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  • Oct 3 2019 1:15PM

परंपरागत तरीके से कपड़े बुनते हाजी शहादत अंसारी

परंपरागत तरीके से कपड़े बुनते हाजी शहादत अंसारी

पवन कुमार
रांची

रांची जिले के मांडर प्रखंड अंतर्गत एक गांव है कनभिट्ठा. कभी इस गांव में लगभग 70 परिवार बुनकर के पेशे से जुड़े थे. धीरे-धीरे समय बदला. रेडीमेड कपड़ों की मांग बढ़ने लगी. इससे बुनकरों का काम प्रभावित होने लगा. 70 परिवार की जगह अब इस गांव में मात्र एक परिवार ही बचा है, जो परंपरागत तरीके से कपड़े बुनने के काम में लगा है. इस गांव में करीब 250 घर और करीब 1200 आबादी है. परंपरागत तरीके से कपड़े बुनने में आज भी लगे हाजी शहादत अंसारी कहते हैं कि मशीन से सिले कपड़ों के आगे हम नहीं टिक पा रहे हैं. फिर भी विरासत के काम को आगे बढ़ा रहे हैं. परंपरागत तरीके से आज भी वो आदिवासी पुरुषों के वस्त्र करया के अलावा ठठरा, गतला, पगा (पगड़ी) आदि को बनाते हैं. कहते हैं कि इससे पहले यहां के बुनकर बेडशीट, गमछा और लालपाड़ साड़ी भी बनाते थे, लेकिन आधुनिक तकनीक से बने इन कपड़ों के कारण हमारे बनाये गये कपड़ों की मांग नहीं के बराबर है.

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पुश्तैनी काम को बढ़ा रहे आगे
70
वर्षीय हाजी शहादत अंसारी कहते हैं कि उन्होंने आज भी अपने पुश्तैनी काम को जिंदा रखा है. घर में पांच बेटे और पत्नी के सहयोग से वो काम करते हैं. कहते हैं कि उनके बाप-दादा ने उन्हें यह हुनर सिखाया है. अपने पांच बेटों को भी उन्होंने यह काम सिखाया है. सिर्फ इसी काम की बदौलत चार बेटियों की शादी की. पांच बेटों को 10वीं पास कराया और उनकी शादी की. बेटे कपड़ा बुनने के अलावा दूसरा काम भी करते हैं. फिलहाल हाजी शहादत अंसारी सिर्फ ठठरा, गतला, करया और पगा बनाते हैं. रांची से लेकर लोहरदगा तक इनके बनाये कपड़े जाते हैं. आदिवासी पर्व-त्योहारों में इनके यहां पहले से ही कपड़ा बनाने का ऑर्डर मिल जाता है. एडवांस में पैसे भी मिल जाते हैं. एक कपड़ा बनाने में जितनी लागत और मेहनत लगती है, मुनाफा उतना नहीं होता है. हैंडलूम मशीन में काम करने के लिए दो से तीन लोगों की जरूरत पड़ती है. कपड़ा बनाने के लिए सूता रांची के अपर बाजार से खरीद कर लाते हैं.

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दूर होती युवा पीढ़ी
बुनकरी का काम महज एक घर तक सिमटने की वजह शिक्षा है. ग्रामीण शफीउल मजीद कहते हैं कि जैसे-जैसे युवा पीढ़ी शिक्षित होती गयी, रोजगार के दूसरे साधन बनते गये. लोग इस धंधे से दूर होते गये. अब तो नयी पीढ़ी इस काम को करना ही नहीं चाहती है, क्योंकि यह काफी मेहनत वाला काम होता है. जितनी मेहनत होती है, उतनी कमाई नहीं होती है.

सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है यह काम : हाजी शहादत अंसारी
हाजी शहादत अंसारी कहते हैं कि अगर परंपरागत तरीके से कपड़े नहीं बनायेंगे, तो आदिवासी समुदाय के लोग अपने पर्व-त्योहार में कहां से कपड़े पहनेंगे. कम से कम रांची से लेकर लोहरदगा तक के लोग मेरे द्वारा बनाये इस कपड़े को खरीदते हैं. इस काम के माध्यम से हमारी परंपरा को मजबूती मिल रही है, लेकिन एक टीस भी है कि अच्छा मुनाफा नहीं मिलता. खुशी इस बात की है कि पुश्तैनी काम होने के कारण संतुष्टि मिलती है.

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सरकारी सहयोग से बचेगा पेशा : शफीउल मजीद
ग्रामीण शफीउल मजीद ने कहा कि उन्होंने वो दौर भी देखा, जब कपड़ा बुनने का काम गांव में फलफूल रहा था. फिर धीरे-धीरे इस काम में गिरावट आयी. आज वो समय है, जब मात्र एक परिवार ही इस काम में लगा है. इस काम के लिए अगर सरकारी सहयोग मिले, तो यह कुटीर उद्योग आगे बढ़ेगा. आधुनिक मशीनों के दौर में हस्तचालित मशीनों से मुकाबला मुश्किल है.

इस काम में मेहनत अधिक : रबीना खातून
रबीना खातून चरखा चलाकर धागा को एक विशेष प्रकार की लकड़ी में लपेटने का काम करती हैं, जिसे हैंडलूम मशीन में कपड़ा बुुनने के लिए लगाया जाता है. कहती हैं कि शादी के बाद जब इस घर में आयी हैं, तब देखते-देखते यह काम सीख गयीं. घर का काम है, करने में परेशानी नहीं होती, लेकिन इस काम में मेहनत अधिक है. मेहनत के मुताबिक कमाई नहीं है. यही कारण है कि नयी पीढ़ी इस पेशे से दूर होती जा रही है.