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  • Apr 16 2018 1:02PM

मजबूत होगी गांव की सरकार, समृद्ध होगा झारखंड

मजबूत होगी गांव की सरकार, समृद्ध होगा झारखंड

 समीर रंजन 

पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है. स्वशासी संस्था के रूप में काम करने में सक्षम बनाने के लिए शक्तियां और अधिकार भी मिले हैं. झारखंड की पंचायती राज संस्थाओं को 14 विभागों के 29 विषयों के अधिकार और शक्तियां प्रदान की गयी हैं. अधिकार व शक्तियों के मामले में देश के मात्र पांच राज्य ही ऐसे हैं, जहां पंचायती राज संस्थाओं को शत प्रतिशत अधिकार व शक्तियां प्रदान की गयी हैं, हालांकि झारखंड की स्थिति भी धीरे-धीरे बेहतर होने लगी है. राज्य के कई ऐसी पंचायतें हैं, जहां के जनप्रतिनिधि काफी सजग हैं तथा अपने गांव-पंचायत व ग्रामीणों को मजबूत करने में लगे हैं. आमुख कथा के इस अंक में पंचायती राज संस्थाएं, अधिकार व कर्तव्य एवं पंचायत जनप्रतिनिधियों की पीड़ा बतायी गयी है, ताकि राज्य के सभी पंचायत जनप्रतिनिधि अपनी-अपनी पंचायतों का विकास कर तस्वीर बदल सकें. पढ़िए की यह आलेख.

 

झारखंड विधानसभा में 30 मार्च, 2001 को झारखंड पंचायती राज विधेयक 2001 पारित हुआ. तत्कालीन राज्यपाल प्रभात कुमार ने 23 अप्रैल, 2001 को इसे मंजूरी दी थी. इसके बाद यह विधेयक झारखंड पंचायती राज अधिनियम 2001 के रूप में सामने आया. इस अधिनियम के तहत राज्य में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था अपनायी गयी. ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद की व्यवस्था है. संविधान के 73वां संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला है. यह स्वशासी संस्था के रूप में काम करने में सक्षम बनाने के लिए कुछ शक्तियां और अधिकार देता है.

1. जनता की सभा है ग्रामसभा
पंचायत राज व्यवस्था की मूल संवैधानिक संस्था है ग्रामसभा. पंचायत राज की अन्य संस्थाएं ग्राम पंचायत, पंचायत समिति एवं जिला परिषद जनता प्रतिनिधियों वाली संस्था है, लेकिन ग्रामसभा खुद जनता की सभा है. ग्रामसभा ही वह आधारशिला है, जिस पर पंचायत राज का पूरा विकसित ढांचा अवस्थित है. यह एक स्थायी निकाय है. ग्रामसभा में 200 या उससे अधिक की जनसंख्या का होना अनिवार्य है. गांव की आर्थिक व सामाजिक मजबूती और बेहतर पर्यावरण, गांव की शिक्षा व रोजगार आदि कार्यों को और विस्तार देने के लिए ग्रामसभा को अधिकार दिये गये हैं. सामान्य क्षेत्र की ग्रामसभा की बैठक एक साल में कम से कम चार बार होनी चाहिए. दो बैठकों के बीच का अंतराल तीन माह से अधिक नहीं होना चाहिए. बैठक बुलाने व अध्यक्षता करने का दायित्व मुखिया का है. अनुसूचित क्षेत्र की ग्रामसभा के तहत राजस्व ग्राम या वन ग्राम के अंदर एक या एक से अधिक ग्रामसभा का गठन किया जा सकता है. ग्रामसभा की बैठक बुलाने का दायित्व तो मुखिया का है, लेकिन उन बैठकों की अध्यक्षता परंपरागत ग्राम प्रधान के द्वारा ही की जाती है.

ग्रामसभा स्तर पर आठ स्थायी समितियां गठित करने का प्रावधान

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ग्राम विकास समिति
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सार्वजनिक संपदा समिति
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कृषि समिति
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स्वास्थ्य समिति
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ग्राम रक्षा समिति
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आधारभूत संरचना समिति
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शिक्षा एवं सामाजिक न्याय समिति व
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निगरानी समिति

2. जमीनी संस्थागत स्वरूप है ग्राम पंचायत
यह पंचायती राज व्यवस्था का सबसे जमीनी संस्थागत स्वरूप है. यही एकमात्र विशुद्ध निर्वाचित सदस्यों की संस्था है. इस संस्था के प्रधान यानी मुखिया सीधे जनता से चुन कर आते हैं. इन्हें अपने क्षेत्र के लिए योजना निर्माण व क्रियान्वयन, कर निर्धारण एवं नागरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रदान की गयी है.

ग्राम पंचायत स्तर पर सात स्थायी समितियां गठित करने का प्रावधान
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सामान्य प्रशासन समिति
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विकास समिति
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महिला, शिशु एवं सामाजिक कल्याण समिति
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स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पर्यावरण समिति
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ग्राम रक्षा समिति
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सार्वजनिक संपदा समिति व
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अधोसंरचना समिति

3.
ग्राम पंचायतों की सामूहिक संस्था है पंचायत समिति
ग्राम पंचायतों को नियमित एवं सुचारु ढंग से चलने में पंचायत समिति सहायक और समूह नायक की भूमिका निभाती है. पंचायत समिति स्तर पर पहली बार पंचायत राज प्रशासन से संपर्क में आता है और उसके माध्यम से क्षेत्र के आधार पर कार्यकलापों का संकलन एवं संपादन करता है.

पंचायत समिति स्तर पर आठ स्थायी समितियां गठित करने का प्रावधान
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सामान्य प्रशासन समिति
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कृषि एवं उद्योग समिति
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स्वास्थ्य एवं शिक्षा समिति
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वित्त अंकेक्षण एवं योजना तथा विकास समिति
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सहकारिता समिति
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महिला, शिशु एवं सामाजिक कल्याण समिति
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वन एवं पर्यावरण समिति
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संचार एवं संकर्म समिति

बेहतर को-ऑर्डिनेटर की भूमिका निभाती जिला परिषद
पंचायती राज व्यवस्था में जिला परिषद समन्वयक के रूप में है. यह तीन स्तरों पर को-ऑर्डिनेट करता है. पहला, पंचायत समितियों के बीच समन्वय, जिसका प्रतिफल जिला स्तरीय योजना निर्माण होता है. दूसरा, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय, जिसका प्रतिफल पंचायत समितियों एवं ग्राम पंचायतों के क्रियाकलापों का निर्धारण होता है. तीसरा, प्रशासन एवं शासन के साथ समन्वय बनाना, जिसका प्रतिफल पंचायत राज का नीतिगत स्वरूप होता है.

 

भूरिया समिति की सिफारिश पर हुआ पेसा अधिनियम लागू
आदिवासी बहुल इलाकों में पंचायती राज के विस्तार पर अध्ययन करने के लिए भूरिया समिति बनायी गयी थी. इसने 17 जनवरी, 1995 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किया. भूरिया समिति की सिफारिश के बाद संसद ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम) यानी पेसा, 1996 को अनुसूचित क्षेत्रों के लिए पारित किया. इसके मुताबिक हर गांव में अपनी ग्रामसभा होगी. एक गांव में एक समुदाय के एक या अधिक बस्तियां शामिल हो सकती हैं, जो परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपने मामलों का प्रबंधन करता हो.

32
साल बाद वर्ष 2010 में हुए पंचायत चुनाव
अविभाजित बिहार में 1979 में पंचायत चुनाव हुए थे. करीब 32 वर्ष बाद झारखंड में 2010 में पंचायत चुनाव हुए. वर्ष 2015 में दूसरा पंचायत चुनाव हुआ. इसमें करीब 56 फीसदी महिलाएं चुनाव में जीत दर्ज कीं.

पंचायत जनप्रतिनिधियों की स्थिति
पद कुल पद पुरुष निर्वाचित महिला निर्वाचित
1.
मुखिया 4402 (वर्तमान में 4398) 2113 2289
2.
पंचायत समिति सदस्य 5423 2603 2820
3.
ग्राम पंचायत समिति सदस्य 54,330 25,698 28,632
4.
जिला परिषद 545 264 281

24
अप्रैल को हर वर्ष मनाया जाता है पंचायती राज दिवस
हर वर्ष 24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिन 73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के पारित होने का प्रतीक है. यह 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ था. 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के तहत पंचायती राज को ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तरीय पंचायतों के माध्यम से संस्थागत स्वरूप दिया गया. राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2010 से हुई. केंद्र सरकार के निर्देश पर अब हर वर्ष 24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस मनाया जाता है.

 

टीएसी की तर्ज पर पंचायत राज स्वशासन परिषद का हुआ गठन
झारखंड में जनजातीय परामर्शदातृ परिषद (टीएसी) की तर्ज पर पंचायत राज स्वशासन परिषद का गठन हुआ है. पेसा कानून व पंचायती राज व्यवस्था मजबूत करने के उद्देश्य से सरकार की ओर यह कदम उठाया गया है. देश में पहली बार पंचायती राज व्यवस्था के मद्देनजर स्वशासन परिषद का गठन किया गया है. ग्रामीण विकास मंत्री पंचायती राज स्वशासन परिषद के लिए पदेन अध्यक्ष हैं. पंचायतों की शक्तियों के विकेंद्रीकरण के साथ-साथ उसका कर्तव्य, फंड और कर्मचारियों का हस्तांतरण स्वशासन परिषद के माध्यम से ही किया जाना है.

पंचायतों को मिली हैं 14 विभागों के 29 विषयों की शक्तियां
संविधान के अनुच्छेद 243 (जी) में पंचायतों को 29 विषयों की शक्तियां देने का उल्लेख किया गया है. झारखंड में अब तक पंचायती राज संस्थाओं को 14 विभागों के 29 विषयों के अधिकार व शक्तियां सौंपी गयी हैं.
1.
कृषि एवं गन्ना विकास विभाग
2.
मानव संसाधन विकास विभाग
3.
स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग
4.
समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास विभाग
5.
पशुपालन एवं मत्स्य पालन विभाग
6.
पेयजल एवं स्वच्छता विभाग
7.
जल संसाधन विभाग
8.
उद्योग विभाग
9.
खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग
10.
खान एवं भूतत्व विभाग
11.
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग
12.
ग्रामीण विकास विभाग
13.
कल्याण विभाग एवं
14.
कला, संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग

 

देश के पांच राज्यों में पंचायतों को मिला शत प्रतिशत अधिकार
पंचायती राज व्यवस्था के तहत पंचायतों को पूर्ण अधिकार देने की बात हर समय उठती है. देश के मात्र पांच राज्य ही ऐसे हैं, जिन्हें 73वें संविधान संशोधन के प्रावधानों के अनुरूप पंचायती राज संस्थाओं को शत-प्रतिशत अधिकार और शक्तियां सौंपी गयी हैं. ये राज्य हैं हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल व सिक्किम, हालांकि इस मामले में झारखंड की स्थिति तुलनात्मक तौर पर बेहतर है.

इन विभागों का मिला अधिकार
राज्य में कृषि, पशुपालन, डेयरी व पॉल्ट्री, मत्स्य पालन, भूमि सुधार, लघु वन उत्पाद, लघु सिंचाई, जल प्रबंधन, जलछाजन विकास, सामाजिक व कृषि वानिकी, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित लघु उद्योग, सांस्कृतिक गतिविधियों, पेयजल, शिक्षा, परिवार कल्याण, स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सामाजिक कल्याण, अनुसूचित जाति व जनजाति सहित कमजोर वर्गों के कल्याण तथा महिला बाल विकास से संबंधित मामलों के अधिकार पंचायती राज संस्थाओं को हस्तांतरित कर दिये गये हैं. इनमें से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित लघु उद्योग, एससी-एसटी सहित कमजोर वर्गों के कल्याण और महिला बाल विकास से संबंधित मामलों के अधिकार बिहार ने अब तक पंचायती राज संस्थाओं को हस्तांतरित नहीं किये हैं.

अब भी कई विभागों का नहीं मिला अधिकार
ग्रामीण आवासन, बिजली वितरण सहित ग्रामीण विद्युतीकरण, गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोत तथा खादी, ग्रामीण और कुटीर उद्योग आदि ऐसे विभाग हैं, जिनका अधिकार पंचायती राज संस्थाओं को नहीं मिला है.

पंचायतों के विकास में पंचायत स्वयं सेवकों की भूमिका
सरकारी योजनाओं को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के उद्देश्य से राज्य में पंचायत स्वयं सेवकों की नियुक्ति की गयी है. राज्य के 4398 पंचायतों में 17,592 पंचायत स्वयंसेवकों की नियुक्ति हुई है. पंचायत स्वयं सेवक ग्राम पंचायत स्तर पर स्थानीय पढ़े-लिखे युवक एवं युवतियों का एक समूह है, जो गांवों में विकास कार्यों में तेजी लाने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं. ग्राम पंचायतों के विकास में आवश्यक सहयोग भी प्रदान करते हैं. इसमें चार सदस्य होंगे, जो मुखिया के पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण में काम करते हैं. इसका मुख्य कार्य ग्रामीणों को जागरूक व सहयोग करना, योजनाओं का डेटाबेस तैयार करना, विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं का मूल्यांकन करना मुख्य है.

बीआरजीएफ (बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड) योजना
देश के पिछड़े जिलों के विकास में क्षेत्रीय असंतुलन को सुधारने के लिए केंद्र सरकार, राज्‍य सरकारों को पिछड़े क्षेत्र अनुदान निधि (बीआरजीएफ) के अंतर्गत धन देती है. पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ) का उदेश्‍य विकास में क्षेत्रीय असंतुलन दूर करना है. स्‍थानीय बुनियादी ढांचा और अन्‍य विकास संबंधित आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए बीआरजीएफ के तहत 250 जिलों को चिह्नित किया गया है.

राष्‍ट्रीय ग्राम स्‍वराज योजना
राष्‍ट्रीय ग्राम स्‍वराज योजना एक केंद्र प्रायोजित योजना है. इसका उद्देश्‍य पंचायती राज संस्‍थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों में प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के लिए राज्‍य सरकारों के प्रयासों में सहायता करना है. पिछड़े क्षेत्र अनुदान निधि यानी बीआरजीएफ के अंतर्गत शामिल नहीं किये गये जिलों में पंचायती राज्‍य संस्‍थाओं को प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण के लिए राज्‍यों को धन दिया जाता है. इस योजना के तहत वित्तीय के लिए केवल गैर बीआरजीएफ जिले ही पात्र होते हैं. यह योजना मुख्य रूप से राज्‍यों/ संघ शासित प्रदेशों को पंचायती राज संस्‍थाओं के कार्यकर्ताओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के लिए सहायता प्रदान करने पर केंद्रित है. इसके अलावा निर्वाचित प्रतिनिधियों और पीआरआइ कार्यकर्ताओं के लिए दूरस्‍थ शिक्षा संबंधित बुनियादी सुविधा के लिए सहायता प्रदान करना है, जिसमें उपग्रह आधारित प्रशिक्षण सुविधा भी शामिल है.

डीएमएफटी से बदलेगी खनन क्षेत्र के गांवों की सूरत
खनन क्षेत्र के गांवों की सूरत बदलने के उद्देश्य से खनन विभाग ने डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) का गठन किया है. खनन क्षेत्र से मिलने वाली रॉयल्टी की राशि से गांव की सूरत बदलने की योजना है. इस योजना का लाभ खनन क्षेत्र में उड़ते धूलकण सिलिकोसिस जैसी लाइलाज बीमारी की चपेट में रहे खनिकों और आसपास के लोगों को मिलेगा, वहीं गांव का पर्यावरणीय विकास होने से उचित माहौल दिखेगा. खनन से प्राप्त रॉयल्टी का 30 फीसदी हिस्सा डीएमएफटी में जमा करने का प्रावधान है.

राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (सर्ड), झारखंड
ग्रामीण विकास में प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (एसआइआरडी), झारखंड एक सर्वोच्च संस्थान है. इसका मुख्य उद्देश्य अधिकारी और गैर अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान करना है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण विकास की प्रक्रिया में शामिल हैं. इसके अलावा इस संस्थान का मुख्य कार्य ग्राम पंचायत पर्यवेक्षकों, पंचायत सेवकों, दलपतियों आदि को भी प्रशिक्षण प्रदान करना है. प्रशिक्षण के तहत ग्रामीण आबादी की समस्याओं की बेहतर समझ के लिए सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण की समझ विकसित करना, ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के कुशल डिजाइनिंग, कार्यान्वयन, निगरानी और मूल्यांकन के लिए कौशल विकसित करना और सामुदायिक गतिशीलता तकनीकों के साथ ग्रामीण समुदाय को प्राप्त करना मुख्य है.

मनरेगा में ग्रामसभा की भूमिका
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा के तहत चलने वाले कार्यक्रमों की देखरेख की जिम्मेदारी ग्रामसभा को सौंपी गयी है. इस प्रक्रिया के लिए साल में ग्रामसभा की कम से कम दो बैठकें होनी आवश्यक हैं. मनरेगा के कार्यक्रम को सुचारु रूप से संचालन व ग्रामसभा की बैठकों को सुनिश्चित करने के लिए मंत्रियों और सरकारी पदाधिकारियों का पर्यवेक्षण भी होता रहता है. समय-समय पर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के मंत्री व अधिकारी गांवों का दौरा भी करते हैं. इससे भी ग्रामसभा सोशल ऑडिट का कार्य सुनिश्चित होता है.

 

पंचायत प्रतिनिधियों की अपनी पीड़ा
तीसरी सरकार के प्रतिनिधियों को नहीं मिलता सहयोग
पंचायती राज संस्थाओं के जनप्रतिनधियों की अपनी पीड़ा है. मंत्री और विधायकों के सहयोग के लिए आइएएस अधिकारी हैं, तकनीकी एक्सपर्ट की फौज है, बावजूद इसके शत प्रतिशत परिणाम सामने नहीं आते, वहीं तीसरी सरकार के प्रतिनिधियों के सहयोग के लिए कोई नहीं है. पंचायत सचिव व पंचायत स्वयं सेवकों की बहाली हुई है, लेकिन एक साथ कई पंचायतों का प्रभार होने के कारण इनसे भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता है.

आप इन बातों का रखें ध्यान, तो
बेहतर पंचायतें हो सकती हैं पुरस्कृत
अपने-अपने पंचायत क्षेत्रों में बेहतर काम करनेवाली पंचायतों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार पुरस्कृत करती है. यह पुरस्कार तीनों स्तर जिला, मध्यवर्ती और ग्राम पंचायतों को दी जाती है. इसके तहत दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तीकरण पुरस्कार, नानाजी देशमुख राष्‍ट्रीय गौरव ग्रामसभा पुरस्‍कार तथा एमजीएनआरइजीएस गतिविधियों के क्रियान्वयन में श्रेष्‍ठ कार्य के लिए ग्राम पंचायतों के लिए पुरस्कार मुख्य है. इसके लिए पंचायत जनप्रतिनिधियों को ऑनलाइन आवेदन करना होता है. मूल्यांकन के बाद पंचायतों का चयन होता है. ये पुरस्कार हर साल 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के अवसर पर दिये जाते हैं.

पुरस्कारों की श्रेणी
1.
दीन दयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तीकरण पुरस्कार (डीडीयूपीएसपी)

सेवाओं व सार्वजनिक वस्तुओं के वितरण में सुधार तथा अच्छे कार्यों के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है. इसके तहत सभी तीन स्तरों के सामान्य और विषयगत श्रेणियों को इसके अधीन रखा जाता है. विषयगत पुरस्कारों की श्रेणियों में कुल पीएसपी पुरस्कारों में से एक-तिहाई का प्रस्ताव है. नौ विषयगत श्रेणियों स्वच्छता, नागरिक सेवाएं (पेयजल, सड़क, प्रकाश, बुनियादी ढांचा), प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, महिला, अनुसूचित जाति/जनजाति, विकलांग, वरिष्ठ नागरिक, सामाजिक क्षेत्र के प्रदर्शन, आपदा प्रबंधन, ग्राम पंचायत की सहायता करने के लिए स्वैच्छिक कार्य करनेवाले व्यक्ति, सीबीओ राजस्व उत्पादन और ई-शासन में नवीनता मुख्य हैं. सामान्‍य विषय के पुरस्‍कारों के लिए 100 अंक सामान्‍य प्रश्‍नोत्‍तरी और 20 अंक विषयगत प्रश्नोत्तरी के लिए होते हैं.

2. नानाजी देशमुख राष्‍ट्रीय गौरव ग्रामसभा पुरस्‍कार (आरजीजीएस)
ग्राम पंचायतों को ग्रामसभा के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है. इसमें सामाजिक-आर्थिक विकास में उत्कृष्ट योगदान देने वाली ग्राम पंचायतों को पुरस्कृत किया जाता है.

3.
केवल ग्राम पंचायतों के लिए पुरस्कार

एमजीएनआरइजीएस गतिविधियों के क्रियान्वयन में बेहतर कार्य के लिए केवल ग्राम पंचायतों को पुरस्कार दिया जाता है. यह पुरस्‍कार पंचायती राज मंत्रालय की सिफारिश पर ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा दिया जाता है.

इन बातों का रखें विशेष ध्यान

पुरस्कारों के लिए पंचायतों को नामांकित करते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अनुसूची क्षेत्रों-V में ग्राम पंचायत और मध्यवर्ती पंचायतों को उसमें पंचायतों की संख्या के अनुपात में दर्शाया गया हो. राज्यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों को नामांकन करते समय यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों से पंचायत का प्रतिनिधित्व हो. एक जिले से मध्यवर्ती और ग्राम पंचायतों के नामांकन प्रत्येक में दो से अधिक नहीं होनी चाहिए.

कैसे करें आवेदन

तीनों स्तर यानी जिला, मध्यवर्ती और ग्राम पंचायत को पुरस्कारों के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होता है. हर साल सितंबर व अक्तूबर के मध्य ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है. पंचायती राज मंत्रालय के सत्यापन के बाद राज्य/ संघ राज्‍य क्षेत्र ऑनलाइन नामांकन जमा/अग्रेषित कर सकते हैं. पुरस्कार के दिशा निर्देशों और नामांकन करने की प्रक्रिया से संबंधित आवश्यक निर्देशों के बारे में अधिक जानकारी के लिए इच्छुक पंचायत जनप्रतिनिधि मंत्रालय की वेबसाइट http://panchayataward.gov.in की लिंक पर जाकर प्राप्त कर सकते हैं. ऑनलाइन नामांकन प्रारूपों को भरने में मदद के लिए राज्य के पंचायती राज विभाग के राज्य नोडल अधिकारी से भी संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा किसी तरह की कठिनाई होने पर पंचायती राज मंत्रालय के ई-मेल के पते awards-mopr@nic.in और panchayatawards@googlegroups.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

एक नजर इस पर भी
24
जिला
263
प्रखंड
4398
पंचायतें
54330
वार्ड सदस्य
5423
पंचायत समिति सदस्य
545
जिला परिषद सदस्य
2071
अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों की संख्या
131
पंचायत समितियां पूर्णरूप से अनुसूचित क्षेत्रों में
14
विभागों के 29 विषयों के कार्य, कोष व कर्मियों की जिम्मेवारी पंचायत प्रतिनिधियों को मिली
14
वें वित्त आयोग की राशि मिलती है पंचायतों में बुनियादी सेवाओं को मजबूत करने के लिए
04
स्वयं सेवकों का चयन हर ग्राम पंचायत में, जिसमें 25 फीसदी महिलाओं का प्रतिनिधित्व