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  • Jun 25 2019 6:13PM

श्रीविधि से लगाएं धान, बढ़ेगी पैदावार

श्रीविधि से लगाएं धान, बढ़ेगी पैदावार

अरबिंद कुमार मिश्रा

झारखंड में धान एक महत्‍वपूर्ण खाद्यान्न है. इसलिए इसके उत्पादन पर किसान अधिक जोर देते हैं. पहले पारंपरिक तरीके से ही धान की खेती की जाती थी, लेकिन अधिक पैदावार के लिए अब किसान वैज्ञानिक पद्धति से धान की खेती कर रहे हैं. इस दिशा में श्रीविधि तकनीक किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है.

श्रीविधि तकनीक को जानिए
सघन धान प्रणाली यानी श्रीविधि एक ऐसी तकनीक है, जिसमें कम पानी में धान का अच्छा उत्पादन संभव है. श्रीविधि को मेडागास्कर विधि के नाम से भी जाना जाता है. इस विधि की खोज अफ्रीकी देश मेडागास्कर में 1983 में फादर हेनरी डी लाउलेनी ने की थी. इसमें पौधे की जड़ों में नमी बरकरार रखना ही पर्याप्त होता है, जबकि पारंपरिक तकनीक में धान के खेत में स्थिर पानी का रहना जरूरी है. इस तकनीक से धान की खेती में जहां भूमि, श्रम, पूंजी और पानी कम लगता है, वहीं उत्पादन 300 प्रतिशत तक ज्यादा मिलता है. इस तकनीक में प्रचलित किस्मों का ही उपयोग कर उत्पादकता बढ़ायी जा सकती है. भारत में यह तकनीक व्यावहारिक तौर पर वर्ष 2002-03 में शुरू हई.

पारंपरिक और श्रीविधि तकनीक में अंतर
श्रीविधि तकनीक पांच सिद्धांतों पर काम करती है, जो अन्‍य पारंपरिक तकनीकों से बिल्कुल अलग है.
1.
कम समय का बिचड़ा खेत में लगाना है. बिचड़ा कम से कम 8 से 12 दिन का होना चाहिए, जबकि पारंपरिक तरीके में बिचड़े लगभग 21 दिनों के होते हैं
2.
खेत में कदवा करने की जरूरत नहीं
3.
रोपाई में दो बिचड़ों के बीच अधिक जगह छोड़ी जाती है
4.
बाली आने तक खेत में बारी-बारी से नमी और सूखा रखा जाता है, जबकि पारंपरिक तकनीकों में कम से कम 1 से 3 सेंटीमीटर तक खेत में पानी रहना जरूरी है
5.
जैविक खाद का प्रयोग

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श्रीविधि से ऐसे करें धान की खेती
1.
नर्सरी की तैयारी : सबसे पहले धान के बिचड़े के लिए नर्सरी तैयार की जाती है, जो जमीन से कम से कम चार इंच ऊंचाई पर हो. नर्सरी के चारों किनारे नाली का निर्माण करना चाहिए. नर्सरी को गोबर का खाद या केंचुआ खाद डाल कर भूरभूरा करना जरूरी है. नर्सरी की सिंचाई करने के बाद उसमें उपचारित बीज को दो किलोग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए. यह ध्‍यान रहे कि धान की किस्‍में प्रचलित और स्‍वस्‍थ्‍य हों.

2. खेत की तैयारी : श्रीविधि से खेती के लिए खेत की तैयारी पारंपरिक तकनीक से ही करनी है. बस इसमें ध्‍यान रखना है कि खेत समतल हो. बिचड़ा रोपाई से पहले 10 गुना 10 इंच की दूरी पर खेत में निशान लगाया जाता है. ध्‍यान रहे निशान रोपाई से छह घंटे पहले कर लेना है. तैयार खेत में बिचड़े की रोपाई चौकड़ी में करनी है. कतार एवं पौधों के बीच की दूरी 20 सेंटीमीटर x 15 सेंटीमीटर रखते हुए एक स्थान पर केवल एक या दो बिचड़े की रोपाई करनी है.

3. खर-पतवार नियंत्रण : इस विधि में खर-पतवार नियंत्रण हस्‍तचालित वीडर से किया जाता है. वीडर चलने से खेत की मिट्टी हलकी होती है, जिससे हवा का आवागमन आसानी से हो पाता है और पौधे का बढ़वार सही से होता है.

4. सिंचाई प्रबंधन : इस विधि में अन्‍य पारंपरिक तकनीकों की तुलना में बहुत कम पानी की आवश्‍यकता होती है. इसमें पौधे को उतना ही पानी चाहिए, जितने में नमी बनी रहे.

5. रोग एवं कीट प्रबंधन : इस विधि में धान में रोग होने की गुंजाइश बहुत कम होती है. ऐसा इसलिए क्‍योंकि एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच बहुत ज्‍यादा दूरी होती है. इसके साथ ही जैविक खाद देने से भी रोग की आशंका बहुत कम हो जाती है.

श्रीविधि से धान की खेती है लाभकारी
श्रीविधि से धान की खेती बेहद लाभकारी है. इसमें कम पूंजी, श्रम, भूमि और पानी की आवश्यकता होती है. इसमें लागत कम पड़ती है. बीज कम लगता है. अन्य पारंपरिक तकनीकों की तुलना में श्रीविधि से धान की ऊपज दोगुनी ली जा सकती है. इसमें कम समय का बिचड़ा लगाया जाता है. बिचड़ा मिट्टी के साथ लगाने से जड़ों के टूटने की संभावना कम होती है. बिचड़े अधिक दूरी में लगाने से पौधे की बढ़वार अच्‍छी होती है और रोग व कीटों का प्रकोप नहीं के बराबर होता है.

श्रीविधि से धान की अच्छी उपज : रीतेश दीपक
रांची जिला अंतर्गत पिठोरिया के प्रगतिशील किसान रीतेश दीपक कहते हैं कि श्रीविधि से उन्‍हें काफी लाभ मिला है. उन्होंने इसे आजमाने के लिए एक एकड़ में धान की खेती की थी. इससे आश्‍चर्यजनक परिणाम सामने आया. पारंपरिक तकनीक की तुलना में इससे उत्‍पादन में काफी अंतर आया. खेती करने में बीज कम लगा. लागत में कमी आयी. खेत में अधिक पानी की जरूरत नहीं पड़ी. रासायनिक खाद से भी छुटकारा मिला और आखिरकार धान की अच्छी उपज मिली. श्रीविधि किसानों के लिए वरदान है.