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  • Mar 15 2018 5:15PM

खूंटी जिले के रोंगो गांव के कई बच्चे आज भी हैं लापता

खूंटी जिले के रोंगो गांव के कई बच्चे आज भी हैं लापता

पवन कुमार 

ग्राम : रोंगो
पंचायत : दिगड़ी
जिला : खूंटी

खूंटी जिला मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर दूर दिगड़ी पंचायत का एक गांव है रोंगो. बुनियादी सुविधाओं से वंचित इस गांव में रोजी-रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं है. ग्रामीणों की माली हालत खराब होने के कारण वे दूसरी जगह जाने को विवश हैं. आज भी गांव की लगभग 30 से अधिक युवतियां दिल्ली में हैं. खेती-बारी करने के बाद युवक काम करने के लिए गुजरात, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों का रुख करते हैं. ग्रामीणों की खराब आर्थिक स्थिति का फायदा मानव तस्कर उठाते हैं और प्रलोभन देकर यहां की बच्चियों को महानगरों में ले जाते हैं.



गांव में नहीं है रोजी-रोजगार

गांव में नालियां तो हैं, लेकिन पक्की सड़कें नहीं है. प्राथमिक स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र है, लेकिन ड्रॉप आउट रेट शून्य नहीं है. लोगों को रोजगार देने वाली सरकारी योजना मनरेगा की हालत भी काफी बुरी है. यहां के अधिकांश लोग आजीविका के लिए खेती-बारी या वनों के उत्पाद पर निर्भर हैं. गांव के चौक-चौराहों पर युवक आपको बैठे मिल जायेंगे. इमली के पेड़ यहां बहुतायत हैं. इस कारण ग्रामीण इमली को बेचकर आपनी आजीविका चला रहे हैं. अधिकतर घरों की हालत जर्जर है. मौसमी पलायन यहां की बड़ी समस्या है. खेती का मौसम खत्म होते ही पुरुष और महिलाएं काम करने के लिए दूसरे शहर चले जाते हैं और बारिश का मौसम आते ही वापस अपने घर लौटते हैं. गांव में कुल 59 घर हैं और आबादी लगभग 300 है. छोटे बच्चों व बच्चियों की संख्या करीब दो सौ है.

केस संख्या - 1
दोबारा दिल्ली नहीं जाना चाहती है सरिता


रोंगो गांव की रहने वाली सरिता नाग (बदला हुआ नाम) फिलहाल गांव में ही रहकर छोटा-मोटा काम करती हैं और अपनी आजीविका चला रही हैं. मानव तस्करी की शिकार हुईं सरिता जब महज आठ साल की थी, तब दलाल उन्हें दिल्ली ले गये थे. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. इस कारण दलाल 12 सौ रुपये महीना तनख्वाह का झांसा देकर दिल्ली ले गये थे. दिल्ली के एक घर में काम के लिए रखा. घर का काम करना उन्हें नहीं आता था. इस कारण काफी परेशानी भी होती थी, हालांकि जिस घर में वह नौकरानी के तौर पर थीं, उसके मालिक अच्छे थे. इस कारण ज्यादा परेशानी नहीं झेलनी पड़ी, लेकिन उन्हें 12 सौ की जगह मात्र छह सौ रुपये ही मिलते थे. धीरे-धीरे काम से मन उचटा और वो वापस अपने घर खूंटी चली आयी. सरिता की एक बहन अभी भी दिल्ली में ही काम करती है. दिल्ली में अत्याचार के बारे में जानने के बाद अब सरिता काम के लिए कहीं भी बाहर जाने से साफ इनकार करती हैं और दूसरी युवतियों को भी जाने से मना करती हैं.

केस संख्या- 2
पीटर के दो बुआ आज तक लापता


गरीबी, पलायन, पिछड़ापन और अशिक्षा ने पीटर नाग के परिवार को ऐसा दर्द दिया है, जिससे पीटर का परिवार कभी उबर नहीं सकता. करीब 15 साल पहले पीटर के दो बुआ अच्ची नाग और पुश्ता नाग को काम दिलाने के नाम पर गांव से बाहर ले जाया गया, लेकिन आज तक दोनों का कोई अता-पता नहीं है. अब तो परिवार के लोग दोनों के वापस लौटने की उम्मीद छोड़ चुके हैं. थाना से भी सिर्फ आश्वासन ही मिला है. पीटर ने अपनी दोनों बुआ का पता लगाने का काफी प्रयास किया, लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली है.

केस संख्या- 3
आखिर कहां ढूंढें भतीजी को : मतिल नाग


रोंगो गांव की ही मतिल नाग की भतीजी पिछले 15 साल से लापता है, जो आज तक गांव वापस नहीं लौटी है. आर्थिक स्थिति दयनीय होने और जागरूकता का अभाव के कारण मतिल अपना दर्द किसी को नहीं बता पा रही हैं. कहती हैं भतीजी के लापता होने की शिकायत कहां करें. पैसा है नहीं कि थाना जाकर शिकायत दर्ज करायें. किसी तरह जिंदगी कट रही है. अब तो ईश्वर से यही विनती है कि भतीजी जहां हो, सकुशल हो.

ट्रैफिकिंग की बड़ी वजह है नशापान : मुखिया

दिगड़ी पंचायत के मुखिया जॉन नाग बताते हैं कि गांव में बेरोजगारी अधिक है. खेती-बारी के मौसम में ही यहां काम मिलता है. मनरेगा से भी जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं. इसलिए बच्चे- बच्चियां मां-बाप के साथ बाहर चले जाते हैं. इस कारण उनकी शिक्षा भी पूरी नहीं हो पाती है. गांव के अधिकांश पुरुष और महिलाएं नशे की गिरफ्त में हैं. इससे वो बच्चियों की देखरेख भी सही तरीके से नहीं कर पाते हैं. इसका फायदा दलाल उठाते हैं. वो बच्चियों के माता-पिता को पैसे का लालच देकर काम के लिए महानगरों में ले जाते हैं. इस कारण मामला दबा रह जाता है. वर्तमान में गांव से काम के लिए बाहर जाने पर ग्रामसभा में एक बॉन्ड भरने की व्यवस्था की गयी है, ताकि उनकी पूरी जानकारी उपलब्ध रहे और उन पर नजर रखी जा सके. फिलहाल 30 से भी अधिक लोग बाहर जाकर काम कर रहे हैं.

अशिक्षा के कारण भी बढ़ रही है ट्रैफिकिंग : अजय टोप्पो, मुखिया
कर्रा पंचायत के मुखिया अजय टोप्पो कहते हैं कि अशिक्षा और सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव होना भी पलायन और ह्यूमन ट्रैफिकिंग को बढ़ावा दे रहा है. उनके गांव गंडके में एक भी स्कूल नहीं है. सिर्फ आंगनबाड़ी केंद्र है. तीन किलोमीटर दूर स्कूल होने के कारण बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं. मौसमी पलायन के कारण भी कई बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं. दलालों के प्रलोभन में आकर कम उम्र की लड़कियां ट्रैफिकिंग की शिकार हो रही हैं.