aamukh katha

  • Aug 17 2018 2:58PM

जंगल बचाने की जिद में जगदीश महतो ने बेच डाले पत्नी के गहने, जमीन व मवेशी

जंगल बचाने की जिद में जगदीश महतो ने बेच डाले पत्नी के गहने, जमीन व मवेशी

 दीपक सवाल

गांव : हिसीम
प्रखंड : कसमार
जिला : बोकारो 

बोकारो जिला अंतर्गत कसमार प्रखंड के हिसीम गांव निवासी जगदीश महतो की आज अपनी पहचान है. वन सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें राज्य स्तर पर जाना जाता है. दूसरे कई राज्यों के लोग भी इनके काम से काफी प्रभावित हैं और इनका काम देखने-समझने के लिए यहां पहुंचते हैं. वन सुरक्षा आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए जगदीश महतो प्रेरणास्रोत हैं. इसके पीछे जगदीश महतो का लगभग तीन दशक का संघर्ष छिपा हुआ है. इनका पूरा जीवन ही वनों की सुरक्षा में बीत गया है. तीन दशक में इन्हें काफी कुछ झेलने पड़े, लेकिन वह पीछे नहीं हटे. पेड़-पौधों को अपनी संतान की तरह खड़ा किया और जंगलों को अपना परिवार मान कर आबाद किया. वनों के प्रति अटूट लगाव के कारण जगदीश महतो को कई उपनाम से भी जाना जाता है. कोई इन्हें ट्री मैन कहता है, तो कोई वन देवता. बीर रक्षक वीर से लेकर कई और उपनाम से वे जाने जाते हैं.

हरियाली देखनी है, तो हिसीम जंगल आइए
जगदीश महतो के वन सुरक्षा आंदोलन की शुरुआत उनके पैतृक गांव कसमार प्रखंड के हिसीम से ही हुई है. वन सुरक्षा के मामले में उदाहरण बन चुके हिसीम जंगल की हरियाली आज देखते ही बनती है. घने जंगल और लहलहाते हजारों पेड़ सहज ही किसी का मन मोह लेते हैं. ऐसे ही अन्य सैकड़ों जंगल भी खिल उठे हैं. तकरीबन तीन दशक पहले हिसीम पहाड़ और इसकी तलहटी पर स्थित जंगल तेजी से साफ हो गये थे. वन माफियाओं की सक्रियता तथा दो वक्त की रोटी के लिए ग्रामीणों की मजबूरी व लाचारी से यहां के जंगलों की कटाई तेजी से हो रही थी. अधिकतर जगहों पर जंगल के नाम पर केवल ठूंठ बचे थे. हाल यह हो गया था कि उन ठूंठों पर भी कुल्हाड़ी चलने लगी थी. रोजगार की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने के कारण रोजी-रोटी के लिए ग्रामीणों ने लकड़ी माफियाओं का खूब साथ दिया था और खुद भी लकड़ी काटकर बेचने लगे थे. देखते ही देखते हिसीम के घने जंगल उजड़ कर वीरान हो गये थे. ग्रामीणों में जंगल के प्रति जागरूकता तब आयी, जब जंगल लगभग खत्म हो गये और ठूंठों को भी उखाड़ने की नौबत आने लगी.

पेड़ों पर कुल्हाड़ी नहीं चलाने का लिया संकल्प
इस खौफनाक व चिंतनीय परिस्थितियों के बीच इसी मामले को लेकर 31 अक्तूबर 1984 को हिसीम पहाड़ पर बसे चार गांव हिसीम, केदला, गुमनजारा और त्रियोनाला के ग्रामीण हिसीम के मध्य विद्यालय प्रांगण में जुटे. घंटों विचार- विमर्श और तर्क-वितर्क के बाद आखिरकार वनों की सुरक्षा और जंगल को फिर से आबाद करने का संकल्प लिया गया. जगदीश महतो ने इसकी कमान संभाली. एक भी पेड़ पर न खुद कुल्हाड़ी चलायेंगे और न किसी को चलाने देंगे के संकल्प के साथ यह अभियान शुरू हुआ, जो बाद में बड़े आंदोलन का रूप ले लिया. मोटी कमाई करनेवाले लकड़ी माफियाओं ने दूसरे गांवों के ग्रामीणों को इस अभियान के खिलाफ उकसाया. उनके इशारे पर दूसरे गांवों के लोग अभियान के विरोध में उतर आये. चेतावनी दी गयी कि पहाड़ पर बसे गांवों के ग्रामीणों को नीचे उतरने नहीं देंगे. ऐसा होने भी लगा. नीचे उतरने पर पहाड़वालों को परेशान किया जाने लगा. एक ओर जंगल बचाने के लिए पहाड़ पर बसे गांवों के ग्रामीणों का अभियान था, तो दूसरी ओर इस अभियान को बंद करने का कुप्रयास लकड़ी माफिया कर रहे थे. पहाड़वालों के सामने विकट परिस्थिति थी, लेकिन जगदीश महतो व समिति ने सूझबूझ से काम लिया. जिन गांवों के ग्रामीणों को इस अभियान के खिलाफ उकसाया गया था, उन्हें भी इस अभियान में शामिल करने की मुहिम चलाई गयी. उन्हें प्रेरित किया जाने लगा. धीरे-धीरे वन सुरक्षा अभियान ने वृहद रूप लिया और कसमार से निकल कर दूसरे प्रखंडों में फैलते हुए उत्तरी छोटानागपुर के लगभग 425 गांवों में वन सुरक्षा समिति गठित कर ली गयी. केंद्रीय वन पर्यावरण सुरक्षा सह प्रबंधन समिति के बैनर तले यह अभियान आज भी चल रहा है. जगदीश महतो केंद्रीय समिति के अध्यक्ष हैं.

जंगल बचाने के लिए पत्नी के गहने तक बेच दिये
वन सुरक्षा अभियान में जगदीश महतो को काफी संघर्ष और यातनाएं झेलनी पड़ी हैं. कई बार लकड़ी माफियाओं ने उनपर हमले तक कराये. ग्रामीणों को इनके खिलाफ उकसाया. यहां तक कि जूतों की माला तक पहनाया गया था. संघर्ष की और भी लंबी दास्तान है, लेकिन संघर्ष जितना कठिन होता गया, इनका हौसला उतना ही मजबूत होता गया. अपनी टीम के साथ आधी-आधी रात को जंगलों में छापामारी कर लकड़ी माफियाओं को खदेड़ने और उनके इरादों को पस्त करने का काम किया. इनके सहयोगियों ने भी इनका पूरा साथ दिया. दिन हो या रात, जंगलों की सुरक्षा के लिए इनके सहयोगी भी हमेशा तत्पर रहते थे. जगदीश महतो एक साधारण किसान परिवार से आते हैं. इस अभियान में इन्हें कई बार अपने मवेशी, पत्नी के गहने और जमीन तक बेचनी पड़ी. इनके संघर्ष और मेहनत के बल पर आज हजारों नहीं, बल्कि करोड़ों पेड़ लहलहा रहे हैं.

रक्षा सूत्र बांध कर पेड़ों को बचाने की मुहिम
वन प्रेमी जगदीश महतो ने पेड़ों को बचाने की एक और मुहिम छेड़ी. इलाके में रक्षा बंधन के अवसर पर पेड़ों में रक्षा सूत्र बांधने की शुरुआत की. करीब दो दशक पहले इस प्रकार का पहला आयोजन हिसीम में ही हुआ था. गाजे-बाजे के साथ सैकड़ों महिलाएं, युवतियां एवं ग्रामीण पुरुष रक्षासूत्र लेकर जंगलों में निकले थे एवं रक्षा सूत्र बांध कर न केवल पेड़ों की रक्षा का संकल्प लिया था, बल्कि वनों के साथ एक नये रिश्ते की शुरुआत की थी. इस कार्यक्रम का काफी सकारात्मक असर पड़ा. अब हर साल अलग-अलग जगहों पर रक्षा बंधन के अवसर पर इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होने लगे हैं. आज भी इस प्रकार के आयोजन की परंपरा बरकरार है. इनके कार्यक्रमों में वन विभाग के वरीय अधिकारी भी पहुंचते हैं. सरकार जगदीश महतो के कार्यों से काफी प्रभावित है. इनके प्रयास से ही सरकार का संयुक्त ग्राम वन प्रबंधन मजबूत हुआ और गांवों के लोग समितियों के माध्यम से वनों को बचाने व आबाद करने की महिम से जुड़ने लगे.

झारखंड सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं जगदीश महतो
वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में जगदीश महतो जिला परिषद के पद पर चुनाव लड़े. वन सुरक्षा के क्षेत्र में इनके योगदान का ही परिणाम है कि क्षेत्र की जनता ने इन्हें सिर आंखों पर बिठाकर रिकॉर्ड मतों से जीताकर अपना जिला परिषद सदस्य बनाया. आज भी जगदीश महतो वनों की सुरक्षा के साथ-साथ जनसेवा में पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ जुड़े हैं. नवंबर 2017 में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने झारखंड राज्य स्थापना दिवस से एक दिन पूर्व रांची में आयोजित राज्यस्तरीय समारोह में जगदीश महतो को झारखंड सम्मान से सम्मानित किया. सम्मान के तौर पर प्रशस्त्रि पत्र, शॉल व एक लाख रुपये का चेक प्रदान किया तथा इनके कार्यों की प्रशंसा करते हुए उन्हें बधाई व शुभकामनाएं दी थीं.