aamukh katha

  • Sep 4 2018 2:21PM

अपने हाथ के हुनर से दूर की पैरों की कमजोरी

अपने हाथ के हुनर से दूर की पैरों की कमजोरी

 पंचायतनामा डेस्क

पंचायत : फटका
प्रखंड : तोरपा
जिला : खूंटी

खूंटी जिले के तोरपा प्रखंड की फटका पंचायत के गुटूहातु गांव के हैं सालू गुड़िया. दोनों पैर से दिव्यांग सालू की इलाके में अलग पहचान है. इनके हाथों में जादू है. इनकी बनायी मचिया एवं बुनाई की गयी कुर्सी समेत अन्य सामानों की बाजार में काफी मांग है. तोरपा प्रखंड कार्यालय, बैंक एवं स्कूल में उपयोग की जानेवाली कुर्सी, बेंच व टेबल इनके हुनर के गवाह हैं. कमर से नीचे का अंग लाचार होने के बावजूद तोरपा प्रखंड में बढ़ई, पेंटिंग व बुनाई के काम के लिए सालू पहली पसंद हैं. लोग उनके काम की तारीफ करते हैं. सालू ने साबित कर दिया है कि शारीरिक अक्षमता कभी भी हौसले पर भारी नहीं पड़ती.

आर्थिक तंगी के कारण नहीं करा पाये इलाज
बचपन में सालू गुड़िया सामान्य बच्चों की तरह ही थे. अन्य बच्चों की तरह खेलना-कूदना उन्हें पसंद था. थोड़ा बड़ा होने पर खेत में पिता का सहयोग करते थे. 15 वर्ष की उम्र में सालू बीमार पड़े. उन्हें दस्त हुआ, जिससे वो कमजोर हो गये. इसके बाद उनके कमर के नीचे का दोनों पैर काम करना बंद दिया. गरीब किसान परिवार के लिए यह सदमे की तरह था. स्थानीय स्तर पर काफी इलाज हुआ, लेकिन ठीक नहीं हुए. डॉक्टरों ने इलाज के लिए वेल्लोर ले जाने की सलाह दी, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण नहीं जा पाये. खराब पैरों को ही उन्होंने अपनी नियति समझ लिया. पढ़ाई भी छूट गयी.

पहली बार बीडीओ ने दिया काम
सालू बुरे दौर से भी गुजरे हैं. दोनों पैर से दिव्यांग होने के कारण खुद का काम भी नहीं कर पाते थे. चलते वक्त गिर जाते थे. काफी मुश्किल में उन्होंने बैसाखी के सहारे चलना सीखा. इससे थोड़ा हौसला बढ़ा. सालू के भाई बढ़ई का काम करते थे, जिसे देख-देख कर सालू भी काम करना सीख गये और किसी तरह काम करने लगे. बढ़ई का काम करने के साथ-साथ सालू ने देख-देख कर बुनाई और पेंटिंग का काम भी सीखा. सबसे पहले तोरपा प्रखंड के तत्कालीन बीडीओ ने उनका काम देखा और उन्हें काम करने को कहा. प्रखंड कार्यालय का काम करने के दौरान गजब का आत्मविश्वास बढ़ा. तोरपा के बैंक और स्कूलों से भी उन्हें काम के ऑर्डर मिलने लगे. आज सालू के हाथ के बनाये गये पलंग, बुनी गयी कुर्सी व मचिया तोरपा के लोगों की पहली पसंद बन गयी है.

ट्राई साइकिल से जाते हैं तोरपा से खूंटी
सालू गुड़िया के आत्मविश्वास का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुर्सी, मचिया बनाने में उपयुक्त होनेवाले सामानों के लिए वो अपनी ट्राई साइकिल से तोरपा से खूंटी जाते हैं. तोरपा से खूंटी पहुंचने में उन्हें ढाई घंटे का वक्त लगता है. आत्मविश्वास और जज्बे की बदौलत सालू गुड़िया आज अपनी पत्नी और एक बेटी के साथ खुशहाल जीवन जी रहे हैं. बेटी इंग्लिश मिडियम स्कूल में पढ़ती है. सालू खेत में भी थोड़ा बहुत काम कर लेते हैं.

हिम्मत करके यहां तक पहुंचा हूं : सालू गुड़िया
सालू गुड़िया कहते हैं कि कई बार उन्हें लगा कि वो अब हार जायेंगे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. घर में खाने-पीने की दिक्कत थी. गरीबी के कारण काफी परेशानी होती थी. दिव्यांग पेंशन के तौर पर 600 रुपये मिलते थे, लेकिन जब काम सीखा और काम मिलना शुरू हुआ, तब से अच्छा लगता है. बेहतर कार्य करके और आगे बढ़ने की इच्छा है.