aamukh katha

  • Oct 25 2019 4:19PM

युवाओं को नशे की लत से मुक्ति दिला रहीं सिस्टर एना वर्की

युवाओं को नशे की लत से मुक्ति दिला रहीं सिस्टर एना वर्की

पंचायतनामा टीम
रांची 

नशा बुरी चीज है. इसे लोगों को समझना होगा. यह एक प्रकार का मनोरोग है. आजकल युवाओं में नशापान की लत काफी तेजी से बढ़ी है. केंद्र में जो रोगी आते हैं, अधिकतर की उम्र 40 वर्ष से कम होती है. नशा मुक्ति केंद्र में मरीजों के बेड के बीच घूमते हुए सिस्टर एना वर्की ये बातें बताती हैं. ये मांडर प्रखंड स्थित नशा मुक्ति केंद्र की संचालिका हैं. कहती हैं केंद्र में जितने भी वार्ड हैं, सभी में बेड हैं और सभी बेड मरीजों से भरे हुए हैं. इन मरीजों में अधिकतर युवा हैं, जो नशे की लत के कारण अपनी जिंदगी खराब कर चुके हैं, लेकिन वह सभी रोगियों का ध्यान रखती हैं. उनका सही मार्गदर्शन करती हैं और सही रास्ते पर लाकर उन्हें वापस घर भेजती हैं. कई बार तो रोगी ठीक होने के बाद दोबारा नशा मुक्ति केंद्र में आ जाते हैं. पिछले दो दशक से सिस्टर एना वर्की युवाओं को नशे की लत से बाहर निकालने में जुटी हैं. वर्ष 2002 से लेकर 2018 के बीच सिस्टर ने नशे की गिरफ्त में आये करीब सात हजार लोगों का इलाज किया. वहीं, करीब 11 हजार परिवारों के बीच जाकर सिस्टर वर्की ने काउंसिलिंग की है.

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1970 में आयीं और यहीं की होकर रह गयीं
केरल की सिस्टर एना वर्की वर्ष 1970 में पहली बार रांची के मांडर प्रखंड स्थित अस्पताल में बतौर लैब टेक्निशियन आयी थीं. इसके बाद आगे की पढ़ाई करने के लिए फिर वो चली गयीं. फिर वर्ष 1992 में रांची आयीं. जब वो मांडर प्रखंड के आसपास के गांवों में गयीं, तो पाया कि पूरा का पूरा गांव नशे की चपेट में है. ऐसे में सिस्टर वर्की ने गांव में जाकर जागरूकता फैलाना शुरू किया. वर्ष 1999 में सिस्टर वर्की ने प्रखंड के आसपास के 30 गांवों में नशा मुक्ति को लेकर अभियान चलाया.

वर्ष 2001 में खुला रिहा कृपा सेंटर
सिस्टर एना वर्की बताती हैं कि नशे के रोगियों का इलाज बिना भर्ती किये संभव नहीं था. मांडर के अस्पताल परिसर में ही दो कमरे का नशा मुक्ति केंद्र खोला गया. शुरुआत में मरीजों की सिर्फ काउंसलिंग की जाती थी. इससे परिणाम बेहतर नहीं आ रहे थे. बाद में अलग से 30 बेड वाला रिहा कृपा सेंटर बनाया गया. यहां इलाज के साथ-साथ एडमिट करने की व्यवस्था शुरू की गयी. केंद्र की दीवार पर नशा मुक्ति संबंधी स्लोगन लिखे गये. नशा मुक्ति को लेकर सिस्टर पहले भी कार्य कर चुकी थीं. इस कारण नशा मुक्ति केंद्र का जिम्मा सिस्टर एना वर्की को दिया गया. इस केंद्र में रांची के अलावा दूसरे जिले से भी मरीज आते हैं.

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नशा बुरी चीज है, इसे समझना होगा : सिस्टर एना वर्की
सिस्टर एना वर्की बताती हैं कि आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के बावजूद नशापान में 40 फीसदी तक कमी आयी है. आंकड़े कम या अधिक भी हो सकते हैं, लेकिन लोगों में जागरूकता आयी है. ब्रांबे गांव का जिक्र करते हुए बताती हैं कि साप्ताहिक बाजार होने के कारण वहां शराब ही ग्रामीण महिलाओं का मुख्य कारोबार था. पिछले कुछ सालों से स्थितियां बदली हैं. महिलाएं दूसरा रोजगार भी कर रही हैं. नये दौर में नशा का प्रकार बदल रहा है, जो एक बड़ी चुनौती है. नशे के रोगी का इलाज प्यार और उचित देखभाल से ही हो सकता है. उनके अंदर आत्मविश्वास जगाना होगा.