aamukh katha

  • Aug 19 2019 4:47PM

जंगल बचाने की जिद से ग्रामीणों में आयी एकजुटता, मिली राष्ट्रीय पहचान

जंगल बचाने की जिद से ग्रामीणों में आयी एकजुटता, मिली राष्ट्रीय पहचान

पंचायतनामा टीम 

एक वक्त ऐसा था, जब आरा-केरम गांव के अधिकतर लोग नशे में धुत रहते थे. पर्व-त्योहार में तो हफ्तेभर नशापान किया करते थे. इसके कारण बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था. साफ-सफाई पर कोई ध्यान नहीं था. खुले में शौच जाना व परिवार के विकास से बेफिक्र रहने के कारण लगातार पिछड़े जा रहे थे. गांव तक पहुंचने वाली सड़क के दोनों ओर गंदगी का भंडार रहता था. इस तस्वीर को बदलना आसान नहीं था. जंगल बचाने की जिद ने ग्रामीणों को एकजुट किया और आज इन्हें राष्ट्रीय पहचान मिल गयी है.

ऐसे बदली तस्वीर
तीन वर्षों में गांव की तस्वीर बदल गयी है. गांव की सीमा शुरू होते ही सड़क की दोनों ओर पेड़ लगे हैं. नशामुक्त गांव का बोर्ड लगा है. गांव के अंदर साफ-सफाई देखते ही बनती है. हर रोज सुबह चार बच्चे उठते हैं और पूरे गांव की साफ सफाई करते हैं. महीने में दो बार श्रमदान के जरिये सभी महिला-पुरुष गांव की सफाई करते हैं. श्रमदान व महिला समूह की ताकत ने इस गांव की रंगत बदल दी है. कई बड़े कार्य ग्रामीणों ने चुटकी में कर लिये. सामूहिक जागरूकता व एकजुटता के बल पर तस्वीर बदल गयी है.

लोटाबंदी का असर, खुले में शौच से हुआ मुक्त
स्वच्छ भारत मिशन के तहत आरा-केरम में शौचालयों का निर्माण किया गया है, हालांकि पांच घरों में अभी भी शौचालय नहीं बने हैं. इसके बावजूद ग्रामीणों ने इसका हल निकाल लिया. जिन घरों में शौचालय नहीं हैं, वो अपने पड़ोसी का शौचालय इस्तेमाल करते हैं. कोई खुले में शौच नहीं जाता है. लोटाबंदी का भी ये असर है. केरम गांव में जिन लोगों के शौचालय नहीं बन पाये, उन्होंने अपने पैसे से शौचालय बनाया है. इस तरह से गांव खुले में शौच से मुक्त है.

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एक फैसले से बदल गयी तस्वीर: गोपाल राम बेदिया
ग्राम प्रधान गोपाल राम बेदिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मन की बात कार्यक्रम में आरा-केरम का जिक्र करने पर खुशी जाहिर करते हुए कहते हैं कि यह उपलब्धि यहां के ग्रामीणों की है. अब खुद पर गर्व होता है. हर रोज राजनेता, बड़े अधिकारी और प्रतिनिधि गांव को देखने आते हैं. हमारी मेहनत रंग लायी. हमारा हौसला बढ़ा है.

उचित मार्गदर्शन मिला और आगे बढ़ते गये : बाबूराम गोप
गांव की तरक्की के लिए हर वक्त सजग रहने वाले बाबूराम गोप कहते हैं कि मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी ने इस गांव को आगे बढ़ाने में काफी सहयोग किया है. गांव वालों के साथ बैठक कर तरक्की की राह दिखायी. शराबबंदी के लिए प्रोत्साहित किया. मनरेगा की योजनाओं के जरिये ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ा. महिलाओं को प्रोत्साहित किया. दूसरे राज्यों के विकसित गांवों का भ्रमण कराया. उनके मार्गदर्शन में हम सब आगे बढ़ते रहे. आज राष्ट्रीय स्तर पर हमारे गांव की पहचान बन गयी है.

डोभा से कर रहे जैविक खेती : संतोष महतो
किसान संतोष महतो कहते हैं कि डोभा उनके लिए वरदान साबित हुआ है. शराबबंदी और जल संरक्षण का काम उनके गांव में काफी बेहतर हुआ है. 10X15 के डोभा से वो पूरे साल 84 डिसमिल जमीन में अमृत जल से जैविक खेती करते हैं. उनका खेत हर-भरा रहता है. वह बताते हैं कि सभी किसानों ने मिट्टी जांच के लिए सैंपल दे दिया है, लेकिन रिपोर्ट नहीं मिली है. सामूहिक प्रयास से गांव बदल गया है.

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जंगल ने हमें एकजुट किया : रमेश बेदिया
ग्राम वन प्रबंधन एवं संरक्षण समिति के अध्यक्ष रमेश बेदिया बताते हैं कि गांव को एकजुट करने में जंगल ने अहम भूमिका निभाई. इसे बचाने के लिए पहली बार हम सब एकजुट हुए. बैठक करने लगे. धीरे-धीरे जंगल के अलावा दूसरी बातों पर भी चर्चा होने लगी. इससे ग्रामीणों में जागरूकता आने लगी. गांव के पास 400 एकड़ वनक्षेत्र है. इसमें तीन एकड़ साठ डिसमिल प्राकृतिक वन क्षेत्र है. 31 एकड़ क्षेत्र में वन विभाग द्वारा वन लगाये गये हैं. शुरुआती दौर में वन सुरक्षा समिति को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा, क्योंकि कई बार पेड़ काटने से रोकने के लिए बल प्रयोग भी करना पड़ा. हम सही रास्ते पर थे. हमारी जीत हुई. जंगल के बहाने एकजुटता से आरा-केरम की सूरत बदल गयी है.

सूकर पालन से बदल गयी जिंदगी : सूरज करमाली
युवा सूरज करमाली की आज अपनी पहचान है. वह स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं और सूकर पालन कर रहे हैं. ग्रामीणों की नजर में सूरज एक सफल कारोबारी हैं. वर्ष 2013 में उन्होंने सूकर पालन शुरू किया था. अभी उनके पास 65 सूकर हैं. महीने में वह लगभग 50 हजार रुपये की कमाई कर लेते हैं. उनके पास तीन मोटरसाइकिल, एक लंबी कार और खुद का रेस्टोरेंट है. उनकी जिंदगी बदल गयी है.

अच्छी शिक्षा से बेहतर भविष्य : सरस्वती कुमारी
सरस्वती कुमारी कहती हैं कि गांव में विपरीत परिस्थियां होने के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और बीएससी इन लैब टेक्नीशियन की डिग्री हासिल की. स्नातक (विज्ञान) पास वो गांव की पहली लड़की हैं. उनकी बहन भी बीएड की डिग्री हासिल करने के बाद शिक्षिका का कार्य कर रही हैं. रामदास महतो की पुत्री सरस्वती गांव की दूसरी लड़कियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गयी हैं. अब बालिका शिक्षा पर गांव में खूब ध्यान दिया जा रहा है.