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  • Jun 5 2019 4:14PM

बारिश की बूंदों को थामकर बनाइए पानीदार

बारिश की बूंदों को थामकर बनाइए पानीदार

समीर रंजन

झारखंड में अच्छी बारिश होती है. इसके बावजूद हमेशा गर्मी में पेयजल संकट गहरा जाता है. जल प्रबंधन के घोर अभाव के कारण पानी की किल्लत से लोगों को जूझना पड़ता है. ऐसे में बारिश की बेशकीमती बूंदों की मनुहार ही कमाल दिखा सकती है. बेहतर जल प्रबंधन से ही पानी का पहाड़ तैयार होगा और चप्पे-चप्पे पर पानी होगा. बारिश की बूंदों को थामकर उन्हें लंबे अरसे तक मेहमान बनाकर झारखंड को पानीदार बनाइए

जल प्रबंधन ही वक्त का तकाजा
झारखंड में पृथ्वी के नीचे बड़े इलाके में चट्टान है. बलुई क्षेत्र काफी कम है. राज्य के सिर्फ 15 ब्लॉक के बलुई इलाके में ही भूगर्भ जल पर्याप्त मात्रा में है. जिस तेज गति से पानी का दोहन किया जा रहा है, उस गति से पानी का संरक्षण नहीं किया जा रहा है. यही जल संकट की सबसे बड़ी वजह है. बड़ी मात्रा में बारिश का कीमती पानी यूं ही बर्बाद हो जाता है. जल प्रबंधन ही जल संकट का निदान है.

पानी की बूंदों को करें रिचार्ज
गांव हो या शहर. उसे पानीदार बनाने के लिए बारिश की बेशकीमती बूंदों को हर हाल में थामना होगा. गांवों में इन कीमती बूंदों को तालाबों, चेकडैम, डोभा एवं बोराबांध बनाकर रिचार्ज किया जा सकता है. शहरों में रिचार्ज पिट, रिचार्ज पॉन्ड एवं सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाकर बारिश के पानी को रिचार्ज करने से जलस्तर ऊंचा होगा. किसी भी क्षेत्र को पानीदार बनाने के लिए उस इलाके की निचली सतह पर पानी के रिचार्ज की व्यवस्था करनी चाहिए.

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ऐसे कीजिए वाटर रिचार्ज
शहरी क्षेत्रों में रिचार्ज पॉन्ड निचली सतहों में बनाना चाहिए, जहां चारों तरफ का पानी आकर जमा होता हो. रुफ टॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी काफी महत्वपूर्ण है. इससे छतों पर जमा बारिश का पानी बर्बाद नहीं होगा, बल्कि रिचार्ज होकर सतह को पानीदार बनायेगा. इसमें छत के पानी को डाउन पाइपलाइन के जरिये नीचे लाकर रिचार्ज पिट में गिराया जाता है. अपार्टमेंट्स में बोरवेल कर रिचार्ज पिट बनाएं, जबकि सामान्य घरों में सामान्य तरीके से भी रिचार्ज पिट बना सकते हैं.

ऐसे बनाइए रिचार्ज पिट
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फीट गहरा रिचार्ज पिट बनाने के लिए सबसे नीचे के 2 फीट तक बोल्डर डालेंगे. इसके बाद 2 फीट तक बजरी (ग्रेवल) डालेंगे. इसके बाद तीन फीट तक बालू रखा जाता है. शेष तीन फीट क्षेत्र खाली रहता है, ताकि बारिश का पानी छनकर नीचे जा सके.

सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाएं
बड़े-बड़े अपार्टमेंट्स में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाना चाहिए. अमूमन किचन और बाथरूम का पानी यूं ही बर्बाद हो जाता है. सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से पानी को फिल्टर कर किचन गार्डेन, कार वाशिंग एवं बाथरुम फ्लशिंग समेत अन्य कार्यों में उपयोग किया जा सकता है. पानी को रिसाइकिल करना बेहद जरूरी है.

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इन बलुई इलाके में है पर्याप्त भूजल
झारखंड के पांच जिले पूर्वी सिंहभूम, साहिबगंज, गोड्डा, पलामू एवं गढ़वा के 15 प्रखंड के बलुई क्षेत्र में पर्याप्त भूगर्भ जल है.

जिला                                                                        प्रखंड
पूर्वी सिंहभूम                                                          चाकुलिया व बहरागोड़ा
साहिबगंज                                                          साहिबगंज, राजमहल व उधवा
गोड्डा                                                               महगामा, मेहरमा व बोड़इजोर
पलामू                                                         डाल्टनगंज, हैदरनगर, लेस्लीगंज व पांकी
गढ़वा                                                                  गढ़वा, कांडी व केतार

राज्य में 5.99 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध
झारखंड में 5.99 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध है. गुमला जिले में सर्वाधिक और कोडरमा में सबसे कम भूगर्भ जल है.

जिलावार पानी की उपलब्धता

जिला                                             भूगर्भ जल (हेक्टेयर मीटर)
गुमला                                                              47,368
गिरिडीह                                                           42,332
रांची                                                                40,314
हजारीबाग                                                         34,225
पलामू                                                               33,134
चतरा                                                               30,384
दुमका                                                               30,154
पूर्वी सिंहभूम                                                        29,583
सिमडेगा                                                            29,324
कोडरमा                                                               8936

खाली कोयला खदानों के पानी का हो सदुपयोग
झारखंड के चार जिले बोकारो (बेरमो, चंद्रपुरा), धनबाद (बाघमारा,धनबाद, झरिया), रामगढ़ (रामगढ़, पतरातू. मांडू) और रांची (खलारी) की कोयला खदानों से कोयले के लिए बड़ी मात्रा में पानी निकाले जा रहे हैं. ये यूं ही बर्बाद हो रहा है. खाली कोयला खदानों में काफी पानी पड़ा हुआ है, जो उचित संरक्षण के अभाव में कई बीमारियों को दावत दे रहा है. बेहतर जल प्रबंधन किया जाये, तो पेयजल के साथ-साथ कृषि कार्यों में भी इसका पानी कारगर साबित होगा.

12 जिलों का पानी है मीठा जहर
राज्य में 12 जिलों के कुछ प्रखंड का पानी मीठा जहर यानी फ्लोराइड और आर्सेनिक युक्त है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. साहिबगंज जिले के साहिबगंज, राजमहल व उधवा ब्लॉक के कुछ इलाके के पानी में गंगा नदी के कारण आर्सेनिक है.

फ्लोराइड प्रभावित जिले और प्रखंड
जिला                                                                               प्रखंड
बोकारो                                                          चास, चंदन कियारी व पेटरवार
धनबाद                                                                    झरिया व बलियापुर
गढ़वा  गढ़वा, नगर उंटारी, रंका, रमकंडा, चिनिया, मेराल, डंडई, कांडी, मझिआंव, भंडरिया,                                                                                   भवनाथपुर, धुरकी व रमना
गिरिडीह                                                            गिरिडीह, खिजिरी व तिसरी
गोड्डा                                                गोड्डा, बोरजोरी, पथरगामा, महगामा व परजाहाट
गुमला                                                चैनपुर, गुमला, सिसई, घाघरा, बिशुनपुर व डुमरी
कोडरमा                                            कोडरमा, सतगावां, चंदवारा, जयनगर व मरकच्चो
पाकुड़                                                        पकुड़िया, अमरापाड़ा व लिट्टीपाड़ा
पलामू       विश्रामपुर, चैनपुर, मेदिनीनगर (डाल्टनगंज), सतबरवा, छतरपुर, मनातू, जपला,                                                                 लेस्लीगंज, पांकी, पाटन, पांडू व हरिहरगंज
रांची                                                                        ओरमांझी, सिल्ली व नामकुम
साहिबगंज                                                        साहिबगंज, बरहेट, बोरियो व राजमहल
खूंटी                                                                      मुरहू, कर्रा व तोरपा

2022 तक हर घर तक पहुंचेगा शुद्ध पानी
राज्य में हर घर तक शुद्ध पानी पहुंचे, इसके लिए राज्य सरकार प्रयासरत है. पहले 12 फीसदी लोगों के घरों में पेयजल पहुंचता था. अब 32 फीसदी को मिल रहा है. वर्ष 2020 तक 50 फीसदी और 2022 तक शत-प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है.

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रोजाना प्रति व्यक्ति 55 लीटर पानी की जरूरत
पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, झारखंड के मुताबिक राज्य में प्रति व्यक्ति रोजाना 55 लीटर पानी की जरूरत है, लेकिन विभिन्न स्रोतों से प्रति व्यक्ति रोजाना 40 लीटर पानी उपलब्ध हो पा रहा है.

आदिम जनजाति टोलों में पेयजलापूर्ति
झारखंड में आदिम जनजातियों के 2250 टोले हैं. पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की लघु पेयजल योजना के तहत इन टोलों को शुद्ध पानी देने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं.

बारिश में वृद्धि
सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट 2016-2017 के आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में हर साल औसतन 1251.2 मिलीमीटर बारिश होती है. वर्ष 2016-17 से पहले यह आंकड़ा औसतन 1187 मिलीमीटर प्रतिवर्ष था.

बारिश का पानी रोककर करें रिचार्ज : टीबीएन सिंह
केंद्रीय भूगर्भ जल बोर्ड के वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक टीबीएन सिंह कहते हैं कि झारखंड में अच्छी बारिश होती है. इसके बाद भी गर्मी के दिनों में पेयजल को लेकर हाहाकार मचा रहता है. वजह साफ है कि बारिश की कीमती बूंदों को सहेजने की बजाय उसे यूं ही बर्बाद होने देते हैं. गांव हो या शहर, बेहतर जल प्रबंधन कर राज्य को पानीदार बना सकते हैं. पानी को रिचार्ज करना जरूरी है. इसके लिए बारिश के पानी को हर हाल में लंबे अरसे तक रोकना होगा. खाली पड़ी कोयला खदानों के पानी का ट्रीटमेंट कर सदुपयोग किया जा सकता है. झारखंड के 12 जिलों के आर्सेनिक व फ्लोराइड प्रभावित इलाके के लोगों को मीठा जहर पीने से परहेज करना चाहिए.

जल प्रबंधन में राज्य बनेगा रोल मॉडल : रघुवर दास
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि जल है, तो जीवन है. पानी की हर बूंद से जीवन की डोर बंधी है. आइए संकल्प लें, पानी की बर्बादी को रोकेंगे. अपना भविष्य सुरक्षित बनायेंगे. झारखंड में पर्याप्त मात्रा में बारिश होती है. जरूरत है बारिश के पानी को संचय करने की. सरकार इस दिशा में माइक्रो लेवल प्रोजेक्ट बनाकर कार्यान्वित कर रही है. जल प्रबंधन में राज्य रोल मॉडल बनेगा.