aamukh katha

  • Aug 19 2019 4:17PM

शराबबंदी : महिलाओं ने किया जड़ पर वार, खुल गये तरक्की के द्वार

शराबबंदी : महिलाओं ने किया जड़ पर वार, खुल गये तरक्की के द्वार

पंचायतनामा टीम 

घर, गांव या समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ जब भी महिलाएं मोर्चा खोलती हैं तो सफलता तय है. आरा-केरम की महिलाओं ने भी इसे साबित कर दिया है. आज से तीन साल पहले इस गांव की तस्वीर बिल्कुल अलग थी. शराब के नशे में ग्रामीण चूर रहते थे. चाहे-अनचाहे महिलाएं और बच्चे इसका दंश झेलने को विवश थे. उनका विकास रुका हुआ था. वर्ष 2016 में जंगल बचाने के बहाने जनजागरूकता से महिलाओं की चेतना जगी और नशामुक्ति अभियान चलाना शुरू किया. यह काम आसान नहीं था, लेकिन महिलाओं ने जिद व संघर्ष के बलबूते गांव को नशामुक्त बना कर विकास के द्वार खोल दिये. आज राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान बन गयी है

नशे में चूर रहने वाले अब छूते तक नहीं
शराबबंदी के लिए महिलाएं घर के बाहर निकलीं. हर उस घर में गयीं, जहां शराब बनती थी. पहले तो बात मान-मनौव्वल से शुरू हुई, पर जब शराब बनाने वाली महिलाएं नहीं मानीं, तो महिलाओं ने बल प्रयोग भी किया. शराब बनाने वाले बर्तनों को तोड़ दिया. शराब बनाने की सामग्री को नष्ट कर दिया गया. कितनी महिलाओं ने अपने रोजगार की दुहाई दी, पर शराब का दंश रोजगार के दंश के सामने काफी छोटा पड़ गया. शराब बनाने और सेवन करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाने लगी. आखिरकार शराब बेचने वाली महिलाएं मान गयीं. अब शराब बनाना व बिक्री का काम बंद हो गया. मनरेगा के जरिये ग्रामीणों के लिए वैकल्पिक और स्थाई रोजगार से जोड़ने के पहल की गयी. लगभग एक वर्ष के प्रयास के बाद शराब पर प्रतिबंध लग गया. अब कोई शराब नहीं पीता. गांव नशामुक्त बन गया.

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सालाना 18 लाख की शराब पीते थे ग्रामीण
ग्रामीणों की मानें, तो एक वर्ष में वे लगभग 18 लाख रुपये की शराब पीते थे. शराबबंदी के बाद गांव में 18 लाख रुपये की बचत हुई. शराब छोड़ने के बाद महिलाएं और पुरुष अपनी जिम्मेदारियों को लेकर जागरूक हुए और आजीविका को लेकर विचार विमर्श करने लगे.

कभी साइकिल होती थी, आज है कार, बोलेरो
उन्नत कृषि की ओर ग्रामीणों का रूझान बढ़ा. गौपालन, बकरी पालन, सूकर पालन करने लगे. इससे धीरे-धीरे गांव में समृद्धि आने लगी. पहले जहां ग्रामीण एक साइकिल खरीदने के लिए सोचते थे, आज गांव में 36 बाइक, एक बोलेरो, एक कार, 2 ट्रैक्टर और एक ऑटो है.

शराबबंदी से सबरू की बदल गयी जिंदगी
नशामुक्त होने के बाद गांव में दूध की बिक्री बढ़ गयी है. गांव के सबरू पाहन रोज सुबह की शुरूआत शराब से करते थे. हर वक्त नशे में रहते थे. शराबबंदी के बाद सबरू ने शराब छोड़ दिया और राजमिस्त्री का काम करने लगे. आज उनके पास एक मोटरसाइकिल है, परिवार के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं.

महिला समूह की ताकत से बदली तस्वीर
वर्ष 2016 में महिला समूह का गठन हुआ. हर रविवार को बैठक कर महिलाएं बचत करने लगीं. गांव, घर व समाज की बेहतरी की चर्चा करने लगीं. अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा और स्वच्छता पर जोर देने लगीं. महिलाओं की जागरूकता का असर हुआ कि सभी बच्चे स्कूल जाने लगे. उन्हें पौष्टिक भोजन मिलने लगा. स्वच्छ रहने लगे. महिलाओं ने खुद से बांस का कूड़ेदान बनाया. प्रमुख जगहों पर इसे रखा गया, ताकि खुले में कूड़ा नहीं फेंका जाये. बचत से कई बड़े कार्य किये जा रहे हैं. गांव में शौचालय बने और उसका इस्तेमाल भी ग्रामीणों ने करना शुरू किया. गांव से बीमारियां दूर होने लगीं. एक वक्त ऐसा भी था जब गांव में झोला छाप डॉक्टरों की चांदी रहती थी. साफ-सफाई के बाद दवा के पैसे भी बचने लगे.

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शराबबंदी से बदली किस्मत : सीमा देवी
सीमा देवी कहती हैं कि शराब से इस गांव को काफी नुकसान हुआ है. 6 लोगों की मौत हो चुकी है. आये दिन लड़ाई-झगड़े होते रहते थे. शराबबंदी के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी. महिला समूह के जरिये गांव की महिलाओं में बड़ा बदलाव आया. जो महिलाएं निरक्षर थीं, उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया गया. महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार आया. चौतरफा विकास हुआ है. ग्रामीणों की किस्मत बदल गयी है. आज गर्व होता है.

बचत से मिली नयी जिंदगी : रीना देवी
रीना देवी कहती हैं कि पहले घर में पैसे सिर्फ खाने-पीने में ही खत्म हो जाते थे. बुरे वक्त में पैसों की जरूरत पड़ने पर दूसरे के आगे हाथ फैलाना पड़ता था. महिला समूह से जुड़ने के बाद बचत करने से जिंदगी रोशन हो गयी है. समूह से 30 हजार रुपये लोन और 15 हजार लगाकर एक गाय खरीदीं. आज दूध बेचने से प्रतिमाह 5 हजार रुपये की कमाई हो रही है.

आरा-केरम के होने पर है गर्व : अनीता देवी
अनीता देवी कहती हैं कि शराबबंदी से पहले उनके घर में हर रोज कलह होता था. घर बर्बाद हो रहा था. शराबबंदी से घर में शांति है. घर में एकजुटता से समृद्धि आ रही है. महिला समूह से लोन लेकर सूकर खरीदीं. एक ऑटो भी ली हैं. बकरी पालन भी करती हैं. सपरिवार खुश हैं. आरा-केरम गांव के होने पर तब गर्व होता है, जब आस-पास के लोग तारीफ करते हैं.

जनसंख्या नियंत्रण को लेकर हुए जागरूक : शुभंती देवी
शुभंती देवी कहती हैं कि महिला समूह की ताकत और पुरुषों के सहयोग से गांव में बदलाव आया है. हर गुरूवार को महिला-पुरुष एक जगह पर बैठक करते हैं. इसके अलावा हम दो हमारे दो की तर्ज पर जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए सभी को जागरूक किया जाता है. सभी को बताया जाता है कि बेटा-बेटी एक समान हैं. सामूहिक प्रयास से तस्वीर बदली है.