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  • Jul 4 2019 12:09PM

पीवीटीजी डाकिया योजना : आदिम जनजाति परिवारों को मिल रहा चावल

पीवीटीजी डाकिया योजना : आदिम जनजाति परिवारों को मिल रहा चावल

समीर रंजन

झारखंड में विलुप्त होने के कगार पर पहुंचे आठ जनजाति समुदाय को घर बैठे अनाज (चावल) पहुंचाने की प्रक्रिया राज्य सरकार ने शुरू की है. इसका उद्देश्य उन्हें भरपेट भोजन नसीब हो सके. कंद-मूल खाकर जीवन-यापन करनेवाले इन आदिम जनजाति परिवारों के लिए अनाज के साथ-साथ कई अन्य योजनाएं राज्य सरकार ने संचालित की है, ताकि अन्य लोगों की भांति इस समुदाय का स्तर भी ऊंचा उठ सके. इसके बावजूद इसकी घटती जनसंख्या चिंता का कारण है. वर्तमान में पूरे राज्य में आदिम जनजातियों की जनसंख्या 2.92 लाख है. आमुख कथा में इस बार आदिम जनजातियों की स्थिति, अनाज की व्यवस्था, सरकारी योजनाओं से मिलता लाभ आदि बातों पर फोकस किया गया है, ताकि अन्य लोगों की भांति इनका जीवन-यापन भी सुचारु रूप से चल सके

झारखंड के विलुप्तप्राय आदिम जनजाति परिवारों को हर महीने घर पर अनाज (चावल) दिया जा रहा है. इस कारण राशन के लिए उन्हें कहीं भटकना नहीं पड़ रहा है. बंद बोरे में हर परिवार को 35 किलोग्राम चावल पहुंचाया जा रहा है. यही प्रिमिटिव वलनेरेबल ट्राइवल ग्रुप्स (पीवीटीजी) डाकिया योजना की ताकत है. वर्ष 2017 में इस योजना की शुरुआत की गयी थी. रघुवर सरकार की ये महत्वाकांक्षी योजना राज्य के आदिम जनजाति परिवारों के लिए वरदान साबित हो रही है. इस योजना के कुल लाभुक 73,386 हैं.

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आदिम जनजाति परिवारों की सुरक्षा और संरक्षण
जंगलों-पहाड़ों पर रहने वाले आदिम जनजाति परिवारों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी. 03 अप्रैल, 2017 को राज्य में विशिष्ट जनजाति खाद्यान्न सुरक्षा योजना यानी पीवीटीजी डाकिया योजना शुरू की गयी थी. गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी प्रखंड, साहेबगंज जिले के बरहेट और पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड में एक साथ इस योजना की शुरुआत की गयी थी. इसका असर धरातल पर दिख रहा है. आदिम जनजाति परिवारों में इस योजना को लेकर बेहद खुशी दिखती है. अब उन्हें जंगलों-पहाड़ों से उतर कर राशन डीलर के पास से चावल लाने की मजबूरी खत्म हो गयी है. पहले से स्थितियां बदल गयी हैं. डाकिया योजना के तहत अब राशन डीलर द्वारा ही गांव में बंद बोरे में चावल लाकर दिया जाता है.

डाकिया योजना को जानिये
आदिम जनजातियों की सुरक्षा, संरक्षण और मुख्यमंत्री खाद्य सुरक्षा योजना से जोड़ने के लिए ऐसे समुदायों के घर तक बंद बोरी में नि:शुल्क 35 किलोग्राम चावल पहुंचाने के लिए डाकिया योजना की शुरुआत की गयी थी. आदिम जनजाति आबादी को पूरी तरह से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कराने के लिए रघुवर सरकार ने इस महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत की थी. इस योजना को आदिम जनजाति खाद्यान्न सुरक्षा योजना नाम दिया गया है, जिसके तहत सीधे तौर पर घर के द्वार तक अनाज पहुंचाया जाता है, इसलिए इसे डाकिया योजना का भी नाम दिया गया है. शुरुआत में राज्य के 68,731 आदिम जनजाति परिवारों को लाभुक के रूप में चिह्नित किया गया था. फिलहाल इस योजना के लाभुकों की संख्या 73,386 है.

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2.92 लाख हैं आदिम जनजाति
राज्य में 32 जनजातियां हैं. जिसमें आठ जनजातियों को प्रिमिटिव वलनेरेबल ट्राइवल ग्रुप्स (पीवीटीजी) यानी उन मूल आदिवासियों के वर्ग में रखा गया है, जो विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं. इनमें असुर, बिरहोर, बिरजिया, कोरबा, परहिया (बैगा), सबर, माल पहाड़िया और सौरिया पहाड़िया शामिल हैं. राज्य में कुल आबादी का 27.67 फीसदी हिस्सा जनजातियों का है. 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में आदिम जनजातियों की संख्या 2,92,395 है. परहिया की आबादी दो प्रतिशत है.

आदिम जनजातियों की जनसंख्या :
आदिम जनजाति                                                       जनसंख्या
माल पहाड़िया                                                         1,35,797
सौरिया पहाड़िया                                                        46,222
कोरबा                                                                    35,606
परहिया                                                                   25,585
असुर समुदाय                                                           22,495
बिरहोर                                                                   10,726
सबर                                                                        9,688
बिरजिया                                                                   6,276

साहिबगंज में सर्वाधिक व खूंटी में सबसे कम डाकिया योजना के हैं लाभुक :
झारखंड में डाकिया योजना के तहत लाभुकों की संख्या 73,386 है.

जिला                                          लाभुकों की संख्या

1. साहिबगंज                                    11,982
2.
पाकुड़                                         11,770
3.
गढ़वा                                             8,670
4.
गोड्डा                                           7,940
5.
दुमका                                           7,221
6.
पूर्वी सिंहभूम                                    5,162
7.
लातेहार                                         4,049
8.
पलामू                                           4,020
9.
गुमला                                           3,391
10.
देवघर                                        2,893
11.
चतरा                                        1,524
12.
जामताड़ा                                      943
13.
हजारीबाग                                    741
14.
सरायकेला                                   630
15.
लोहरदगा                                    616
16.
कोडरमा                                     394
17.
रांची                                          323
18.
पश्चिमी सिंहभूम                            275
19.
सिमडेगा                                     252
20.
रामगढ़                                       222
21.
गिरिडीह                                     181
22.
बोकारो                                       127
23.
धनबाद                                         44
24.
खूंटी                                            16

सखी मंडल की दीदियां कर रहीं पैकेजिंग
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत झारखंड के आदिम जनजाति परिवारों को उनके घरों तक पैकेटयुक्त 35 किलोग्राम चावल नि:शुल्क पहुंचाया जा रहा है, ताकि उन्हें राशन के लिए कहीं भटकना नहीं पड़े. झारखंड राज्य खाद्य एवं असैनिक आपूर्ति निगम लिमिटेड के गोदाम में चावल को बोरे में भरने का काम किया जाता है. सखी मंडल की दीदियां यह कार्य बखूबी कर रही हैं.

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सखी मंडल की है अहम भूमिका
डाकिया योजना की सफलता में सखी मंडल, ग्राम संगठन व संकुल स्तरीय संघ की अहम भूमिका है.
जिले या प्रखंड के गोदाम में जाकर हर घर के लिए 35 किलोग्राम चावल का बैग बनाना
पैकेजिंग प्वाइंट पर ही चावल का बैग देना
संयुक्त रूप से चावल का वजन जांचना
सखी मंडल की मदद से चावल का बैग पैक करना
हर बैग पर लाभार्थी के राशन कार्ड का नंबर दर्ज कराना
चावल बैग के रिसीवर का हस्ताक्षर लॉग बुक में करवाना
एक बैग पैक करने पर एक सदस्य को 12 रुपये मिलेंगे. इसमें से वो दो रुपये अपने ग्राम संगठन को वापस करेंगी. बाकी 10 रुपये उन्हें मिलेगा.

एमओ और बीएसओ की अहम भूमिका
अनाज का वितरण पणन पदाधिकारी (एमओ) एवं प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी (बीएसओ) के द्वारा राशन डीलर के जरिये कराया जाना है. दूर-दराज के क्षेत्रों में भी जन वितरण प्रणाली के दुकानदार आदिम जनजाति परिवारों के घरों तक राशन पहुंचा रहे हैं. इस योजना की सफलता में इनकी अहम भूमिका है.

राज्य के 168 प्रखंड में डाकिया योजना
राज्य के सभी 24 जिलों के 168 प्रखंड में डाकिया योजना चल रही है. 65 सेंटर पर 542 सखी मंडल की दीदियों की मदद से डाकिया योजना के तहत चावल की पैकेजिंग की जा रही है.

आर्थिक व सामाजिक स्थिति सुधारने को हो रहा प्रयास : रघुवर दास
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि आदिम जनजाति परिवार के सदस्यों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति सुधारने को लेकर राज्य सरकार प्रयासरत है. अनाज से लेकर शुद्ध पेयजलापूर्ति की व्यवस्था इन परिवारों के किया जा रहा है. जहां डाकिया योजना के तहत घर बैठे 35 किलोग्राम चावल उपलब्ध कराया जा रहा है, वहीं इनके घरों तक पाइप के माध्यम से शुद्ध पानी पहुंचाने का प्रयास भी हो रहा है. सरकार की कोशिश है कि हर स्तर पर आदिम जनजाति परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, ताकि ये भी बेहतर जीवन यापन कर सकें.