aamukh katha

  • Jun 21 2017 1:05PM

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहली सीढ़ी है प्राथमिक विद्यालय

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहली सीढ़ी है प्राथमिक विद्यालय
शिक्षा व्यवस्था की पहली सीढ़ी है प्राथमिक विद्यालय. हालांकि, पूर्व प्राथमिक विद्यालय की भी चर्चा जोरों पर है. जिस तरह निजी स्कूलों में छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल के प्रति आकर्षित करने की विभिन्न योजनाएं हैं, उसी तरह सरकारी स्कूलों में भी पूर्व प्राथमिक विद्यालय में बच्चों को स्कूलों से जोड़ने की योजना पर काम हो रहा है. शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा पर विशेष जोर देने की जरूरत है. पंचायत जनप्रतिनिधियों को अपने-अपने पंचायत क्षेत्रों में बेहतर शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेवारी लेनी होगी, तभी शिक्षा व्यवस्था का ग्राफ उपर उठ पायेगा. पंचायत जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदारी तय करनी होगी कि उनके पंचायत क्षेत्र में ना तो ड्राॅप आउट बच्चे रहें और ना ही बच्चे स्कूल के वनिस्पत घर में रहे. इन बच्चों को घर से स्कूल तक पहुंचाने की जिम्मेवारी पंचायत जनप्रतिनिधियों को ईमानदारीपूर्वक निभानी होगी, तभी शिक्षा व्यवस्था की स्थिति मजबूत हो पायेगी. शिक्षा व्यवस्था खासकर प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारने में सरकार के साथ-साथ पंचायत जनप्रतिनिधियों की महती भूमिका होनी चाहिए. स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना के साथ-साथ पोशाक, किताब, सुचारू पठन-पाठन, नियमित शिक्षकों की उपस्थिति, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर देना जरूरी है. पंचायतों में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर पढ़िए समीर रंजन का यह आलेख. 
 
राज्य में प्राथमिक शिक्षा का हाल किसी से छिपा नहीं है. कहीं छोटे-छोटे बच्चे स्कूलों में आते ही नहीं हैं, तो कहीं प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों का ही टोटा रहता है. घर से स्कूल तक लाने में पंचायतों की अहम भूमिका होनी चाहिए. पंचायत जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वो अपने-अपने पंचायतों में इसका सर्वे करें और स्थिति का आकलन करें. सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था से मुकाबला करना है, तो प्राथमिक और पूर्व प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था पर बहुत अधिक काम करना होगा. हालांकि राज्य में अभी भी सरकार पूर्व प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था पर तवज्जो नहीं देती है. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की समेकित बाल विकास सेवाएं (आइसीडीएस) कार्यक्रम को प्रारंभिक बाल शिक्षा देने के लिए निर्दिष्ट किया गया है. 

आइसीडीएस के अंतर्गत आंगनबाड़ी केंद्रों में पूर्व स्कूल शिक्षा प्रदान करने की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं. वर्तमान शिक्षा प्रणाली विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में समावेशी शिक्षा के लिए बहुजातीय वातावरण का सृजन नहीं कर रही है, जिससे विशेष आवश्यकता वाले बच्चों और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की शैक्षिक आवश्यकताएं पूरी हो सकें. आदिवासी बच्चों में शिक्षा स्तर एक गंभीर चिंता का विषय है. कम साक्षरता दर, कम नामांकन दरें, स्कूल छोड़ने की अधिक दर, आदिवासी बच्चों की अधिक मृत्यु दर का समाधान किया जाना चाहिए. आदिवासी बच्चों में छात्रवृति दिये जाने के प्रावधान के बावजूद शिक्षा की हालत संतोषजनक नहीं है. आदिवासी बच्चों के कम शैक्षिक विकास के लिए आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षकों की अनुपलब्धता मुख्य रूप से जिम्मेदार रही है. आदिवासी क्षेत्रों में कार्य कर रहे गैर-जनजातीय शिक्षकों के लिए भाषा और संचार भी एक समस्या है.
 
प्रारंभिक शिक्षा में गिरता परिणाम चिंता का विषय : स्कूली शिक्षा के दौरान छात्र पठन-पाठन व लेखन के मूल कौशल को नहीं सीख रहे हैं. हालांकि सरकार ने अध्ययन परिणामों को परिभाषित करने, उनके मापन एवं प्रारंभिक श्रेणी के पठन-पाठन व लेखन कार्यक्रम में वृद्धि करने जैसी पहल की है, लेकिन इन सभी प्रयासों के बावजूद निम्नस्तर का अध्ययन परिणाम एक चुनौती रहा है. इस कारण स्कूली बच्चों में अध्ययन परिणाम में सुधार करना राज्य सरकारों को प्राथमिकता सूची में रखनी होगी, तभी प्रारंभिक शिक्षा की गुणवत्ता में बढ़ोतरी हो सकती है.
 
स्थापना लक्ष्य को प्राप्त करता प्राथमिक विद्यालय : राज्य में प्राथमिक और अपग्रेड प्राथमिक विद्यालय की स्थापना में सरकार ने लक्ष्य के काफी करीब रहा है. वर्ष 2015-16 के आंकड़ों के मुताबिक, हर एक किलोमीटर की दूरी पर 39 नये प्राथमिक और 81 उन्नत प्राथमिक विद्यालय स्थापित किये गये. राज्य में 43 नये प्राथमिक विद्यालय और 82 अपग्रेड प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना के लक्ष्य निर्धारित थे. स्कूल अनुदान के तहत 40,195 प्राथमिक स्कूल और 14,377 उत्क्रमिक प्राथमिक विद्यालयों कों अनुदान मिला है. इसके अंतर्गत प्रत्येक प्राथमिक विद्यालयों को पांच हजार और हर उत्क्रमिक प्राथमिक विद्यालयों को सात हजार रुपये हर साल अनुदान के तौर पर मिलते हैं. वहीं मरम्मत और रख-रखाव अनुदान के तहत प्रत्येक प्राथमिक विद्यालयों को पांच हजार और प्रत्येक अपग्रेड प्राथमिक विद्यालयों को दस हजार रुपये प्रदान किये जाते हैं. 
 
अभिभावकों की भी हो भागीदारी
स्कूलों में खासकर प्राथमिक विद्यालय से ही समुदाय और अभिभावकों की भागीदारी, प्रक्रियाओं, सभी इनपुटस, परिणाम और स्कूलों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. ऐसे भी साक्ष्य हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल तभी प्रभावशाली ढंग से कार्य करेंगे, जब स्थानीय समुदाय सक्रिय होंगे और स्कूल की हर गतिविधियों में अपनी अहम भूमिका निभायेंगे. 
 
पंचायत जनप्रतिनिधियों का दायित्व
राज्य के 263 प्रखंडों के तहत 4398 पंचायतों में प्राथमिक शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने में पंचायत जनप्रतिनिधियों की भी बड़ी भूमिका होनी चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में गांवों में बच्चों की पहली सीढ़ी प्राथमिक विद्यालय ही है. अगर ग्रामीण बच्चों का आधार मजबूत होगा, तो साक्षरता दर में भी अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज हो सकती है. घर से निकाल कर बच्चों को स्कूलों में लाना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए निरंतर स्कूलों पर नजरें रखना भी पंचायत प्रतिनिधियों का दायित्व है. बच्चों में पढ़ाई के प्रति बढ़ावा देने में कोई दिलचस्पी नहीं लेता. खास कर छोटे-छोटे बच्चों के प्रति स्थिति तो ना के बराबर है. यही कारण है कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तरों पर सीखने की खराब गुणवत्ता माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों के सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है. यही स्थिति कॉलेज स्तर तक चलती है. इस कारण यह जरूरी है कि प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों में सीखने की ललक पैदा करनी चाहिए. पंचायत जनप्रतिनिधियों का यह दायित्व भी है कि अपने-अपने क्षेत्रों में बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर में कमी लाये. आकड़ें आज भी यह बताने के लिए काफी है कि प्रारंभिक शिक्षा को पूरा करने से पहले ही कई बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं. माध्यमिक शिक्षा में स्कूल छोड़नेवाले बच्चों की दर, विशेषकर सीखने वाले सामाजिक और आर्थिक रूप से लाभ वंचित सूमह के बच्चों में अधिक है. यही कारण है कि विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की दर छात्रों के सभी श्रेणियों के मामले में एक चिंता का विषय है. बालिकाओं के बीच स्कूल छोड़ने की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है. पंचायत जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही है कि सभी दाखिला लिए हुए छात्रों द्वारा प्रारंभिक स्तर से लेकर माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा को पूरा करने का कार्य सुनिश्चित करना सबसे अधिक प्राथमिकता वाले कार्य में शामिल है.