aamukh katha

  • Jul 4 2019 12:53PM

ऊंचे पहाड़ पर बसे बिरहोरों को मिल रही चावल की संजीवनी

ऊंचे पहाड़ पर बसे बिरहोरों को मिल रही चावल की संजीवनी

गुरुस्वरूप मिश्रा
प्रखंड: अनगड़ा
जिला: रांची

जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) की दुकानों की धूमिल छवि के बीच पीवीटीजी (विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह) डाकिया योजना की तस्वीर सुकून देती है. आपको यकीन नहीं होगा, लेकिन रांची जिले के अनगड़ा के जंगलों में ऊंचे पहाड़ पर बसी पहाड़ सिंह बिरहोर टोली के आदिम जनजाति बिरहोर परिवारों को उनके गांव में प्लास्टिक की बोरी में चावल की संजीवनी मिल रही है. किसी भी घर में कुछ मिले, न मिले. डाकिया योजना के चावल की बोरी जरूर मिल जायेगी. राशन की कालाबाजारी पर रोक लगाकर लाभुकों को उनका राशन दिलाने के उद्देश्य से वर्ष 2017 में इस योजना की शुरुआत की गयी थी. आज धरातल पर यह काफी हद तक सफल है.

 

प्लास्टिक की जोरी से बिरहोरों की कटती है जिंदगी
बुजुर्ग विषम बिरहोर कहते हैं कि इस पहाड़ से करीब 15 किलोमीटर दूर मंगलवार को जोन्हा बाजार जाकर जोरी बेचते हैं. दो रुपये में प्लास्टिक की बोरी खरीदते हैं और करीब 30-40 रुपये में जोरी बनाकर बेचते हैं. कड़ी मेहनत के बाद इससे हर सप्ताह करीब 300-400 रुपये की कमाई हो जाती है. महीने में करीब डेढ़ से दो हजार रुपये मिल जाते हैं. उनके परिवार में एक बहू और पोते हैं. दोनों बेटे मेघनाथ (वज्रपात) और मंजीत बिरहोर (बीमारी) की काफी पहले मौत हो चुकी है. परिवार में कमाने वाला वह अकेला पुरुष हैं. बहू भी मदद करती है. कॉलोनी के पास चट्टान पर बैठकर बहू भी जोरी बना रही थी.

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चबूतरे पर बंटता है डाकिया योजना का चावल
अनगड़ा और सिल्ली प्रखंड को अलग करती मोरम वाली सड़क से पहाड़ सिंह बिरहोर टोली में प्रवेश करते ही विषम बिरहोर की सरकारी कॉलोनी मिलती है. सोलर लाइट लगी है. उन्हें बिरसा मुंडा आवास भी मिला है. पेंशन भी मिलती है, लेकिन नियमित नहीं. बैंक का चक्कर लगाना पड़ता है. वह पासबुक दिखाते हैं. पिछले कई महीने से उन्हें पेंशन नहीं मिली है. उनके पास काफी खेत हैं, लेकिन कोई खेती करने वाला नहीं है. ऐसे में पीवीटीजी डाकिया योजना के तहत राशन डीलर द्वारा बिरहोर टोली में विशाल पेड़ के नीचे पक्के चबूतरे तक पहुंचाया जाने वाला राशन (चावल) उनके परिवार के लिए संजीवनी है

 

माड़, भात और कोईनार साग खा बना रहीं जोरी
55
वर्षीय सुकुआ बिरहोर और उनकी पत्नी कैसव देवी (50) कॉलोनी के बरामदे में बैठकर प्लास्टिक की जोरी बना रहे हैं. कैसव देवी को पेंशन मिलती है. वह कहती हैं कि डाकिया योजना का चावल बहुत बड़ी मदद है. सुबह माड़, भात और कोईनार साग खाकर जोरी बनाने में लगी हैं. रोजाना सुबह-शाम चावल खाती हैं. पर्व-त्योहार में ही रोटी व दाल खा पाती हैं. उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर और चूल्हा मिला है, लेकिन गैस सिलेंडर भरवाना मुश्किल हो रहा है. लिहाजा मिट्टी के चूल्हे पर ही भोजन बनाती हैं. सुकुआ कहते हैं कि खेत है, लेकिन बैल नहीं है. इसलिए खेती नहीं कर पाते. प्लास्टिक की रस्सी ही उनकी जिंदगी है.

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साधव के जज्बे को सलाम
पुनिया देवी, छोटे-छोटे बच्चे और अन्य महिलाएं बिरहोर कॉलोनी में बैठी हैं. पुनिया बताती हैं कि चावल हर परिवार को मिलता है. 80 वर्षीय साधव देवी बगल में पेड़ के नीचे बोरे पर बैठकर प्लास्टिक की जोरी बना रही हैं. यही उनकी आमदनी का जरिया है. इस उम्र में भी वह किसी से मांगतीं नहीं, बल्कि देती हैं. पूछने पर कहती हैं कि उन्हें पेंशन नहीं मिलती है.

बहुत बड़ी राहत है डाकिया योजना का चावल
नरेश बिरहोर और जगत पाल बिरहोर पढ़े-लिखे युवा हैं. नरेश कहते हैं कि डाकिया योजना का चावल बिरहोर टोली के लोगों के लिए बहुत बड़ी राहत है. पानी टंकी पर वज्रपात होने के कारण घर-घर पहुंचनेवाला शुद्ध पेयजल अब नहीं मिल पा रहा है. बिरसा मुंडा आवास में भी गांव वालों के साथ ठगी कर ली गयी है. दरवाजा और दीवार का रंग-रोगन के नाम पर बहला-फुसला कर करीब 48 हजार रुपये की निकासी कर ली गयी है. पांच माह बाद भी कोई कार्य नहीं कराया गया है. जेई से इस बाबत शिकायत की गयी है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गयी.

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प्लास्टिक की रस्सी से बंधी बोरी
डाकिया योजना के तहत बंद बोरी में लाभुक को 35 किलो चावल देना है, लेकिन यहां प्लास्टिक की रस्सी से बंधी बोरी में चावल दिया जा रहा है. इससे उन्हें 35 किलोग्राम (मात्रा) चावल मिलने पर संशय है. राशन देने के लिए कोई तारीख भी तय नहीं है

पहाड़ सिंह बिरहोर टोली को जानिए
बिरहोर टोली में करीब 35 घर है. आबादी करीब 100 है. राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय है. आंगनबाड़ी है. पानी टंकी है. सोलर लाइट की व्यवस्था है, लेकिन कोई चिकित्सा सुविधा नहीं है. इसके लिए 12 किलोमीटर दूर जोन्हा जाना पड़ता है

पैकेजिंग व डिस्ट्रीब्यूशन पर हो कड़ी नजर : बलराम
सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त के पूर्व राज्य सलाहकार बलराम कहते हैं कि इसकी सफलता के लिए कोई एक विभाग पैकेजिंग व डिस्ट्रीब्यूशन पर कड़ी नजर रखे.

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तय समय पर मिले पैकेटयुक्त चावल : अशर्फी नंद प्रसाद
भोजन का अधिकार अभियान, झारखंड के राज्य समन्वयक अशर्फी नंद प्रसाद कहते हैं कि तारीख तय हो और पैकेटयुक्त चावल द्वार पर मिले, तभी योजना सफल होगी.

 

तय समय पर मिलेगा चावल : बंका राम
रांची के जिला आपूर्ति पदाधिकारी बंका राम कहते हैं कि आदिम जनजाति परिवारों को महीने के पहले सप्ताह में घर पर 35 किलो राशन (चावल) देना है. इसकी जवाबदेही मार्केटिंग अफसर की है. इसे सुनिश्चित कराया जायेगा.