aamukh katha

  • Apr 16 2019 5:09PM

अब चूल्हा नहीं उगलता धुआं, जल्दी पकती है रोटी

अब चूल्हा नहीं उगलता धुआं, जल्दी पकती है रोटी

सीपी सिंह
जिला: बोकारो

बोकारो को रामगढ़ से जोड़नेवाले नेशनल हाइवे से महज चार किलोमीटर की दूरी पर है संथाल सिजुआ गांव. इस गांव में प्रवेश करने पर सरकार की ओर से लागू योजना की झलक दिखने लगती है. एक बदलाव जो गांव को बदल रहा है, उसे देखने के लिए घर के किचेन में झांकना होगा. जमीन से छत तक जलावन की लकड़ी से भरा रहनेवाला रसोईघर अब खाली-खाली सा दिखता है. दिखाई पड़ती है, तो लाल रंग का सिलिंडर, चूल्हा और पकाने की सामग्री. यह परिवर्तन हुआ है प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के कारण. गांव के लगभग सभी परिवार को योजना का लाभ मिला है. गांव में अधिकतर लोगों के पास आय का बहुत बड़ा स्त्रोत नहीं है. खेती, दिहाड़ी व प्राइवेट जॉब कर जीवन यापन करते हैं. यहां अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय के लोगों की संख्या अधिक है. गांव में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने आर्थिक उन्नति का रास्ता भी खोला है. कई महिलाएं योजना का लाभ लेकर किचेन का समय बचाती हैं और उसका उपयोग वह स्वयं सहायता समूह के लिए करती हैं. महिलाएं बताती हैं कि समूह से पहले भी जुड़ी थीं, लेकिन समय के अभाव में काम नहीं कर पाती थीं. अब ऐसा नहीं है. आय का रास्ता खुला है.

बर्तन धोना हुआ आसान
लाभुक महिलाएं एक स्वर में कहती हैं कि किचेन में प्रवेश करने व निकलने से पहले बर्तन बुनियादी जरूरत है. कोयला, लकड़ी या गोइठा से खाना पकाने के पहले बर्तन पर मिट्टी का लेप लगाना पड़ता था, ताकि बर्तन पर काली परत नहीं जमे. बर्तन की सफाई करने में काफी परेशानी होती थी. गैस से खाना पकाने से अब इससे राहत मिल गयी है. अब चूल्हा धुआं नहीं उगलता है और रोटी भी जल्दी पक जाती है.

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588 लाभुकों को मिला गैस कनेक्शन : सुनीता देवी
मुखिया सुनीता देवी कहती हैं कि क्षेत्र की 588 लाभुकों को गैस कनेक्शन दिया गया है. शुरुआत में रिफिलिंग की संख्या बहुत कम थी. जैसे ही कुछ महिलाओं ने इसका फायदा समझा, रिफिलिंग की संख्या में वृद्धि होने लगी.

महिलाओं ने बताया : पैसा हर जगह मायने नहीं रखता
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समय के साथ सोच बदली : कांति देवी
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वर्षीया कांति देवी के घर 14 महीने पहले गैस सिलिंडर व चूल्हा आया है. बताती हैं कि शुरू में गैस चूल्हे का इस्तेमाल करने से डर लगता था. उन्होंने सोचा कि योजना का लाभ मिल गया है, लेकिन वह पुराने ढर्रे पर ही काम करेंगी. समय के साथ सोच बदली. पैसा तो बचा रही थी, लेकिन थकावट बढ़ रही थी. आखिरकार गैस पर ही खाना पकाने का फैसला किया. इससे समय बचने लगा. थकावट कम होने लगी. शरीर स्वस्थ्य होगा, तो पैसा की कौन परवाह करता है.

2. वर्तमान को सुरक्षित व भविष्य को मजबूत करती है यह योजना : रंभा देवी
गांव की बहू रंभा देवी बताती हैं कि शादी होकर जब यहां आयीं, तो सबसे ज्यादा परेशानी खाना पकाने में होती थी. लकड़ी व कोयले पर खाना पकाने के कारण धुएं से आंख जलती थी. पूरा दिन खाना पकाने में ही निकल जाता था. एक साल पहले गैस कनेक्शन मिला. इसके बाद आराम ही आराम है. मुश्किल से दो घंटे में तीनों वक्त का खाना पक जाता है. शेष समय में बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देती हैं. यह योजना वर्तमान को सुरक्षित व भविष्य को मजबूत बनाने वाली है.

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3. महिलाओं के लिए वरदान है योजना : सुमित्रा देवी
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वर्षीया सुमित्रा देवी गांव की बहू हैं. कहती हैं कि भले ही योजना रसोईघर से सीधा संबंध रखती हो, लेकिन यह महिलाओं को किचेन से बाहर आने का वक्त दे रही है. एक और बड़ी बात कि पहले असमय कोई आता था, तो चाय बनाने के लिए भी घंटों मेहनत करनी पड़ती थी. अतिथि के बदले रसोईघर को ही समय देती थीं. अब ऐसा नहीं है. अब तो टीवी देखने और टहलने का भी मौका मिलता है. महिलाओं के लिए तो ये वरदान है.

4. घर-परिवार चलाना हुआ आसान : उपासी देवी
उपासी देवी बताती हैं कि छह महीना पहले कनेक्शन मिला. अभी तक चार बार सिलिंडर रिफिल करा चुकी हैं. ये सही है कि पैसा लगता है. बजट भी पहले से बढ़ा है, लेकिन जो सहूलियत-सुविधा मिली है, उसके आगे पैसा ज्यादा मायने नहीं रखता. एक लाइन में कहें तो हम जैसी औरतों की जिंदगी बढ़ गयी है. कहती हैं कि पहले किचेन का काम बोझ लगता था. अब भार कम हुआ है. अब परिवार को समय देना आसान हो गया है. इससे घर-परिवार चलाना आसान हुआ है.

5. अब काम होता है झटपट : काजल देवी
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वर्षीया काजल देवी बताती हैं कि पहले रसोईघर से बाहर निकलना मुश्किल था. किचेन का काम उबाऊ व थकाऊ होता था. शरीर इतना थक जाता था कि किचेन से बाहर निकलने के बाद कोई दूसरा काम ध्यान में ही नहीं रहता था. 10 महीना पहले गैस कनेक्शन मिला. आर्थिक रूप से थोड़ी परेशानी जरूर हुई है, लेकिन शारीरिक व मानसिक शांति मिली है. अब यह टेंशन नहीं है कि रात में कोई आ गया, तो खाना कैसे बनेगा. अब काम झटपट होता है.