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  • Mar 18 2019 12:57PM

ब्लड प्रेशर से लेकर कैंसर तक के इलाज में रामबाण दवा है बिच्छू घास

ब्लड प्रेशर से लेकर कैंसर तक के इलाज में रामबाण दवा है बिच्छू घास

अरविंद कुमार मिश्रा

रांची

पहाड़ी प्रदेशों में बड़े पैमाने पर पाया जानेवाला बिच्छू घास झारखंड के लिए भले ही नया है, लेकिन बीपी से लेकर कैंसर तक के इलाज में यह रामबाण दवा है. यह अत्यधिक मात्रा में खुद--खुद उगने वाला पौधा है. डंक जैसा पीड़ा देने के कारण इसका नाम बिच्‍छू घास (अर्टिका डायोका) है. रांची दूरदर्शन में कैमरामैन के रूप में कार्यरत उत्तराखंड निवासी सुरेंद्र सिंह बिष्ट कहते हैं कि इसमें कई औषधीय गुण हैं. अपराध नियंत्रण में भी यह कारगर है.

पौधे को छूने से होती है झनझनाहट
अगर बिच्छू घास को कोई गलती से छू ले, तो उस जगह झनझनाहट शुरू हो जाती है, हालांकि यह घास कई गुणों को समेटे हुए है. इसके साग का स्‍वाद लाजवाब है. देखने में यह पौधा बेहद खूबसूरत है, लेकिन इसके पत्ते और तने में छोटे-छोटे कांटे होते हैं, जो शरीर पर स्‍पर्श होते ही एक विशेष प्रकार का रसायन छोड़ता है, जिससे बिच्‍छू के डंक जैसी जलन या बिजली जैसी करंट का एहसास होता है. इसका असर 24 घंटे तक रहता है और पानी के संपर्क में आने से जलन और तेज हो जाती है, हालांकि इसका असर कंबल से रगड़ने से कम हो जाता है. इसके स्‍पर्श से शरीर को कोई हानि नहीं होती है और न ही इसका कोई साइड इफेक्‍ट है.

दर्द निवारक है बिच्छू घास
औषधीय गुणों से भरपूर इस पौधे का खास महत्व है. इसका प्रयोग पित्त दोष, शरीर के किसी हिस्से में मोच, जकड़न और चोट लगने पर होता है. श्री बिष्‍ट के मुताबिक, इस पौधे से करीब 100 प्रकार के रोगों का इलाज संभव है. अगर शरीर के किसी भी हिस्‍से में चोट लग जाये या फिर दर्द हो, तो इसके पत्ते को सीधे उस जगह पर सटा देने से तत्‍काल राहत मिलती है. शरीर के किसी भी अंग में मोच आने पर यह खून को थक्‍का जमने नहीं देता है और 24 घंटे तक नस में झनझनाहट पैदा करता है. यह जबरदस्‍त दर्दनिवारक के रूप में काम करता है. पुराने से पुराने दर्द में इस घास के प्रयोग से तुरंत आराम मिलता है. इसके बीजों को पेट साफ करनेवाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा इसके अर्क से आखों की बीमारियों का भी इलाज किया जाता है. इसमें आयरन के अलावा विटामिन ए, पोटैशियम, मैग्निज तथा कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं. इसको प्राकृतिक मल्‍टी विटामिन नाम भी दिया गया है.

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इसमें भी है लाभकारी
1.
मासिक धर्म : महिलाओं को मासिक धर्म के समय विभिन्‍न प्रकार की समस्‍याएं होती हैं, लेकिन इसमें मौजूद पोषक तत्‍व व औषधीय गुण मासिक धर्म के दौरान अत्‍यधिक रक्‍तस्राव को कम करने में मदद करते हैं. इसमें मौजूद दर्द निवारक गुण मासिक धर्म के दर्द और ऐंठन को कम करते हैं.
2.
एंटी कैंसर के गुण मौजूद : इसके पत्तों से बनी चाय में एंटी कैंसर के गुण मौजूद होते हैं. इसकी चाय में फेनोलिक और फ्लैवोनोइड यौगिकों के साथ ही एंटी ऑक्‍सीडेंट गुण होते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकने में मदद करते हैं.
3.
ब्‍लड प्रेशर कंट्रोल करने में मददगार : जिन लोगों को उच्‍च रक्‍तचाप की समस्‍या होती है, उनके लिए बिच्छू घास बहुत फायदेमंद है. इसके पत्तों का नियमित रूप से अगर सेवन किया जाये, तो यह रक्‍तचाप को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है.

इस घास से बने प्रोडक्‍ट की भारी मांग
बिच्छू घास के बने प्रोडक्‍ट की मांग देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है. श्री बिष्‍ट बताते हैं कि इस घास से उत्तराखंड में जैकेट, शॉल, स्टॉल, स्कार्फ, बैग और चप्‍पल तैयार किये जा रहे हैं. चमोली व उत्तरकाशी जिले में कई समूह बिच्छू घास के तने से रेशा (फाइबर) निकाल कर विभिन्न प्रकार के उत्पाद बना रहे हैं.

बेहद स्‍वादिष्‍ट और महंगी है इससे बनी चाय
इस घास से बनी चाय बेहद स्‍वादिष्‍ट होती है. कंडाली की चाय को यूरोप के देशों में विटामिन और खनिजों का पावर हाउस माना जाता है, जो रोग प्रतिरोधक शक्ति को भी बढ़ाता है.

पर्यावरण सुरक्षा में मददगार
बिच्‍छू घास की खेती करने से पर्यावरण की भी सुरक्षा हो सकती है. यह वहीं उगता है, जहां गंदगी होती है. यह गंदगी व खतरनाक प्रदूषण को जल्द ही साफ कर देता है. इससे पर्यावरण की सुरक्षा भी होती है.

अपराध स्वीकार कर लेते हैं अपराधी
इस घास के प्रयोग से बड़े से बड़ा अपराधी अपना अपराध स्वीकार कर लेता है. अगर कोई सीधी तरीके से अपना अपराध कबूल नहीं करता, तो बिच्छू घास से बनी छड़ी को एक बार उसके बदन में जड़ दिया जाये, तो वो खुद ब खुद सारी बातें कह देता है. सुरेंद्र सिंह बिष्ट के मुताबिक, अंग्रेजों के समय में इस पौधे का प्रयोग अपराध नियंत्रण करने के लिए किया जाता था. आज भी वहां की महिलाएं शरारती बच्‍चों को डराने के लिए इसका प्रयोग करती हैं.

खेती की संभावनाएं
सुरेंद्र सिंह बिष्‍ट के अनुसार, झारखंड की जलवायु इसकी खेती के लिए काफी अनुकूल है. उन्‍होंने प्रयोग के तौर पर एक पौधा उत्तराखंड से लाकर रांची दूरदर्शन परिसर में लगाया है. अगर यहां के किसान इसकी खेती करते हैं, तो उनकी आय में काफी वृद्धि हो सकती है.