुकी है. साल 2011 से पिता बीमार हैं. मां जमशेदपुर में घरेलू नौकरानी का काम करती है. इन हालातों में पूजा तिर्की अपने दम पर खेती-बारी करती है और नौवीं की पढ़ाई भी कर रही है. हां, बड़ी बहन और जीजा से थोड़ा सहयोग जरूर मिल जाता है. पूजा बताती है कि पहले उसके खेत बंधक में थे. इस साल ही खेती को बंधक से छुड़ाया  गया है. इसके बाद से वो खेती कर रही है. फिलहाल पूजा अपने खेतों में धान लगा रही है. पूजा का दर्द है कि वो परिवार में अकेली है, जो खेतों में काम करती है, लेकिन समय पर मजदूर नहीं मिल पाते हैं. खेत के पास एक छोटा-सा कुआं है, लेकिन वो नाकाफी है. सरकार की ओर से कोई खास मदद नहीं मिली पाती है. केसीसी लेने से डर लगता है. गरीब होने के बावजूद आज तक बीपीएल कार्ड नहीं बन पाया है. इंदिरा आवास का लाभ भी उसके परिवार को नहीं मिल पाया है. लैम्पस की कोई जानकारी नहीं है. पूजा कहती है कि किसानों के लिए सरकार ने कई योजनाएं चला रखी है, लेकिन आज तक किसी भी योजना का लाभ उसे नहीं मिल पाया है, तो कैसे कहें कि सरकार की योजनाएं सही रूप में धरातल पर उतर रही है. योजनाओं पर बिचौलिये ही हावी हैं, जिसके कारण किसानों को कोई लाभ नहीं मिल पाता है. पूजा बताती है कि खेती के लिए पूंजी जमा करने के लिए वो दूसरों के खेतों में भी काम करती है. पूजा कहती है कि खेती-बारी के साथ-साथ पढ़ाई भी जारी रखनी है, लेकिन सुविधा नहीं मिलने से दोनों ओर से काफी परेशानी उठानी पड़ती है. कहती हैं कि हर कोई अच्छे फसल के पैदावार की चर्चा करते हैं, लेकिन कोई भी इन फसलों को पैदा कराने में लगे किसानों की सुध लेने नहीं आता है. कभी सरकार भी देखें कि कैसे किसानों का जीवन गुजर-बसर हो रहा है, तभी सरकार को सही दर्द का एहसास होगा और वो किसानों के लिए कुछ कर पायेंगे. सिर्फ घोषणाओं से कुछ नहीं होनेवाला है.
 
गांव कोलांबी
पंचायत चिपरा
प्रखंड नगड़ी
सुनीता तिर्की ने कहा, सलों का नहीं मिलता सही दाम
महिला संगठन से जुड़ीं सुनीता तिर्की महिला किसान भी हैं. पति ठेकेदारी का काम करते हैं. सुनीता के पास खेत है, लेकिन खेती-बारी की जानकारी नहीं होने के कारण खेती नहीं कर पा रही थी. 10वीं तक पढ़ी सुनीता खुद कुछ करना चाहती थी, लेकिन उचित मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण कुछ कर नहीं पा रही थी. इसी बीच स्वयं सहायता समूह से जुड़ी और सक्रिय सदस्य के रूप में अपने गांव में काम करने लगी. इसी दौरान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान केंद्र प्लांडू के अधिकारियों ने सुनीता के पति को खेती-बारी के गुर बताये. उनके निर्देशानुसार सुनीता ने अपने खेत में टमाटर लगायी. फसल भी अच्छी हुई. करीब एक क्विंटल टमाटर की उपज हुई, लेकिन फसल का उचित दाम नहीं मिल पाया. खुद बाजारों में जाकर टमाटर को बेचती थी. गांव के आसपास तीन स्थानों पर बाजार लगता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र का बाजार होने के कारण उतना मुनाफा नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था. सुनीता इससे निराश तो हुई, लेकिन हौसला नहीं हारी. इस बार सुनीता ने करीब एक एकड़ दस डिसमिल के अपने खेत में भिंडी, खीरा, मूली और बीन लगायी है. सुनीता ऋण लेकर अपने खेतों में सब्जियां लगा रही है. सबसे राहतवाली बात यह है कि सुनीता ने टपक सिंचाई का उपयोग अपने खेतों में की गयी है. सुनीता ने खेत के पास ही कुआं बनवा रखी है. सुनीता कहती हैं कि कृषि ग्राम विकास केंद्र की ओर से खेतों में सिंचाई करने के लिए ड्रिप एरिगेशन की व्यवस्था की गयी है, ताकि सिंचाई के बिना फसलों को नुकसान नहीं हो. फसलों में कीड़ा लगने से फसलों को काफी नुकसान होता है. सुनीता कहती हैं कि फसलों में कीड़ा ना लगे, इसके लिए किसानों को जानकारी रखना बहुत जरूरी है. इस दिशा में संबंधित विभाग के अधिकारियों को भी विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि उनकी मेहनत व्यर्थ ना जाये.
 
गांव : पीरीडीह
पंचायत : रामपुर
प्रखंड : नामकुम
 
संगीता ने कहा, पूंजी के अभाव में नहीं होती है खेती 
बुढ़मू प्रखंड के कुलवे गांव की महिला किसान है संगीता देवी. खेती-किसानी से जुड़ी संगीता देवी के पति मजदूरी करते हैं. संगीता को पति और परिवार का पूरा सहयोग मिलता है. संगीता बताती है कि इनके पास पूंजी का अभाव है. सिंचाई की भी कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण इनकी उपजाऊ जमीन परती रह जाती है. परिवार में कुल छह सदस्य हैं और खेती-बारी पर ही पूरा परिवार निर्भर है. इस बार गाजर के फसल में कुछ ज्यादा ही नुकसान संगीता को उठाना पड़ा है. संगीता की समस्या भी अन्य किसानों की तरह ही है. खेती-किसानी के लिए सरकारी ऋण लेने में खासी परेशानी उठानी पड़ती है. बिचौलिए पैसे की मांग करते हैं, जिससे क्षुब्ध होकर संगीता अब लोन लेना ही नहीं चाहती. इंदिरा आवास आज तक उसे नहीं मिला और ना ही उसके नाम पर कोई राशन कार्ड ही बना है. संगीता लैम्पस के बारे में जानती ही नहीं है. आज तक खाद-बीज का भी लाभ नहीं मिला है. संगीता देवी बहुत कुछ नहीं बोलते हुए भी ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं और उनके कारणों को बता देती है.
 
गांव कुलवे
पंचायत बाड़े
प्रखंड बुढ़मू
हरीश बोले, बिचौलिए हावी िकसानों को कैसे मिले लाभ
बुढ़मू प्रखंड के सिदरौल गांव के किसान हैं हरीश चंद्र पाहन, जो बाड़े पंचायत के मुिखया भी हैं. उन्होंने बताया कि खेती-बारी करना आज के दौर में मुश्किल भरा पेशा हो गया है, क्योंकि कृषि धीरे-धीरे आधुनिक हो रही है. उस हिसाब से किसान खुद को आधुनिक नहीं कर पा रहे हैं. हाइब्रीड बीज बाजार में आ गये हैं, लेकिन उस बीज को सही तरीके से लगाने के तरीके किसान नहीं जान पाये हैं. सरकार की ओर से किसानों को जागरूक करने की बात तो होती है, लेकिन सही तरीके से धरातल पर उतर नहीं पाती है और इन सबके बीच किसान पिसता है. सिंचाई की कोई व्यवस्था इनके पास मौजूद नहीं है. एक चेकडैम बना हुआ है, लेकिन वो भी हाथी का दांत ही साबित हो रहा है. समय पर खाद-बीज भी सरकारी दर पर नहीं मिला पाता है. इन समस्याओं के बावजूद हरीश चंद्र खेती को ही प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि इससे ही उसका पूरा परिवार चलता है.
गांव िसदरौल
पंचायत बाड़े
प्रखंड बुढ़मू
सुखदेव बोले, खेती-किसानी से घर चलाना मुश्किल
ब्राम्बे पंचायत के चुंद गांव के ही एक किसान हैं सुखदेव उरांव. सालों भर कड़ी मेहनत करने के बाद भी आर्थिक संकट से जूझने के कारण किसान सुखदेव उरांव का मन अब खेती-बारी से उचटने लगा है. सरकार की ओर से चलायी जा रही योजनाओं के लाभ से सुखदेव कोसों दूर हैं. किसान क्रेडिट कार्ड व फसल बीमा का लाभ नहीं मिला है. सिंचाई के लिए दूसरों के कुएं का उपयोग करते हैं. उनके जमीन के आसपास तालाब या नहर नहीं है, इसके कारण पटवन में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. सरकार से सवाल करते हुए सुखदेव उरांव ने कहा कि सरकार किसानों के भलाई के लिए काफी बात करती है, लेकिन किसानों का भला नहीं हो पाता है. सुखदेव के परिवार में सात सदस्य हैं, जिनकी आजीविका सिर्फ खेती से चलती है. एेसे में बढ़ती महंगाई के बीच घर चलाना उसके लिए काफी मुश्किल हो रहा है.
 
गांव चुंद
पंचायत ब्राम्बे
प्रखंड मांडर
सीमा बोलीं, आधुनिक खेती से हो रहा फायदा
रांची जिले के नामकुम प्रखंड का लोधमा गांव. इस गांव की रहनेवाली सीमा उरांव ने महिला किसान के तौर पर अपनी अलग पहचान बनायी है. इसे खेती से फायदा भी हो रहा है. पूरे साल इनके घर के सामने खेत में हरी-भरी सब्जियां लहलहाती रहती है और इसे बेच कर वो अपनी आजीविका चला रही है. इन सबके बावजूद सीमा के मन में कुछ शिकायतें भी है. कहती है कि अगर सिंचाई की बेहतर व्यवस्था होती, तो वो और बेहतर कर सकती थी. डोभा निर्माण के बारे में पूछने पर सीमा कहती है कि डोभा बन जाने के बाद पैसे के भुगतान में काफी देरी होती है. साथ ही पूरा पैसा भी नहीं मिलता है, जिसके कारण वो डोभा निर्माण नहीं करा पा रही है. सरकारी उदासीनता और अनदेखी का आलम यह है कि सीमा उरांव एक जागरूक महिला होने के बावजूद आज तक उनके पास खुद का राशन कार्ड तक नहीं है. लैंम्पस से धान और गेहूं तो मिला, लेकिन वो समय पर नहीं. कहती हैं कि कई बार दलहन और तिलहन के कालाबाजारी की खबरे भी इलाके में चर्चा का विषय बनती है. इलाके में कृषक मित्र की भूमिका भी सराहनीय नहीं है. लोदमा गांव से बाजार की दूरी पांच किलोमीटर है, जिससे परेशानी भी होती है. इन परेशानियों के बावजूद सीमा उरांव खेती-किसानी से जुड़ते हुए और मेहनत करते हुए बखूबी आगे बढ़ रही है.
 
गांव लोधमा
पंचायत चंदाघासी
प्रखंड नामकुम