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  • Aug 2 2018 11:13AM

वज्रपात : आसमान से गिरता आफत

वज्रपात : आसमान से गिरता आफत

 समीर रंजन

वज्रपात (ठनका) से हर साल राज्य में करीब दो सौ लोगों की जान जाती है. लोहा, तांबा जैसे खनिज से भरपूर होने के कारण राज्य में वज्रपात की घटनाएं अधिक घटती हैं. इसके लिए राज्य के 15 जिलों को गंभीर क्षेत्र माना गया है, जहां ठनका गिरने की घटना अधिक होती है. अगर लोगों के बीच जागरूकता हो, तो ठनका से होनेवाले नुकसान को कम किया जा सकता है

 

वज्रपात यानी आकाश से गिरता आफत. इस आफत की चपेट में न सिर्फ इंसान आते हैं, बल्कि पेड़-पौधों से लेकर पशु-पक्षी भी इसकी जद में आ जाते हैं. वज्रपात को स्थानीय भाषा में ठनका कहा जाता है. झारखंड में ठनका गिरने से हर साल करीब सौ लोगों की जान जाती है, वहीं काफी संख्या में जानवर भी मरते हैं. यह संख्या बढ़ती भी है, क्योंकि कई बार सुदूरवर्ती क्षेत्रों में घटित घटनाएं सामने नहीं आ पाती हैं. सर्वेक्षण के तहत वज्रपात से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों के लेवल एक में राज्य के 24 में से 15 जिले आते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में हर साल वज्रपात से करीब दो सौ लोग मारे जाते हैं, जो प्राकृतिक आपदा से मारे गये लोगों का 10 फीसदी है. इस घटना से प्रभावित लोगों के लिए मुआवजे की राशि में राज्य सरकार ने बढ़ोतरी की है. अब वज्रपात से अपनी जान गवांने वाले मृतक के आश्रित को चार लाख रुपये मुआवजा की राशि मिलेगी, जबकि पहले मात्र डेढ़ लाख रुपये ही थी. इसके अलावा बिजली गिरने से गंभीर व आंशिक रूप से झुलसे लोगों के लिए भी मुआवजा राशि और इलाज की उचित व्यवस्था समेत अन्य सामाजिक योजनाओं के तहत लाभ देने का प्रावधान है. वहीं, जानवरों के मरने पर भी मुआवजा की व्यवस्था है. राज्य में आपदा प्रबंधन विभाग का बजट करीब 714 करोड़ है. पर्यावरणविदों का मानना है कि राज्य में ठनका गिरने की घटनाओं में बढ़ोतरी से विभिन्न जगहों के वातावरण में ग्रीन हाउस गैस का जमाव हो रहा है. इससे पृथ्वी का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ने से 12 फीसदी अधिक बिजली गिरने की आशंका बढ़ जाती है. इस कारण विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोकना जरूरी है. साथ ही सड़क किनारे पेड़ों को लगाना भी आवश्यक है.

क्यों व कब गिरता है ठनका
राज्य की भौगोलिक परिस्थितियां, यहां की लहरदार पहाड़ियां, घने बरसाती जंगल, कम ऊंचाई वाले बादल और प्रचुर मात्रा में मौजूद खनिज संपदा के कारण वज्रपात होता है. राज्य में लोहा, तांबा जैसे खनिजों की भरमार के कारण यहां की जमीन आकाशीय बिजली को आकर्षित करती है. इसके अलावा जंगल और पहाड़ों के बीच होना भी एक कारण माना गया है. जून से सितंबर के महीने के बीच यहां वज्रपात होता है. खासकर मॉनसून के शुरुआत के समय खतरा सबसे अधिक रहता है. ठनका गिरने से सबसे अधिक मौत ग्रामीण क्षेत्रों में होती है, क्योंकि बारिश से बचने के लिए ग्रामीण ऊंचे पेड़ों के नीचे खड़े हो जाते हैं. इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित जलाशय और जंगल वज्रपात के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में जलाशय कम होते हैं और पेड़ों की संख्या भी कम होती है.

वज्रपात को लेकर राज्य को दो लेवल में बांटा गया है
पहले लेवल में राज्य के 15 जिले आते हैं, जहां वज्रपात गिरने की अधिक घटनाएं सामने आती है. वहीं, लेवल दो में राज्य के नौ जिले आते हैं, जहां लेवल वन की अपेक्षा कम वज्रपात होती है और जान-माल का नुकसान भी पहले की तुलना में कम होता है.

लेवल वन : पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, रांची, रामगढ़, पलामू, चतरा, लातेहार, कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग, लोहरदगा, दुमका, देवघर व खूंटी जिला.

लेवल टू : सिमडेगा, गुमला, गढ़वा, बोकारो, धनबाद, साहिबगंज, गोड्डा, पाकुड़ व जामताड़ा जिला.

पायलट प्रोजेक्ट की हुई थी शुरुआत
राज्य में बढ़ती वज्रपात की घटनाओं को देखते हुए सरकार ने उसकी निगरानी व निवारण के लिए पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी. इसके तहत बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के दिशा-निर्देश में वज्रपात का पता लगाने के लिए विभिन्न जिलों में केंद्र की स्थापना की गयी थी. इसके तहत पलामू जिले के चियांकी, पूर्वी सिंहभूम के दारीसाई, पश्चिमी सिंहभूम का जगन्नाथपुर व दुमका जिले में केंद्र की स्थापना हुई थी. इसके अलावा हजारीबाग जिले के गौरिया करमा में फील्ड यूनिट की स्थापना हुई थी. वर्तमान में ये केंद्र अधिक क्रियाशील नहीं दिखते हैं.

वज्रपात की रोकथाम के लिए बनी नियमावली
राज्य में वज्रपात की घटना पर रोकथाम के लिए राज्य सरकार ने नियमावली बनायी है. इसके तहत दो तल्ला से अधिक ऊंचाई की इमारतों में तड़ित चालक लगाना अनिवार्य है. साथ ही राज्य के सभी स्कूलों, सरकारी व सामुदायिक भवनों में तड़ित चालक यंत्र लगाना जरूरी है. हालांकि, राज्य में कई ऐसे स्कूल आज भी संचालित हैं, जहां तड़ित चालक लगा ही नहीं है.

ऐसे करें उपाय
वज्रपात से बचाव के लिए सुरक्षा मानकों को सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए रेडियो व टेलीविजन के द्वारा प्रचार किया जाना चाहिए. साथ ही बचाव के उपायों को लेकर नुक्कड़ नाटक करना और उनके बीच पर्चे भी बांटना चाहिए.

वज्रपात से बचने के उपायों का करें प्रचार-प्रसार : मुख्यमंत्री
राज्यभर में लगातार हो रहे वज्रपात की घटनाओं को लेकर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने लोगों को सतर्क रहने की अपील की है. लोगों को चाहिए कि बिजली कड़कने व चमकने की स्थिति में सतर्क व सुरक्षित रहें. इसके लिए आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन करें. साथ ही वज्रपात से बचने के उपायों का प्रचार-प्रसार करें.

मई, 2018 तक वज्रपात से 13 लोगों की मौत, 28 झुलसे
साल 2018 के मई महीने तक राज्य में वज्रपात से 13 लोगों की मौत हो चुकी है, वहीं 28 लोग बिजली गिरने से झुलस चुके हैं. जिलावार देखें, तो चतरा जिले में तीन लोगों की मौत हुई, वहीं रांची, रामगढ़ और पलामू में दो-दो लोगों की जान गयी. लातेहार, हजारीबाग, लोहरदगा और बोकारो में एक-एक लोगों की जान गयी.

आपदा प्रबंधन विभाग की चुस्ती नहीं दिखती
राज्य में आपदा प्रबंधन विभाग की चुस्ती नहीं दिखती. अब तक मात्र तीन बैठकें हुई हैं, वहीं साल 2016 के बाद से अब तक कोई बैठक नहीं हुई है. इस कारण वज्रपात से होनेवाली जान-माल की सही जानकारी नहीं मिल पाती है. स्थिति ये है कि आपदा प्रबंधन विभाग को गृह विभाग में ही समाहित किया गया है. गृह विभाग के सचिव ही आपदा प्रबंधन के भी सचिव हैं.

मुआवजे का प्रावधान
वज्रपात से हुई मौत पर मुआवजा का प्रावधान है. किसी की मौत होने पर उसके परिवार को चार लाख रुपये मुआवजा के तौर पर दिया जाता है, वहीं घायलों को 12 हजार से लेकर दो लाख तक की मुआवजा राशि दी जाती है. साथ ही मकान की क्षति से लेकर मृत पशुओं के आश्रितों को भी मुआवजा देने का भी प्रावधान है.

ठनका से मौत पर हाइकोर्ट भी गंभीर
ठनका गिरने की घटना को झारखंड हाइकोर्ट ने भी गंभीरता से लिया है. राज्य में वज्रपात से होनेवाली मौत व नुकसान पर संज्ञान लेते हुए हाइकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रदेश के सार्वजनिक स्थलों पर तड़ित चालक लगाने को कहा है. हाइकोर्ट के कहा कि हर साल कई लोग वज्रपात की चपेट में आकर असमय मौत के शिकार हो जाते हैं. इसलिए अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे प्लेटफार्म समेत अन्य जगहों पर तड़ित चालक लगाना चाहिए.

मुआवजा के लिए करें दावा
ठनका गिरने व उससे होनेवाले नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने मुआवजा राशि निर्धारित की है, लेकिन आज भी लोगों को मुआवजा लेने के तरीके की जानकारी नहीं है. खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाले ग्रामीणों को समुचित जानकारी नहीं है. अगर ठनका गिरने से किसी की मौत हो जाती है, तो सबसे पहले आप उसकी सूचना अपने पंचायत प्रतिनिधियों को दें. इसके बाद पंचायत जनप्रतिनिधि के माध्यम से संबंधित थाना व प्रखंड के अधिकारी को सूचित किया जाता है. मृतक का पोस्टमार्टम जरूर कराएं, क्योंकि अगर बिना पोस्टमार्टम का ही अंतिम संस्कार होता है, तो सरकार की ओर से मिलनेवाली मुआवजा राशि का लाभ नहीं मिल पायेगा. वहीं घायलों को तुरंत अस्पताल लेकर जाएं, ताकि उचित कदम उठाया जा सके और पीड़ित परिवार को मदद की जा सके. ठनका गिरने की स्थिति में प्रभावित व्यक्ति या परिजन थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने की प्रति व पोस्मार्टम रिपोर्ट की प्रति के साथ अपने क्षेत्र के अंचल कार्यालय में आवेदन कर सकते हैं. अंचलाधिकारी मामले की जांच करने के बाद जिले के अपर समाहर्ता को रिपोर्ट सौंपते हैं. अपर समाहर्ता उपायुक्त के माध्यम से आपदा प्रबंधन विभाग को राशि आवंटित करने का आग्रह करते हैं. उसके बाद विभाग से आवंटित राशि संबंधित लाभुक तक पहुंचायी जाती है.

मुआवजे की राशि
राज्य आपदा मोचन निधि के तहत ठनका गिरने से प्रभावित लोगों को मुआवजा देने का प्रावधान है.
मौत होने पर चार लाख रुपये ( आश्रित को)
घायल होने पर 4300 से दो लाख रुपये तक
घर नष्ट होने पर 95 हजार से लेकर एक लाख तक
झोपड़ी नष्ट होने पर 4100 रुपये
गाय-भैंस की मौत पर 30,000 रुपये (प्रति पशु)
बैल-भैंसा के मौत पर 25,000 रुपये (प्रति पशु)
भेड़-बकरी की मौत पर 3000 रुपये (प्रति पशु)

तड़ित अवरोधक है कारगर
तड़ित चालक के अलावा एक अन्य उपकरण है तड़ित अवरोधक. तड़ित अवरोधक आकाशीय बिजली के धरती पर गिरने की तीव्रता को क्षेत्र विशेष में शून्य करता है. यह टीवी एंटिना की तरह ही होता है.